राजस्थान में विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ेगा ब्राह्मण समुदाय का वर्चस्व, ब्राह्मणों को ऐसे लुभा रहे प्रमुख दल
जयपुर, 20 सितम्बर। राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर ब्राह्मण समाज राजनीति की धुरी बनने लगा है। यहां की राजनीति में सभी दल ब्राह्मण समुदाय का वर्चस्व बढ़ाने की तैयारी में जुट गए हैं। राजस्थान में ब्राह्मण मतदाता दूसरा बड़ा समुदाय है। पिछले तीन दशक में यहां राजनीति में ब्राह्मणों का दबदबा कमजोर हुआ है। इस दौरान विधानसभा चुनावों में भी दोनों प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा ने भी विधायकों के टिकटों में इस समुदाय के नेताओं की बड़े पैमाने पर कटौती की है। इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस ने दो-दो ब्राह्मण नेताओं को ही टिकट दिए थे। लेकिन अब सभी दलों को समझ आ गया है कि राजस्थान में ब्राह्मण नेताओं की अनदेखी उन्हें नुकसानदेह साबित हो सकती है। शायद यही वजह है कि सभी दल हाशिए पर गए ब्राह्मण समाज को प्रमुखता से उभारने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस में यदि अशोक गहलोत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते हैं तो माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री पद के लिए विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी उनकी पहली पसंद हैं। आप पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने पार्टी का प्रदेश प्रभारी ब्राह्मण नेता विनय मिश्रा को बनाया है। वहीं भाजपा भी अब किसी ब्राह्मण नेता को अध्यक्ष पद का चेहरे के तौर पर तलाश रही है। प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए पार्टी के प्रदेश महामंत्री भजन लाल के नाम की प्रमुखता से चर्चा है। भाजपा के संगठन महामंत्री चंद्रशेखर खुद ब्राह्मण हैं। हाल ही में भाजपा ने दिग्गज ब्राह्मण नेता घनश्याम तिवाड़ी को राज्यसभा में भेजकर ब्राह्मण मतदाताओं को रिझाने की कोशिश की है। सभी दल आने वाले विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों को राजस्थान में प्राथमिकता देने की तैयारी में हैं।

गहलोत सरकार ने ली ब्राह्मणों की सुध
राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकार ने पहली बार ब्राह्मणों की सुध ली है। विप्र कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश शर्मा के मुताबिक राजस्थान में ऐसा पहली बार हो रहा है कि ब्राह्मणों की स्थिति में सुधार के लिए जनता से सुझाव मांगे जा रहे हैं। पहले की सरकारों ने ऐसा नहीं सोचा। लेकिन गहलोत सरकार ने इस बारे में सोचा है। विप्र कल्याण बोर्ड ने ब्राह्मण समाज की स्थिति में सुधार के लिए उनकी सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक स्थिति को लेकर जनता से सुझाव मांगे हैं। इन सुझावों के आधार पर बोर्ड सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा। इसके रिपोर्ट के आधार पर सरकार ब्राह्मणों से जुडी समस्याओं और जीवनशैली में सुधार की कार्ययोजना तैयार करेगी।

तीन दशक से ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं
राजस्थान में ब्राह्मणों की राजनीतिक ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1949 से 1990 तक इस समुदाय को पांच मुख्यमंत्री मिले। लेकिन पिछले तीन दशक में राजस्थान में कोई ब्राह्मण चेहरा मुख्यमंत्री नहीं बना है। इस दौरान दोनों प्रमुख दलों ने विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण समुदाय के टिकटों में बड़े पैमाने पर कटौती की है। 2008 में कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार सीपी जोशी नाथद्वारा से एक वोट से चुनाव हार गए थे। राजस्थान की राजनीति में ब्राह्मणों का बड़ा वर्चव रहा है। प्रदेश की कई सीटों पर यह समुदाय विधानसभा चुनाव को सीधे प्रभावित करता है। परम्परागत रूप से ब्राह्मण समुदाय कांग्रेस का वोटबैंक माना जाता रहा है। लेकिन हिंदुत्व और बीजेपी के उभार के साथ इस वोटबैंक ने अपना पाला बदल लिया। पिछले कुछ सालों से यह समुदाय बीजेपी को वोट करता रहा है। लेकिन जटिल जातीय समीकरणों में यह बीजेपी में फिट नहीं बैठता है। यही वजह है अन्य दल भी इस समुदाय को लुभाने की कवायद में जुट गए हैं।













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