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गिरगिट की तरह रंग बदलती गाय पर राजनीति, अब NGO के हवाले होगी मप्र की गौशालाएं

मप्र में एक बार फिर गाय को लेकर राजनीति का पारा बढ़ सकता हैं। दरअसल पिछले चुनाव के बाद कांग्रेस फिर भाजपा सरकार द्वारा गौशाला निर्माण और गौवंश की देखरेख की जो योजना बनाई थी। वह एनजीके हवाले कर दिया गया है।

गाय आम लोगों के जितना आस्था का केंद्र हैं, उतना ही सियासी दलों के लिए राजनीति का मुद्दा। सत्ता में आने या सत्ता से जाने के बाद गाय जब भी सियासी गलियारों में टकराई बहस का मुद्दा बनी। एमपी में एक बार फिर गौवंश को लेकर चर्चा है। गोपालन और पशु संवर्धन बोर्ड उपाध्यक्ष स्वामी अखिलेश्वरानन्द गिरी के बयान पर यदि यकीन करें तो प्रदेश की गौशालाओं का जिम्मा अब सरकार के हाथों से अब NGO के हवाले कर दिया गया है। प्रदेश में 3000 गौशालाओं के निर्माण और उसके संचालन के लिए 211 करोड़ रुपए बजट की सरकार ने स्वीकृति दी थी।

NGO के हवाले प्रदेश की गौशालाएं

NGO के हवाले प्रदेश की गौशालाएं

मध्यप्रदेश में गौशालाओं को लेकर सरकार ने अपने पहले लिए गए फैसले को बदल दिया हैं। गौशालाओं के निर्माण फिर उनके संचालन के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर जिम्मेदारियां तय की गई थी। लेकिन गोपालन और पशु संवर्धन बोर्ड उपाध्यक्ष स्वामी अखिलेश्वरानन्द गिरी की माने तो अब यह काम NGO यानि गैर राजनीतिक संगठन के हवाले कर दिया गया। सरकार के इस फैसले के पीछे कई तरह की दलील दी रही हैं। कहा जा रहा है कि अनुभवहीनता की वजह से ग्राम पंचायत गौ-शालाओं का संचालन करने में सक्षम नहीं है।

कांग्रेस फिर भाजपा सरकार ने की थी घोषणा

कांग्रेस फिर भाजपा सरकार ने की थी घोषणा

2018 के विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में काबिज हुई कमलनाथ सरकार ने 1000 गौशाला निर्माण करने का ऐलान किया था। बाद में आई भाजपा सरकार ने इसे आगे बढ़ाते हुए 2000 और यानि कुल 3 हजार गौशाला निर्माण करने की घोषणा की। तय किया गया कि प्रदेश भर की ग्राम पंचायत स्तर पर गौवंश की संख्या के हिसाब से गौशालाएं बनाई जाएगी। साथ ही गायों की देखरेख का जिम्मा संबंधित पंचायतों पर ही होगा।

दोनों के फैसलों की निकल गई हवा

दोनों के फैसलों की निकल गई हवा

अगले साल 2023 में फिर विधानसभा चुनाव है, उससे पहले राजनीतिक बहस के रूप में फिर गाय का मुद्दा खड़ा है। ग्राम पंचायतों में अनुभव की कमी का हवाला देकर जिस तरह गौ शालाओं की योजना एनजीओ के हाथों में पहुंची, उससे कई सवाल उठ रहे हैं। खबर है कि फर्स्ट फेस में पूरे प्रदेश में 600 से ज्यादा गौशालाएं पशु संवर्धन से जुड़े एनजीओ को सौंप दी हैं। बाकी ढाई हजार के लगभग और सौंपा जाना है। यह दिलचस्प होगा कि सरकार जिन ग्रामपंचायतों को इस काम के लिए अनुभवहीन मान रही है, वही पंचायतें NGO के काम का आंकलन कैसे कर पाएंगी?

करीब 3 लाख गौ-वंश , प्रति गाय 20/- रुपए खर्चा

करीब 3 लाख गौ-वंश , प्रति गाय 20/- रुपए खर्चा

योजना के मुताबिक सरकार ने तय किया था कि ग्राम पंचायतों को प्रति दिन प्रति गाय आहार का 20 रुपए खर्च दिया जाएगा। अन्य खर्चों का मद अलग रहेगा, जो विभिन्न तरह की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इस तरह यदि तीन लाख गौवंश के खाने-पीने की व्यवस्था की जिम्मेदारी एनजीओ संभालते हैं तो उन्हें प्रतिदिन 60 लाख और महीने भर में लगभग एक करोड़ अस्सी लाख रुपए का भुगतान होगा।

सरकार के फैसले पर कांग्रेस ने लगाए आरोप

सरकार के फैसले पर कांग्रेस ने लगाए आरोप

मौजूदा सरकार द्वारा लिए गए फैसले को लेकर कांग्रेस इसे मुद्दा बनाने के मूड में है। कमलनाथ सरकार में वित्त मंत्री रहे तरुण भनोत का कहना है कि भाजपा सरकार ने अपने लोगों को उपकृत करने यह निर्णय लिया हैं। सरकार के खासमखास जो लोग NGO में शामिल है, उनके लिए कमाई का जरिया बनाया जा रहा है। बरगी विधायक संजय यादव भी बोले कि गाय का गुणगान कर बीजेपी ने कभी सत्ता की भूख मिटाने की कोशिश की तो कभी गौ अत्याचार के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकी। गौ-सेवा के नाम पर लोगों को सिर्फ गुमराह किया गया है।

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