MP हाईकोर्ट: प्राइवेट यूनिवर्सिटी को RTI की जानकारी देने ना बनाया जाए दबाव, सूचना आयुक्त के आदेश पर रोक
याचिका कहा गया कि निजी विश्वविद्यालय, जो केंद्र-राज्य सरकार से किसी भी तरह का वित्तीय शासकीय अनुदान प्राप्त नहीं करते या किसी भी तरह की सहायता नहीं लेते है,
जबलपुर, 22 जून: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ ने कुछ निजी विश्वविद्यालयों के द्वारा दाखिल रिट याचिका में अंतरिम राहत दी है। कोर्ट ने निर्देश दिए है कि सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत उनको RTI एक्टिविस्ट द्वारा मांगी जा रही जानकारी देने बाध्य न किया जाए। यह रिट याचिका निजी विश्वविद्यालयों द्वारा हाल ही में पारित प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त के आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय में दाखिल की गई थी।

इसलिए दायर की गई रिट याचिका
याचिका में कहा गया कि निजी विश्वविद्यालय, जो केंद्र-राज्य सरकार से किसी भी तरह का वित्तीय शासकीय अनुदान प्राप्त नहीं करते या किसी भी तरह की सहायता नहीं लेते है, उनको सूचना के अधिकार में लोक सूचना अधिकारी को नियुक्त करने हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही किसी भी व्यक्ति द्वारा दाखिल आवेदन को स्वीकार कर सूचना प्रदान करने के लिए भी बाध्य नहीं किया जा सकता। पूर्व में राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा आदेश पारित कर कहा गया था कि प्रदेश भर के निजी विश्वविद्यालय न केवल लोक सूचना अधिकारी नियुक्त करे, बल्कि सूचना के अधिकार में मांगी जाने वाली सभी जानकारियों को सार्वजनिक करने हेतु बाध्य है। इसके विरुद्ध उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की गई, जिस पर सुनवाई हुई। निजी विश्वविद्यालयों की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ राधेलाल गुप्ता और आशीष मिश्रा ने पैरवी की। राज्य सूचना आयोग की ओर से अधिवक्ता जय शुक्ला ने पैरवी की।

राज्य सूचना आयोग ने दिए थे यह निर्देश
सूचना के अधिकार अधिनियम २००५ की धारा २ के अंतर्गत हर 'पब्लिक अथॉरिटी' को लोक सूचना अधिकारी अपने यहां नियुक्त करना होता है, जो अधिकारी सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत लगने वाले सभी आवेदनों का परीक्षण कर उसमे सूचना को सार्वजनिक करता है। प्रदेश के निजी विश्वविद्यालय द्वारा अधिनियम के अंतर्गत स्वयं को 'पब्लिक अथॉरिटी' न मानते हुए लोक सूचना अधिकारी नहीं नियुक्त किया गया। न ही उनके द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम में लगने वाले आवेदन जो किसी भी आम व्यक्ति द्वारा दाखिल किया जा रहा था, उनको जानकारी प्रदान की गई। इसके विरुद्ध राज्य सूचना आयोग में आवेदन दाखिल हुए, जिस पर राज्य सूचना आयोग ने पूर्व में फरवरी २०२२ में आदेश दिया था कि सभी निजी विश्वविद्यालय लोक सूचना अधिकारी नियुक्त करे। उसके बाद ०८ जून २०२२ को आदेश दिया गया कि जिन व्यक्तियों ने सूचना के अधिकार अधिनियम में आवेदन दाखिल किये है, उनको स्वीकार करते हुए चाही गई जानकारी आवेदक एवं पक्षकार व्यक्ति को उपलब्ध कराई जाए।

प्राइवेट यूनिवर्सिटी की तरफ से दी गई यह दलील
राज्य सूचना आयोग के आदेशों के विरुद्ध उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की गई। जिसमें निजी विश्वविद्यालयों द्वारा कहा गया कि आयोग का आदेश असंवैधानिक एवं अनुचित है, साथ ही सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की परिधि के बाहर आता है। निजी विश्वविद्यालयों की तरफ से अधिवक्ता सिद्धार्थ राधेलाल गुप्ता ने तर्क दिया की धारा २ (एच) में पब्लिक अथॉरिटी घोषित होने के लिए यह आवश्यक है कि वह किसी भी तरह से राज्य अथवा केंद्र शासन से सहायता, अनुदान या शासकीय लाभ प्राप्त कर रहे हो। चूँकि निजी विश्वविद्यालयों द्वारा ऐसा किसी भी तरह का लाभ, अनुदान अथवा शासकीय कोष से सहायता नहीं ली जाती है, ऐसी परिस्थिति में उनको अधिनियम के अंतर्गत 'पब्लिक अथॉरिटी' नहीं माना जा सकता। याचिका के जरिए आदेश को निरस्त करने की मांग की गई।

अगस्त 2022 के तीसरे हफ़्ते तक माँगा जबाब
जबलपुर हाईकोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता निजी विश्वविद्यालय द्वारा दाखिल याचिका में अंतरिम राहत प्रदान की गई है। कोर्ट ने कहा है कि याचिकाकर्ता निजी विश्वविद्यालय को किसी भी तरह की सूचना उपलब्ध कराने हेतु बाध्य न किया जाए। राज्य सूचना आयोग और अन्य कई आरटीआई आवेदकगण जिनके द्वारा आवेदन दाखिल किया गया था, उनको भी कोर्ट ने नोटिस जारी किया है। सभी से अगस्त २०२२ के तीसरे सप्ताह तक जवाब माँगा है।
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