ना अमेरिका के रहे ना रहे रूस के करीब? क्या भारत की विदेश नीति फंसी नजर आ रही है?

शी जिनपिंग ने अपने जन्मदिन के मौके पर यानि 15 जून को उन खबरों के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फोन किया था, कि चीन ने अपने उप-विदेश मंत्री ले युचेंग को पद से हटा दिया है...

नई दिल्ली, जून 25: यूक्रेन युद्ध से ठीक दो हफ्ते पहले जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने चीन का दौरा किया था, उस वक्त दोनों देशों ने कहा था, कि चीन और रूस की दोस्ती की 'कोई सीमा नहीं है' और 15 जून को एक बार फिर से रूसी राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत ने इस दोस्ती को और आगे बढ़ाया ही है। लेकिन, भारत के लिहाज से देखें, को भारत चीन, रूस और अमेरिका के बीच फंसा हुआ सा नजर आ रहा है।

चीन और रूस की मजबूत दोस्ती

चीन और रूस की मजबूत दोस्ती

द डिप्लोमैट में लिखते हुए हेमंत अदलखा ने कहा कि, शी जिनपिंह ने अपने 69वें जन्मदिन पर रूसी नेता को आश्वस्त करने के लिए अपने "बॉसम फ्रेंड" व्लादिमीर पुतिन को फोन किया और और उनसे वैश्विक अशांति के बीच द्विपक्षीय संबंधों में एक समान विकास की गति बनाए रखने की बात की। शी जिनपिंह ने मॉस्को को "संप्रभुता और सुरक्षा" पर अधिक समर्थन देने का वादा किया और यह शी जिनपिंग का ये कदम पश्चिमी देशों द्वारा दी गई उन सभी चेतावनियों को तिरस्कारपूर्वक खारिज करने के समान है, कि चीन ने क्रेमलिन की निंदा ना करके अपनी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है। लेकिन, पश्चिम के नेताओं के लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है, कि शी जिनपिंग ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक समन्वय को गहरा करने का वचन देते हुए उसे और भी दोगुना कर दिया।

एक दूसरे के पूरक बनते चीन और रूस

एक दूसरे के पूरक बनते चीन और रूस

शी जिनपिंग ने अपने जन्मदिन के मौके पर यानि 15 जून को उन खबरों के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फोन किया था, कि चीन ने अपने उप-विदेश मंत्री ले युचेंग को पद से हटा दिया है और पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स के लिए ये एक बड़ी खबर थी, क्योंकि यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद चीन ने अपने विदेश विभाग में ये एक बड़ा बदलाव किया था। ले युचेंग को रूस से संबंधित मामलों का एक्सपर्ट माना जाता था, लेकिन 59 साल के ले युचेंग को पद से हटाए जाने पीछे जो वजहें सामने आईं, उनमें सबसे प्रमुख वजह ये थी, कि ले युचेंग ने यूक्रेन युद्ध, उसके परिणाम और उसके असर को लेकर गलत आकलन किया, जिसस चीन की विदेश नीति को गंभीर नुकसान पहुंचा। लिहाजा, चीनी राष्ट्रपति ने डैमेज कंट्रोल करने के लिए व्लादिमीर पुतिन को फोन किया और रूस को पूर्ण समर्थन देने का वादा किया, जो सबसे बड़ा झटका अमेरिका के लिए था।

रूस को लेकर बदला था चीन का रूख

रूस को लेकर बदला था चीन का रूख

पश्चिमी देशों की मीडिया रिपोर्ट्स में दावे किए गये, कि यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों की तरफ से बढ़ते दबाव की वजह से चीन ने मॉस्को के अपने समर्थन में नरमी ला दी थी और कुछ मौकों पर चीन ने रूस की नीति का 'अनुचित' भी कहा था। लेकिन, बाद में चीन को लगा, कि रूस को लेकर उसका आकलन गलत हो रहा है, लिहाजा शी जिनपिंग ने पुतिन को फोन करके और दोनों देशों के बीच आर्थिक, सैन्य और रक्षा संबंधों के आगे विकास का आश्वासन दे दिया, जिसका साफ मकसद है, कि यूक्रेन युद्ध में चीन रूस के साथ पूरी तरह से खड़ा है और शी जिनपिंग ने न केवल पश्चिमी चेतावनियों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है, बल्कि उन्होंने ने इन अटकलों पर भी विराम लगा दिया है कि चीन की रूस के बहुत करीब जाने की छवि बीजिंग में चिंता का कारण बन रही है।

एक तीर से कई निशाने

एक तीर से कई निशाने

शी जिनपिंग ने राष्ट्रपति पुतिन को फोन यूरोपीय देशों के शिखर सम्मेलन से ठीक एक दिन पहले किया था, जिसका उद्देश्य यूक्रेन युद्ध में रूस के साथ एकजुटता का प्रदर्शन करना था और नाटो शिखर सम्मेलन से सिर्फ दो सप्ताह पहले ये फोन किया गया था, जिसका मकसद चीन अपनी दोस्ती के सबूत देना चाहता था। मैड्रिड में होने वाले 29 जून के नाटो शिखर सम्मेलन में पहली बार जापान और दक्षिण कोरिया दोनों को आमंत्रित किया गया है। साथ ही, यह बताना उचित होगा कि शी जिनपिंग के चीन-रूस रणनीतिक साझेदारी को फिर से शुरू करने के फैसले को चायना कम्युनिस्ट पार्टी ब्यूरो और देश के रणनीतिक मामलों के समुदाय का समर्थन प्राप्त है।

भारत के लिए फोन कॉल का मतलब

भारत के लिए फोन कॉल का मतलब

यूक्रेन युद्ध कई मायनों में भारतीय विदेश नीति के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है और भारत ने गुटनिरपेक्ष सिद्धांत पर ही आगे बढ़ने का फैसला किया और उसे बरकरार रखा है। लेकिन, भारत के इस रूख ने कहीं ना कहीं पश्चिमी देशों से बढ़ती नजदीकी के लिए एक स्पीडब्रेकर का काम किया है। अमेरिका ने खुले तौर पर भारत से नाराजगी जताई और मार्च और अप्रैल के महीने में दर्जन भर देशों के नेताओं ने भारत का दौरा किया और मकसद साफ था, कि भारत रूस का समर्थन ना करे। लेकिन, भारत ने यूनाइटेड नेशंस में रूस के खिलाफ लाए गये हर प्रस्ताव से खुद को दूर रखा और खुद को तटस्थ रखने की कोशिश की। लेकिन, चीन और रूस की 'असीमित' दोस्ती क्या भारत के इस सिद्धांत के लिए हानिकारक नहीं है? और दूसरा सवाल ये है, कि जो पश्चिमी देश यूनाइटेड नेशंस के मंच पर भारत के पक्ष में वोटिंग करते थे, क्या वो आगे भी भारत का साथ देंगे?

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