भारत में स्थापित हुआ विश्व का पहला लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप, NASA को टक्कर! जानिए कैसे करेगा काम?

भारत ने इस लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप को स्थापित किया है, जो समुद्र तल की ऊंचाई से 2450 मीटर की ऊंचाई पर है और इस टेलीस्कोप के जरिए क्षुद्रग्रहों, सुपरनोवा, अंतरिक्ष मलबे और अन्य सभी खगोलीय पिंडों पर नजर रखी जाएगी।

नई दिल्ली, जून 04: अंतरिक्ष की दुनिया में ऐतिहासिक कदम रखते हुए भारत ने विश्व का पहला लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप नैनीताल में स्थापित कर दिया है और इसके साथ ही चीन और अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए भारत विश्व का इकलौता देश हो गया है, जिसने लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप लगा है। भारतीय वैज्ञानिकों ने इस लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप को उत्तराखंड के नैनीताल स्थिति देवस्थल ऑर्ब्जेवेट्री में एक पहाड़ी पर 2450 मीटर की ऊंचाई पर लगाया है।

लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप क्या काम करेगा?

लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप क्या काम करेगा?

हिमालय की पहाड़ियों पर भारत ने इस लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप को स्थापित किया है, जो समुद्र तल की ऊंचाई से 2450 मीटर की ऊंचाई पर है और इस टेवीस्कोप के जरिए क्षुद्रग्रहों, सुपरनोवा, अंतरिक्ष मलबे और अन्य सभी खगोलीय पिंडों पर नजर रखी जाएगी। लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप के जरिए आसमान का लगातार सर्वेक्षण किया जाएगा और ये आकाशगंगा के साथ साथ अन्य खगोलीय घटनाओं का भी निरीक्षण करेगा। उत्तराखंड में स्थापित होने के बाद यह दुनिया का पहला तरल-दर्पण दूरबीन बन गया है। आइये जानते हैं, कि ये टेलीस्कोप क्या है, यह पारंपरिक टेलीस्कोप से कैसे अलग है और इसके उपयोग से भारत को क्या सब जानकारियां हासिल होंगी?

लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप क्या है?

लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप क्या है?

इंटरनेशनल लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप (ILMT) उत्तराखंड में नैनीताल के आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (ARIES) के स्वामित्व वाले देवस्थल वेधशाला परिसर में स्थापित किया गया है। समुद्र तल से औसत 2450 मीटर की ऊंचाई पर स्थिति इस टेलीस्कोप के साथ भारत ने पहली बार दो काम पूरी दुनिया में सबसे पहले किए हैं। पहला काम ये, कि यह एकमात्र ऐसा टेलीस्कोप है, जिसे खगोल विज्ञान अनुसंधान के लिए विकसित किया गया है और इस टेलीस्कोप की सबसे बड़ी खासियत ये है, कि उसे दुनिया के किसी भी हिस्से में एक्टिव किया जा सकता है और अभी तक पूरी दुनिया में एक भी ऐसा टेलीस्कोप नहीं बना है, जिसे धरती के किसी भी हिस्से से एक्टिव कर दिया जाए। लिहाजा, भारतीय वैज्ञानिकों के लिए ये एक गर्व करने वाली बात है।

पहले के बनाए लिक्विड टेलीस्कोप कैसे थे?

पहले के बनाए लिक्विड टेलीस्कोप कैसे थे?

ऐसा नहीं है, कि पहले लिक्विड टेलीस्कोप नहीं बनाए गये, लेकिन पहले जो भी लिक्विड टेलीस्कोप बनाए गये, उसकी क्षमता काफी सीमित होती थी और उनके जरिए सिर्फ उपग्रहों को ही ट्रैक किया जा सकता था और उनका इस्तेमाल ज्यादातर सेना के लिए किया जाता था। लेकिन आईएलएमटी देवस्थल में आने वाली तीसरी दूरबीन सुविधा होगी। आईएलएमटी इसी साल अक्टूबर में पूर्ण पैमाने पर इस टेलीस्कोप के जरिए साइंटिफिक ऑपरेशन शुरू कर देगा। ये लिक्विड टेलीस्कोप, 3.6 मीटर देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप (डीओटी) के साथ काम करेगा, जो भारत में संचालित सबसे बड़ी दूरबीन (4 मीटर वर्ग की) है, जिसका 2010 में उद्घाटन किया गया था और ये 1.3 मीटर देवस्थल फास्ट ऑप्टिकल टेलीस्कोप (डीएफओटी) भी इसी स्थान पर काम कर रहा है।

लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप कैसे बनाया गया?

लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप कैसे बनाया गया?

लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप को भारतीय वैज्ञानिको ने कनाडा और बेल्जियम के खगोलविदों की मदद से तैयार किया है और ये टेलीस्कोप लिक्विड पारे की एक पतली फिल्म से बना 4 मीटर के व्यास का रोटेटिंग मिरर जैसा है। ये टेलीस्कोप लाइक को इकट्ठा करने और उसपर फोकस करने का काम करता है। वैज्ञानिकों ने इसे तैयार करने के लिए लिक्विड पारे का एक पुल तैयार किया, जो एक रिफ्लेक्टिव लिक्विड होता है। लिक्विड पुल बनाने से टेलीस्कोप की सतह घुमावदार हो जाती है और प्रकाश पर फोकस करने के लिए ये सबसे ज्यादा आदर्श स्थिति होती है। इसके साथ ही इसके ऊपर एक पारदर्शी पतली फिम्ल का कोटेशन होता है, जो पारे को हवा से बचाने का काम करती है। लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप में एक बड़ा इलेक्ट्रॉनिक कैमरा लगा होता है, जो तस्वीरों को रिकॉर्ड करता है।

पारंपरिक दूरबीन से किस तरह है अलग?

पारंपरिक दूरबीन से किस तरह है अलग?

जो पारंपरिक टेलीस्कोप होते हैं, उन्हें आकाश में, जिस तरफ की जानकारी लेनी होती है, उस तरह एंगल बनाकर स्थापित किया जाता है। जबकि, लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप एक स्थिर दूरबीन है, जो आकाश की एक पट्टी को चित्रित करती हैं जो रात में एक निश्चित समय पर चरम पर होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो, एक लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप सितारों, आकाशगंगाओं, सुपरनोवा विस्फोटों, क्षुद्रग्रहों से लेकर अंतरिक्ष मलबे तक किसी भी और किसी भी तरह की संभावित खगोलीय पिंडों का सर्वेक्षण करेगा और उसकी तस्वीरें लेने में सक्षम होगा। पारंपरिक दूरबीनों में अत्यधिक पॉलिश किए गए कांच के दर्पण लगे होते हैं, जिन्हें नियंत्रण करके चलाया जाता है और फिर लाइट के रिफ्लेक्शन के जरिए तस्वीरें ली जाती हैं।

50 लीटर पारे का हुआ इस्तेमाल

50 लीटर पारे का हुआ इस्तेमाल

जैसा की लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप, नाम से ही साफ है, कि इसमें लिक्विड का इस्तेमाल किया गया है और पारा एक ऐसा धातु होता है, जिसमें उच्च प्रकाश-परावर्तन क्षमता होती है। एक कंटेनर में भरे हुए लगभग 50 लीटर, जिसका वजन करीब 700 किग्रा के बराबर होता है, उसे आईएलएमटी के ऊर्ध्वाधर अक्ष के साथ एक निश्चित स्थिर गति से घुमाया जाएगा। इस प्रक्रिया के दौरान पारा एक पतली परत के रूप में कंटेनर में फैल जाएगा जो एक परवलयिक आकार की परावर्तक सतह का निर्माण करेगा, जो एक दर्पण के तौर पर काम करने लगेगा और एक ऐसी सतह का निर्माण करेगा, जो प्रकाश को इकट्ठा करने और फोकस करने के लिए आदर्श जगह होगा। इसका व्यास 4 मीटर है।

क्या है टेलीस्कोप की क्षमता?

क्या है टेलीस्कोप की क्षमता?

रिपोर्ट के मुताबिक, लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप की क्षमता 95 हजार प्रकाश वर्ष की दूरी तक तस्वीरें लेने की है और इसने 4274 आकाशगंगाओं की साफ तस्वीरें ली हैं। इसके साथ ही इस टेलीस्कोप ने मिल्की-वे में मौजूद तारों की भी काफी साफ तस्वीरें ली हैं। आपको बता दें कि, लिक्विड-मिरर टेलीस्कोप का प्रोजेक्ट साल 2017 में बेल्जियम, कनाडा और पोलैंड के साथ 8 देशों ने मिलकर प्रोजेक्ट शुरू किया था और उस वक्त इस प्रोजेक्ट के लिए 50 करोड़ का बजट रखा गया था।

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