5 जून- विश्व पर्यावरण दिवस: 'लू' से लाल होती धरती...

नयी दिल्ली। प्रकृति बदल रही है। उसका असर हम अपनी आंखों से देख रहे हैं, लेकिन यह सब हम मानने को तैयार नहीं हैं। हमें अपने विज्ञान पर पूरा भरोसा है कि हम उस पर जीत हासिल कर लेंगे। लेकिन इंसान शायद यह भूल रहा है कि जहां से उसका शोध खत्म होता है। प्रकृति वहां से अपनी शुरुआत करती है। दुनियाभर में ग्लोबल वार्मिग का सच हमारे सामने आने लगा है। इंसान की भौतिक और विकासवादी सोच उसे मुसीबत की ओर धकेल रही है। विकास की धृतराष्ट्री नीति हमें प्रकृति और इंसान के मध्य होने वाले अघोषित महाभारत की ओर ले जा रही है।

World Environment Day: Water, food, energy and rising temperatures

प्रकृति के खिलाफ इंसान और उसका विज्ञान जिस तरह युद्ध छेड़ रखा है, उसका परिणाम भयंकर होगा। भौमिक विकास की रणनीति इंसान का वजूद खत्म कर देगी। यह नहीं भूलना चाहिए कि हम विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति से संतुलन बनाए रखने में नाकामयाब रहे हैं। प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए गए कानून सिर्फ किताबी साबित हो रहे हैं। ओजन परत में होल के कारण धरती का तामपान बढ़ रहा है। कार्बन उत्सर्जन पर हम विराम नहीं लगा पा रहे हैं, जिसका नतीजा है कि साल दर साल हिटिंग बढ़ रहा है। कार्बन उत्सर्जन पर विराम नहीं लगाया गया तो एक अनुमान के अनुसार 2040 तक धरती पर लू का कहर 12 गुना अधिक बढ़ जाएगा।

देशभर में लू का कहर जारी है। पिछले दस साल में लू से मरने वालों में 61 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। यह राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो का आंकड़ा है। यह हमारे लिए सबसे चिंता का विषय है। वर्ष 2004 से 2013 के बीच देशभर में लू से 9,734 लोगों की मौत हो चुकी है। इससे यह साबित होता है कि यह दूसरी सबसे बड़ी जानलेवा प्राकृतिक आपदा है। दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक 1,723 मौतें हो चुकी हैं। हाल में चल रही गर्मी और लू से 1300 से अधिक लोग आंध्र और तेलंगाना में मारे गए हैं, जबकि पंजाब 1,187 उत्तर प्रदेश 1,172, बिहार 716 और ओड़िशा में 852 लोग की मौत पिछले दस साल में हो चुकी है।

धरती पर जलवायु परिवर्तन का सीधा असर देखा जा रहा है। ग्लोबल वार्मिग के पीछे अस्सी फीसदी जलवायु परिवर्तन ही मुख्य कारण हैं। लेकिन यह समस्या थमने वाली नहीं है। इंसान अगर प्रकृति से तालमेल नहीं बना सका तो उसका अस्तित्व खत्म हो जाएगा। प्रकृति की चेतावनी को हमें समझने की जरूरत है। ग्लोबल वार्मिग के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्र के जलस्तर में वृद्धि हो रही है, जबकि जमीन के अंदर का पेयजल घट रहा है। शुद्ध पेयजल के संबंध में आयी हालिया रिपोर्ट हमें चौंकाने वाली है। इस तरफ सरकार, सामाजिक संस्थाएं और इंसान का कोई ध्यान नहीं दे रहा है। देश में इन दिनों लू के कहर से हाहाकार मचा है। अब तक लगभग 2,000 मौतें हो चुकी हैं।

उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक इंसानी मौतों का सिलसिला जारी है। उत्तर भारत की गंगा, यमुना, घाघरा, सरयू, जैसी नदियों के जलस्तर में बेतहाशा कमी आ रही है। नदियों में रेत का रेगिस्तान दिखने लगा है, जबकि ग्रामीण स्तर की नदियों में जल का पता नहीं है। नदी की तलहटियों में दारारें पड़ गई हैं। दक्षिण और मध्य भारत की नदियों की स्थिति और कुछ को छोड़ बुरी हो सकती है। धरती पर बढ़ता प्रकृति का गुस्सा हमारे लिए खतरा बन गया है। भूकंप, बाढ़, सूखा, भू-स्खलन के बाद अब लू अस्तित्व मिटाने को तैयार है। अभी हम उतराखंड की त्रासदी से पूरी तरह नहीं निपट पाए हैं। प्राकृतिक जलजले के बाद वहां का ढांचागत विकास आज भी अधूरा है। पुल, सड़क और दूसरी इमारतें हमें उस त्रासदी की याद दिलाती हैं। उत्तराखंड की धार्मिक यात्रा करने में भी आज भी लोग करता रहे हैं।

प्राकृतिक विनाशलीला का सबसे बड़ा उदाहरण हमारे सामने पुणे का मलिन गांव हैं। जहां पिछले साल पहाड़ खिसकने से पूरा गांव जमींदोज हो गया था। गांव का का पता ही नहीं चला। नेपाल में आए भूकंप की तबाही हम देख चुके हैं। प्रकृति हमें अपने तांडव से बार-बार चेतावनी दे रही है, लेकिन हम हैं कि उस ओर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं। औद्योगिक संस्थानों, सड़कों, पुलों और शहरीकरण के चलते वनों का सफाया हो रहा है। वन भूमि का विस्तार घट रहा है।

राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण के लिए आम और दूसरे पुराने वृक्षों को धराशायी किया जा रहा है, जिसका असर है कि धरती का तापमान बढ़ रहा है। इस पर हमें गंभीर चिंतन और चिंता करने की जरूरत है। वरना, इंसान का वजूद अपने आप मिट जाएगा और साल दर साल धरती पर प्रकृति का नग्न तांडव बढ़ता जाएगा। इंसान अपनी गलतियों के कारण प्रकृति से यह अघोषित युद्ध लड़ना पड़ेगा। इस जंग में आखिरकार इंसान हार रहा है और हारेगा, जबकि प्रकृति विजयी होगी। यह सब किया धरा इंसान का है। वह अपने को सबसे बुद्धिशाली और कौशलयुक्त समझता है। वह अपनी विकासवादी सोच के बल पर प्रकृति और उसकी कृति पर विजय पाना चाहता है। संभवत: यही उसकी सबसे बड़ी भूल है। आईएएनएस

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