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अंतर्राष्ट्रीय बाजार में धड़ाम से गिरे तेल के दाम, 7 महीने में सबसे कम दर, भारत में क्यों कम नहीं हो रही कीमत?

इस सप्ताह की शुरुआत में भारत सरकार ने तेल की कीमतों में संशोधन नहीं करने के लिए ओएमसी की नीति का भी बचाव किया है। वहीं, उत्तर प्रदेश चुनाव के वक्त भी तेल के दाम नहीं बढ़ाए गये थे।

नई दिल्ली, सितंबर 12: भारत सरकार की स्वामित्व वाली तेल कंपनियों ने भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें पिछले सात महीने में सबसे नीचले स्तर तक पहुंच चुकी है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं, कि आखिर भारतीय तेल कंपनियों ने दाम कम क्यों नहीं किए हैं? इसको लेकर एक्सपर्ट्स का कहना है, कि भारतीय तेल कंपनियों ने अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में रिकॉर्ड इजाफे के बाद भी 5 महीने तक पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा नहीं किया था, लिहाजा अब तेल कंपनियां उसकी भरपाई कर रही हैं।

90 डॉलर प्रति बैरल से कम हुआ दाम

90 डॉलर प्रति बैरल से कम हुआ दाम

भारत में राज्य के स्वामित्व वाली तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है, भले ही अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें सात महीने के निचले स्तर पर पहुंच गई हैं, जाहिर तौर पर बढ़ती लागत के बावजूद रिकॉर्ड पांच महीने के लिए दरों को बनाए रखने के लिए हुए नुकसान की भरपाई करना तेल कंपनियों का मकसद है। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी की शुरुआत के बाद पहली बार अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड पिछले हफ्ते 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे गिर गया है, क्योंकि मंदी की आशंका से डिमांड पर असर पड़ा। हालांकि, इसमें फिर से थोड़ा सुधार आया और फिलहाल अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खबर लिखे जाने तक ब्रेंट क्रूड की कीमत 92.84 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जो पिछले छह महीने में सबसे कम है।

चुनौतियों के बावजूद दाम में कमी

चुनौतियों के बावजूद दाम में कमी

रूस ने करीब 10 दिन पहले नॉर्थ स्ट्रीम पाइपलाइन को ऑफलाइन कर दिया है। यानि, नॉर्थ स्ट्रीम पाइपलाइन की मरम्मत करने के नाम पर जर्मनी समेत कई यूरोपीय देशों को गैस की सप्लाई रोक दी है, वहीं, तेल उत्पादक संगठन ओपेक प्ल ने भी उत्पादन में कटौती कर दी है, जबकि अमेरिका की तरफ से लगातार प्रोडक्शन बढ़ाने की मांग की जा रही थी, लेकिन इसके बाद भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आ गई है। लेकिन, इससे भारत में खुदरा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई संशोधन नहीं हुआ है और वे पिछले 158 दिनो से लगातार यथास्थिति पर बने हुए हैं।

भारत सरकार ने क्या कहा?

भारत सरकार ने क्या कहा?

इस सप्ताह की शुरुआत में भारत सरकार ने तेल की कीमतों में संशोधन नहीं करने के लिए ओएमसी की नीति का भी बचाव किया है। तेल मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि, "जब (अंतरराष्ट्रीय तेल) की कीमतें अधिक थीं, तो हमारे यहां (पेट्रोल और डीजल) की कीमतें पहले ही कम थीं।" इसके बाद तेल मंत्री ने उल्टा मीडिया से ही सवाल पूछा, कि "क्या हमने अपने सारे नुकसान की भरपाई कर ली है?" पुरी ने कहा कि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों को 88 डॉलर प्रति बैरल पर लगातार बने रहने या और नीचे जाने की जरूरत है, उसके बाद ही आम लोगों को कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि, तेल मंत्री ने 6 अप्रैल से तेल की दरों को स्थिर रखने को लेकर हुए नुकसान के बारे में विस्तार से नहीं बताया।

भारतीय तेल आयात का गणित समझिए

भारतीय तेल आयात का गणित समझिए

भारत ने 8 सितंबर तक अंतर्राष्ट्रीय बाजार से जो कच्चे तेल का आयात किया है, वो भारत ने औसतन 88 डॉलर प्रति बैरल के हिसाब से खरीदा है। अप्रैल महीने में यह दर औसतन 102.97 डॉलर थी, जो अगले महीने, यानि मई में बढ़कर 109.51 डॉलर और जून में 116.01 डॉलर हो गई थी। जुलाई में कीमतों में गिरावट शुरू हुई और उस वक्त भारत को कच्चा तेल औसत 105.49 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल पर खरीदना पड़ा रहा था। वहीं, अगस्त महीने में इसका औसत 97.40 डॉलर और सितंबर में अब तक 92.87 डॉलर प्रति बैरल हो गया है। और भारत सरकार का तर्क ये है, कि चूंकी जब तेल लगातार महंगा हो रहा था, उस वक्त तेल कंपनियों ने दाम बढ़ाए नहीं थे, लिहाजा उस वक्त जो घाटा हुआ था, फिलहाल उसकी भरपाई की जा रही है।

तेल कंपनियां कर रही थीं सरकार को मदद?

तेल कंपनियां कर रही थीं सरकार को मदद?

राज्य के स्वामित्व वाले ईंधन खुदरा विक्रेता इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) ने पेट्रोल और डीजल के खुदरा बिक्री मूल्य को अंतरराष्ट्रीय लागत के अनुरूप बढ़ाने या घटाने के अपने अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया है, क्योंकि देश में लगातार बढ़ती महंगाई को काबू में रखने के लिए ये तेल कंपनियां सरकार को मदद दे रही थीं। पीटीआई के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण ओएमसी को डीजल पर 20-25 रुपये प्रति लीटर और पेट्रोल पर 14-18 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा था। तेल की कीमतों में गिरावट के साथ इन घाटे को कम करने की कोशिश की जा रही है।

पेट्रोल पर फिलहाल नहीं है नुकसान

पेट्रोल पर फिलहाल नहीं है नुकसान

हालांकि, पीटीआई ने एक अधिकारी के हवाले से कहा कि, "पेट्रोल पर अभी कोई अंडर-रिकवरी (नुकसान) नहीं है। डीजल के लिए इसे उस स्तर तक पहुंचने में कुछ समय लगेगा।" हालांकि, एक और अधिकारी ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि, तेल की घरेलू कीमतों में तत्काल कमी आने की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि तेल कंपनियों को पिछले पांच महीनों में कम कीमत पर ईंधन बेचने पर हुए नुकसान की भरपाई करने की अनुमति है। आपको बता दें कि, भारत अपनी तेल की जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर 85 प्रतिशत निर्भर है, और इसलिए खुदरा पंप दरें वैश्विक बाजारों में होने वाली घटनाओं पर सीधे निर्भर हैं।

तेल की कीमतों पर चुनाव का असर

तेल की कीमतों पर चुनाव का असर

आईओसी, बीपीसीएल और एचपीसीएल को पेट्रोल और डीजल के खुदरा मूल्य में दैनिक रूप से लागत के अनुरूप संशोधन करने का अधिकार हासिल है। लेकिन, इन तेल कंपनियों ने 4 नवंबर 2021 से रिकॉर्ड 137 दिनों के लिए अपनी दरें स्थिर कर दीं थीं, क्योंकि उस दौरान उत्तर प्रदेश में चुनाव चल रहे थे। उत्तर प्रदेश में चुनावी नतीजे आने के बाद 22 मार्च को तेल कंपनियों ने एक बार फिर से तेल की कीमतों में इजाफा करना शुरू कर दिया और 7 अप्रैल से एक बार फिर से तेल की कीमतों को स्थिर करने से ठीक पहले एक हफ्ते में तेल की कीमतों में 10 रुपये का इजाफा किया गया था।

फिलहाल क्या हैं तेल की कीमतें?

फिलहाल क्या हैं तेल की कीमतें?

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में पेट्रोल की कीमत फिलहाल 96.72 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत 89.62 रुपये है। यह 6 अप्रैल को पेट्रोल के लिए 105.41 रुपये प्रति लीटर और डीजल के लिए 96.67 रुपये प्रति लीटर से कम है, क्योंकि सरकार ने दरों को कम करने के लिए उत्पाद शुल्क में कटौती की है। अधिकारियों ने कहा कि, 22 मार्च से 6 अप्रैल के बीच 10 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि लागत को कवर करने के लिए पर्याप्त नहीं थी और नए फ्रीज का मतलब अधिक नुकसान की तरफ बढ़ना था। तेल कंपनियों ने मुद्रास्फीति का प्रबंधन करने में सरकार की मदद करने के लिए दरों में संशोधन नहीं किया, जो पहले से ही कई वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंच गई थी। यदि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लागत के अनुरूप वृद्धि की जाती तो यह कीमत और भी बढ़ जाता। फ्रीज का मतलब यह है, कि तीनों खुदरा विक्रेताओं ने जून तिमाही में 18,480 करोड़ रुपये का संयुक्त शुद्ध घाटा दर्ज किया है।

तेल से हट चुका है सरकारी नियंत्रण

तेल से हट चुका है सरकारी नियंत्रण

जून 2010 में पेट्रोल को और नवंबर 2014 में डीजल को सरकार के नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया था। तब से, सरकार तेल कंपनियों को लागत से कम दरों पर ईंधन बेचने पर होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए कोई सब्सिडी नहीं देती है। इसलिए, जब इनपुट लागत गिरती है, तो तेल कंपनियां घाटे की भरपाई करती हैं। यूक्रेन पर रूस के 24 फरवरी के आक्रमण ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों के माध्यम से सदमे की लहरें भेजीं हैं और अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने रूस को सख्त आर्थिक प्रतिबंधों में जकड़ लिया है, जिसकी वजह से तेल की कीमतों में उथल-पुथल मची हुई है। यूक्रेन युद्ध से पहले ब्रेंट 90.21 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल पर था और 6 मार्च को 14 साल के उच्च स्तर 140 अमेरिकी डॉलर पर पहुंच गया था। मंदी की वजह से मांग में कमी आने की आशंका से हाल के सप्ताहों में तेल बाजारों से कुछ गर्मी निकली है। चीन ने पिछले महीने कच्चे तेल के आयात में 9 प्रतिशत की गिरावट देखी है क्योंकि, चीन की शून्य-कोविड नीति ने अगस्त के अंत से 70 से अधिक शहरों में पूर्ण या आंशिक लॉकडाउन कर रखा है।

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