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तालिबान के साथ लड़ता रहा पाकिस्तान, पंजशीर को भारत समेत दुनिया ने क्यों छोड़ा अकेला? हार की 5 वजहें

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काबुल, सितंबर 07: अफगानिस्तान में जनता का आखिरी किला पंजशीर भी टूटने के कगार पर है। पंजशीर में कई बड़े नेता मारे जा चुके हैं और कई जगहों पर तालिबान का कब्जा हो चुका है। लेकिन सवाल ये उठता है कि 1990 से अपराजित रहा पंजशीर आखिर हार कैसे गया? जब तालिबान के साथ खुलकर पाकिस्तान आ सकता है और पंजशीर में बमबारी कर सकता है, तो फिर पूरी दुनिया ने गुहार लगाने का बाद भी पंजशीर की मदद क्यों नहीं की? आईये जानते हैं वो पांच बड़ी वजहें, जिसने पंजशीर को पराजित कर दिया।

तालिबान ने काटी सप्लाई लाइन

तालिबान ने काटी सप्लाई लाइन

1990 के दशक के विपरीत जब एंटी तालिबान फोर्स, जिसे नॉर्दर्न एलायंस भी कहा जाता है, उसने ताजिकिस्तान से पंजशीर घाटी तक सप्लाई लाइनों को अपने नियंत्रण में ले रखा था, लिहाजा तालिबान की लाख कोशिशों के बाद भी पंजशीर लड़ाई में हार नहीं पाया और तालिबान का पंजशीर पर कंट्रोल नहीं हो पाया। लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं। इस बार तालिबान ने सबसे पहले पंजशीर और ताजिकिस्तान को जोड़ने वाली सप्लाई लाइन पर ही कब्जा जमा लिया, लिहाजा पंजशीर में जरूरत की सामानों की सप्लाई नहीं हो पा रही है। वहीं, हथियारों की सप्लाई भी ठप पड़ गई है। रिपोर्ट है कि अब एंटी तालिबान फोर्स के बाद ज्यादा दिनों के लिए गोला- बारूद नहीं बचा है। ऐसे में पंजशीर का किला बचाना एंटी तालिबान फोर्स के लिए मुश्किल साबित हो रहा है।

    Panjshir को भारत समेत पूरी दुनिया ने अकेला क्यों छोड़ा? | Afghanistan Taliban | वनइंडिया हिंदी
    तालिबान के साथ पाकिस्तान

    तालिबान के साथ पाकिस्तान

    पंजशीर में उस वक्त पूरा खेल बदल गया और एंटी तालिबान फोर्स पूरी तरह से बैकफुट पर आ गई, जब तालिबान के समर्थन में पाकिस्तान एयरफोर्स ने नॉर्दर्न एलायंस पर जमकर बमबारी कर दी। इसमें नॉर्दर्न एलायंस को काफी नुकसान पहुंचा है और कई बड़े नेता मारे गये है। पाकिस्तान एयरफोर्स ने अमरूल्ला सालेह के घर को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया और उनके घर को बम से उड़ा दिया। इस हमले के बाद अभी तक अमरूल्ला सालेह की कोई खबर नहीं मिली है। कुछ लोग उनके पहाड़ों में छिपने की बात कह रहे हैं तो कुछ रिपोर्ट्स में उनके ताजिकिस्तान चले जाने की बात कही गई है। काबुल में आईएसआई प्रमुख की उपस्थिति साफ बताता है कि पंजशीर में तालिबान नहीं, बल्कि पाकिस्तान लड़ रहा है। ईरान ने पाकिस्तान द्वारा पंजशीर पर किए गये हमले की सख्त आलोचना करते हुए जांच की मांग की है। वहीं, अमेरिका और सहयोगी देशों ने नॉर्दर्न एलायंस का साथ देना बंद कर दिया है। वादे के बाद भी फ्रांस या किसी भी और देश की तरफ से नॉर्दर्न एलायंस को मदद नहीं दी जा रही है।

    विदेशी समर्थन मिलना बंद

    विदेशी समर्थन मिलना बंद

    एक तरफ जहां तालिबान को सीधे तौर पर पाकिस्तान समर्थन दे रहा है, वहीं नॉर्दर्न एलायंस को वैश्विक समर्थन मिलना पूरी तरह से बंद हो चुका है। जब अहमद शाह मसूद, जो ''पंजशीर के शेर" के नाम से प्रसिद्ध थे, उन्होंने तालिबान के खिलाफ लड़ाई छेड़ी थी, तो उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी समर्थन मिला था। अहमद शाह मसूद के ही बेटे अहमद मसूद हैं, जो इस वक्त तालिबान से लड़ रहे हैं और जिन्होंने मरते दम तक तालिबान से हार मानने से इनकार कर दिया है। अहमद शाह मसूद की 20 साल पहले अल-कायदा ने धोखे से हत्या कर दी थी। उनकी हत्या अमेरिका पर 9/11 के हमलों से ठीक दो दिन पहले की गई थी। वहीं, पिछले महीने 'द वाशिंगटन पोस्ट' में एक लेख में 32 वर्षीय अहमद ने संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस से हथियार देने और तालिबान के खिलाफ उनका समर्थन करने की अपील की थी, लेकिन उनके अपील का कोई असर नहीं हुआ। अमेरका ने पूरी तरह से अफगानिस्तान से मुंह फेर लिया है।

    तेज नहीं गुरिल्ला वार

    तेज नहीं गुरिल्ला वार

    तालिबान के नॉर्दर्न एलायंस के मात खाने की बड़ी वजह इस बार गुरिल्ला वार की शुरूआत काफी अंत में करना है। पिछली बार अहमद शाह मसूद ने सोवियत संघ के खिलाफ शुरू से ही गोरिल्ला वार छेड़ रखी थी और उनके सैनिक पहाड़ों में छिपकर रूसी सैनिकों का शिकार करते थे। लेकिन, इस बार ऐसा नहीं हो पाया। अब जबकि गुरिल्ला वार की शुरूआत की गई है, तब तक माना जा रहा है कि बहुत देर हो चुकी है। पिछली बार अहमद शाह मसूद ने पंजशीर की घाटी को सोवियत संघ के सैनिकों के लिए कब्रिस्तान बना दिया था। तालिबान के लड़ाके तो इस बार भी मारे गये हैं, लेकिन उतने नहीं कि तालिबान हार मान ले। अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद ने ब्रिटेन में सैंडहर्स्ट में रॉयल मिलिट्री कॉलेज और किंग्स कॉलेज लंदन में पढ़ाई की और और 2016 वापस अफगानिस्तान आए। लेकिन माना जा रहा है कि अब उनकी स्थिति कमजोर हो रही है।

    भारत ने भी नहीं की मदद

    भारत ने भी नहीं की मदद

    तालिबान के हाथ में पंजशीर का जाना भारत के लिए बहुत बड़ा झटका है और पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ी सफलता। पिछली बार भारत ने नॉर्दर्न एलायंस और अहमद शाह मसूद को पूरा समर्थन दिया था। उस वक्त पंजशीर को भारत ने पैसों से लेकर दूसरी जरूरी तरीकों से काफी मदद दी थी, लेकिन इस बार भारत भी मदद से पीछे हट गया है। पिछली बार जब अहमद शाह मसूद अलकायदा के हमले में बुरी तरह से घायल हुए थे, तो उनका इलाज ताजिकिस्तान में भारत द्वारा बनाए गये और संचालित अस्पताल में किया गया था, लेकिन भारत ने अब वो अस्पताल भी बंद कर दिया है। 13 अगस्त 2001 को अहमद शाह मसूद ने एक टीवी इंटरव्यू के दौरान सार्वजनिक तौर पर कहा था कि भारत के साथ हमारे काफी अच्छे संबंध हैं और भारत ने अफगानिस्तान के लोगों और अफगानिस्तान के प्रवासियों की काफी मदद की है, लिहाजा हम भारत सरकार का आभार जताते हैं। लेकिन, इस बार कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अमेरिका के इशारे पर भारत ने भी अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं, जबकि पाकिस्तान लगातार तालिबान की मदद कर रहा है।

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    English summary
    How did Panjshir, which has been transformed into a fortress since 1990, lost to the Taliban this time? Has Panjshir been betrayed by the democratic countries of the world?
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