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कंधार हारना अफगान सैनिकों के लिए 'मौत की घंटी' बजने जैसा क्यों है? तालिबान की सबसे बड़ी जीत

सीएनएन की इंटरनेशनल रिपोर्टर क्लेरिसा वार्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अफगानिस्तान सरकार अब रणनीतिक तौर पर तालिबान से लड़ाई हार गई है।

कंधार, अगस्त 13: तालिबान ने अफगानिस्तान के दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले शहर कंधार पर कब्जा जमा लिया है और इसके साथ ही अब तय हो गया है कि अफगान सरकार के हाथ से स्थिति मुट्ठी में बंद रेत की तरफ बाहर निकल गई है। लेकिन, कंधार हारना अफगानिस्तान सरकार के लिए सबसे बड़ी हार है और अफगान सैनिकों के लिए मौत की मुनादी की तरफ है। आखिर कंधार हारने के साथ ही अफगानिस्तान सरकार क्यों आधी से ज्यादा लड़ाई हार गई है, आईये जानते हैं।

तालिबान ने कंधार पर किया कब्जा

तालिबान ने कंधार पर किया कब्जा

तालिबान ने अफगानिस्तान के सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थानों में से एक कंधार पर कब्जा कर लिया है और इसकी पुष्टि भी हो गई है। इसके साथ ही तालिबान ने गुरुवार को अफगानिस्तान के तीसरे सबसे बड़े शहर और राजधानी काबुल से सिर्फ 150 किलोमीटर दूर और रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण प्रांतीय राजधानी हेरात पर भी कब्जा कर लिया है, यानि दो ऐसे शहर, जो अफगानिस्तान सरकार के लिए रीढ़ की हड्डी की तरफ थे, उनका अब पतन हो चुका है। अमेरिकी न्यूज चैनल सीएनएन की काबुल रिपोर्टर ने कहा है कि कंधार हारना अफगानिस्तान सरकार की पतन की आखिरी निशानी और कंधार हारने का मतलब ये है कि अफगान सैनिकों के लिए मौत की घंटी बज चुकी है। आपको बता दें कि कंधार अफनागिस्तान के उन शहरों में से है, जहां से राजधानी काबुल को डायरेक्ट मदद पहुंचती है, लेकिन तालिबान द्वारा कंधार पर कब्जे के बाद अब काबुल में सरकार का सुरक्षित रहना भी असंभव सा हो गया है।

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    तालिबान का गढ़ रहा है कंधार

    तालिबान का गढ़ रहा है कंधार

    आपको बता दें कि कंधार हमेशा से तालिबान के लिए एक रणनीतिक गढ़ रहा है और कंधार ही वो जगह है, जहां 1990 के दशक में पहली बार तालिबान ने कब्जा किया था और फिर राजधानी काबुल की सरकार को उखाड़ फेंका था और फिर अफगानिस्तान को इस्लामिक देश घोषित कर दिया था। इसके साथ ही तालिबान के संस्थापक सदस्य मुल्ला उमर का भी जन्म कंधार में ही हुआ था, लिहाजा तालिबान के लिए ये एक बहुत बड़ी इमोशनल जीत भी है। 2001 में अमेरिकी सैनिकों ने 6 लाख आबादी वाले इस शहर से तालिबान को मार भगाया था और उसके करीब 20 सालों के बाद एक बार फिर से तालिबान ने कंधार पर कब्जा कर लिया है। माना जा रहा है कि अब तालिबान काफी तेजी से अफगानिस्तान सैनिकों पर हमला करेगा और एक महीने के अंदर राजधानी काबुल को चारों तरफ से घेर लेगा। इसके साथ ही कंधार एयरपोर्ट अब खतरे में है, जहां अभी भी अफगान सैनिकों का कब्जा है, लेकिन कब तक...कहा नहीं जा सकता।

    सैनिकों के लिए बजी मौत की घंटी?

    सैनिकों के लिए बजी मौत की घंटी?

    सीएनएन की इंटरनेशनल रिपोर्टर क्लेरिसा वार्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अफगानिस्तान सरकार अब रणनीतिक तौर पर तालिबान से लड़ाई हार गई है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ''यदि कंधार का पतन होता है ... यह एक वास्तविक गेम चेंजर मोमेंट होगा और निश्चित रूप से यहां राजधानी काबुल में लोगों को लगता है कि कंधार का तालिबान के हाथों में जाना अफगान सुरक्षा बलों के लिए और अफगान सरकार के लिए मौत की घंटी होगी''। आपको बता दें कि गुरुवार को आतंकवादी समूह तालिबान द्वारा दो और रणनीतिक शहरों पर कब्जा करने के बाद और बारह प्रांतीय अफगानिस्तान की राजधानियां तालिबान के नियंत्रण में हैं, जिससे अफगानिस्तान की राजधानी काबुल तेजी से खतरे में आ गई है और देश के बाकी हिस्सों से कट गई। चश्मदीदों के हवाले से समाचार एजेंस एसोसिएटेड प्रेस ने बताया कि, तालिबान ने गवर्नर के कार्यालय और अन्य इमारतों को जब्त कर लिया है।

    कंधार में कैसे हैं हालात ?

    कंधार में कैसे हैं हालात ?

    तालिबानी प्रवक्ता ने आधिकारिक तौर पर कंधार जीतने का ऐलान किया है। तालिबान के प्रवक्ता ने अपने ट्वीट में कहा है कि, ''कंधार पूरी तरह से जीत लिया गया है। मुजाहिदीन शहर में शहीद चौक पर पहुंच गये हैं''। इससे पहले स्थानीय निवासियों और स्थानीय पत्रकारों ने बताया कि देश का तीसरा सबसे बड़ा शहर हेरात पर भी तालिबान ने कब्जा कर लिया है। वहीं, राष्ट्रीय राजधानी काबुल से लगभग 130 किमी (80 मील) दक्षिण-पश्चिम में स्थित गजनी शहर भी तालिबान के हाथों में जा चुका है। वहीं, अल जज़ीरा के शार्लोट बेलिस ने राजधानी काबुल से रिपोर्ट करते हुए कहा कि, हेरात पर कब्जा तालिबान के लिए एक "बड़ी जीत" थी, और सरकारी बलों के लिए एक "बहुत बड़ी क्षति" थी, क्योंकि तालिबान ने अफगानिस्तान में अब काफी बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है और उन शहरों पर कब्जा करना शुरू कर दिया है, जो अफगानिस्तान को चलाते हैं।

    घुटनों पर अफगान सरकार!

    घुटनों पर अफगान सरकार!

    वहीं, अब कतर में अफगान सरकार के वार्ताकारों ने देश में जंग खत्म करने के लिए तालिबान को सत्ता में साझेदारी करने का ऑफर दिया है। गुरुवार को सरकारी वार्ताकारों के सूत्रों के हवाले से एएफपी ने ये खबर दी है। सूत्र ने कहा है, 'हां, सरकार ने कतर के सामने मध्यस्थ के तौर पर एक प्रस्ताव रखा है। प्रस्ताव के मुताबिक देश में हिंसा रोकने के बदले तालिबान को साथ सत्ता में साझेदारी की इजाजत होगी।' दरअसल, गुरुवार को तालिबान ने अफगानिस्तान के गजनी जैसे रणनीतिक शहर पर भी कब्जा कर लिया है। यह शहर काबुल से महज 150 किलोमीटर की दूरी पर है। एक हफ्ते में उसने 10 प्रांतों की राजधानियों पर कब्जा कर लिया है, जिसमें गजनी को उनकी सबसे अहम कामयाबी माना जा रहा है।

    सबसे बड़ा मानवीय संकट

    सबसे बड़ा मानवीय संकट

    जिस तेज गति से तालिबान अफगानिस्तान की जमीन पर कब्जा कर रहा है, उससे यह सवाल उठता है कि आखिर अफगान सरकार कितने समय तक देश के उन हिस्सों पर नियंत्रण बनाए रख सकती है, जहां अभी उसकी हुकूमत है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (OHCHR) के कार्यालय ने मंगलवार को चेतावनी दी है कि बढ़ती हिंसा और मानवाधिकारों के उल्लंघन और हनन को रोकने में विफलता से अफगानिस्तान के लोगों के लिए आने वाले वक्त में विनाशकारी परिणाम सामने आएंगे। विभिन्न स्थानीय समाचार रिपोर्टों में कहा गया है कि अमेरिका और नाटो बलों की वापसी के बाद तालिबाने बड़ी भारी संख्या में बेगुनाओं का कत्ल किया है। वहीं, अफगानिस्तान में महिलाओं और बच्चियों की हत्या के मामलों में 50 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। अफगानिस्तान मीडिया के मुताबिक सिर्फ इस साल अभी तक तालिबान ने कम से कम 468 बच्चों की हत्या कर दी है।

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