Pokhran-I: 50 साल पहले इंदिरा गांधी ने उड़ा दिए थे अमेरिका के होश.. जानिए पोखरण में पहले परमाणु टेस्ट की कहानी
50 year of Pokhran-I: आज से ठीक 50 साल पहले आज के ही दिन 1974 में भारत ने पहले परमाणु बम का परीक्षण करके दुनिया के साथ साथ अमेरिका को भी हिला कर रख दिया था।
18 मई 1974 वो ऐतिहासिक दिन था, जब भारत ने 'स्माइलिंग बुद्धा' ऑपरेशन को अंजाम दिया था और इस प्रोजेक्ट के तहत राजस्थान के पोखरण में अपना ऐतिहासिक पहला परमाणु परीक्षण किया था। हालांकि, जब तक भारत ने वास्तव में परमाणु परीक्षण नहीं कर लिया था, तब तक इस प्रोजेक्ट को काफी ज्यादा सीक्रेट रखा गया था, क्योंकि उस वक्त अमेरिका के साथ साथ कई वैश्विक शक्तियों ने परमाणु हथियार वाले राज्यों के प्रसार को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया था।

लेकिन, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कामयाब परीक्षण के बाद दुनिया को इसकी जानकारी दी और भारत के इस प्रोजेक्ट को लेकर कहा, कि "शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट" किया गया है, तो दुनिया के पैरों तले जमीन खिसक गई। खासकर भारत के परमाणु परीक्षण ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांचों सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और यूनाइडेट किंगडम की भौंहें चढ़ा दी।
लेकिन, आखिर भारत ने पहला परमाणु परीक्षण क्यों किया था? इसके क्या मतलब थे और दूसरे परमाणु परीक्षण, जिसे अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के समय किया गया था, उससे ये किस तरह से अलग था, आइये समझते हैं।
उस वक्त दुनिया में क्या चल रहा था?
साल 1945 में दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हो गया, जिसमें लाखों-लाख लोग मारे गये थे और दुनिया ने एक अभूतपूर्व तबाही देखी थी। दुनिया ने पहली बार देखा, कि परमाणु हथियार किस तरह से विनाश फैला सकती है। युद्ध खत्म होने के बाद दुनिया में एक बार फिर से नये नये गुट और वैश्विक गठबंधन बनने लगे।
अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ ने अपनी अपनी वैचारिक और आर्थिक श्रेष्ठता साबित करने के लिए एक छद्म युद्ध शुरू कर दिया था, जिसे शीत युद्ध कहा जाता है।
अगस्त 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में अमेरिका ने जापान के शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर दो परमाणु बम गिराए थे, जिसने जापान को आत्म समर्पण के लिए मजबूर कर दिया था और इस घटना के सिर्फ चार सालों के बाद ही, यानि साल 1949 में सोवियत संघ ने भी अपना पहला परमाणु परीक्षण कर लिया। जिसके बाद इन देशों ने मिलकर फैसला किया, कि बड़े पैमाने पर तबाही को रोकने के लिए परमाणु हथियार रखने वाले देशों को कुछ नियम बनाने की आवश्यकता है।
और साल 1968 में परमाणु शांति बनाए रखने के मकसद से एक संधि पर हस्ताक्षर किए गये, जिसे परमाणु अप्रसार संधि यानि NPT कहा जाता है। एनपीटी संधि के तहत एक सीमा रेखा खिंची गई, जिसके तहत ये फैसला लिया गया, कि 1 जनवरी 1967 से पहले जिन देशों ने परमाणु हथियार बना लिए, सिर्फ उन्हीं देशों को परमाणु संपन्न देशों के तहत मान्यता मिलेगी। इसके तहत वही पांच देश आए, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य थे, यानि अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम थे, जिन्हें P-5 देश कहा जाता है।

NPT संधि के तहत कुछ अहम फैसले लिए गये। जैसे..
- NPT में शामिल देश परमाणु हथियार या फिर परमाणु हथियार बनाने की टेक्नोलॉजी किसी भी अन्य देश को ट्रांसफर नहीं करेगा।
- NPT में शामिल गैर-परमाणु देश इस बात पर सहमत हुए, कि वे परमाणु हथियार हासिल नहीं करेंगे, विकसित नहीं करेंगे।
- NPT पर साइन करने वाले सभी देश अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की तरफ से बनाए गये परमाणु हथियारों के प्रसार के खिलाफ सुरक्षा उपायों को प्रस्तुत करने पर सहमत हुए। इस संधि में शामिल होने वाले देश परमाणु हथियारों की रेस को खत्म करने और परमाणु टेक्नोलॉजी के प्रसार को सीमित करने में मदद करने पर भी सहमत हुए।
भारत ने पहला परमाणु परीक्षण क्यों किया था?
लेकिन, भारत ने NPT संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। क्योंकि, अगर भारत हस्ताक्षर कर देता, तो फिर भारत कभी भी परमाणु हथियार का निर्माण नहीं कर सकता था।
भारत ने इस संधि पर इस आधार पर आपत्ति जताई, कि यह पी-5 को छोड़कर अन्य देशों के लिए भेदभावपूर्ण है। भारत के विदेश नीति पर रिसर्च करने वाले सुमित गांगुली ने लिखा है, कि "भारत सरकार ने संधि की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया, क्योंकि यह संधि भारत की चिंताओं को दूर करने में नाकाम रही, खासकर इस संधि में ये भी कहा गया था, कि जिन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, वो भविष्य में भी नहीं बनाएंगे, लेकिन जिन देशों ने परमाणु हथियार तैयार कर लिए हैं, वो इन हथियारों के साथ क्या करेंगे और क्या वो भविष्य में नये परमाणु हथियारों का निर्माण नहीं करेंगे, इसको लेकर साफ साफ कुछ नहीं कहा गया था।
दूसरी तरफ, भारत के महान वैज्ञानिकों होमी जहांगीर भाभा और विक्रम साराभाई ने भारत में परमाणु ऊर्जा के परीक्षण के लिए पहले ही आधार तैयार कर लिया था। 1954 में, परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) की स्थापना की गई, जिसके डायरेक्टर भाभा थे।
परमाणु ऊर्जा के शुरुआती समर्थक, भाभा ने एक बार लिखा था, "परमाणु हथियारों के अलावा, जब अब से कुछ दशकों में बिजली उत्पादन के लिए परमाणु ऊर्जा को सफलतापूर्वक लागू किया जाएगा, तो भारत को अपने विशेषज्ञों के लिए विदेशों की ओर नहीं देखना पड़ेगा, बल्कि भारत को परमाणु ऊर्जा घर में ही तैयार मिलेंगे।" लेकिन, तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू परमाणु हथियारों और सामान्य तौर पर हथियारों की खरीद के विस्तार पर संदेह करते रहे।
लेकिन, 1962 में चीन से युद्ध हारने के बाद भारत गुस्से में था और फिर 1965 और 1971 में पाकिस्तान ने भी भारत पर हमला कर दिया। इन दोनों युद्धों को तो भारत ने जीत लिया, लेकिन इन लड़ाइयों ने भारत के भविष्य की दिशा बदल दी। क्योंकि, 1964 में चीन ने भी अपना पहला परमाणु परीक्षण कर लिया। लिहाजा, भारत में भी परमाणु हथियार बनाने की मांग की जाने लगी।
पोकरण-1 को कैसे दिया गया अंजाम?
पंडित नेहरू किसी भी तरह के परमाणु हथियार के खिलाफ थे, लेकिन इंदिरा गांधी की सोच नेहरू से अलग थी। नेहरू शांति के पक्षधर थे, तो इंदिरा गांधी आक्रामक नेता मानी जाती थीं। लिहाजा, इंदिरा गांधी की सरकार ने P-5 देशों के NPT संधि को देखते हुए बिना दुनिया को कोई जानकारी दिए परमाणु परीक्षण करने का फैसला लिया।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट इंदर मल्होत्रा ने इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में लिखा है, कि भारत ने परमाणु परीक्षण का फैसला तो कर लिया था, लेकिन अंत अंत कर इसको लेकर अनिश्चितता बनी थी। क्योंकि, तत्कालीन परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष राजा रमन्ना और इंदिरा गांधी के दो शीर्ष सलाहकार पीएन हक्सर और पीएन धर परमाणु हथियार के परीक्षण के खिलाफ थे और परमाणु परीक्षण को स्थगित करना चाहते थे।
जबकि, परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी सेठना ने कोई राय नहीं दी। वहीं, रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार डी नाग चौधरी ने इसके फायदे और नुकसान पर बहस शुरू की, लेकिन प्रधानमंत्री ने उनकी बात टाल दी और डॉ. रमन्ना से आगे बढ़ने को कहा। प्रधानमंत्री गांधी ने कहा, 'कृपया आगे बढ़ें, यह देश के लिए अच्छा होगा।' और प्रधानमंत्री के आदेश के बाद ही अगली सुबह 'बुद्ध मुस्कुरा उठे।' (मिशन स्माइलिंग बुद्धा)।
18 मई 1974 को 12-13 किलोटन टीएनटी की शक्ति के साथ एक परमाणु उपकरण का विस्फोट किया गया था। पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान में स्थित एक सेना परीक्षण रेंज पोखरण को परमाणु परीक्षण के लिए चुना गया था। लगभग 75 शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों की एक टीम शामिल थी। इसका कोड नाम 'स्माइलिंग बुद्धा' चुना गया, क्योंकि उस दिन भगवान बुद्ध की जयंती थी।
परमाणु परीक्षण के बाद क्या हुआ?
18 मई 1974 को भारत ने दुनिया को दिखा दिया, कि वह किसी भी विषम परिस्थिति में अपनी रक्षा कर सकता है और उसने पोखरण में परीक्षण किए गए परमाणु उपकरण को तुरंत हथियार नहीं बनाने का फैसला किया। क्योंकि, ऐसा 1998 के पोखरण-II परीक्षणों के बाद ही होना था।
भारत ने 1974 में परमाणु उपकरण का विस्फोट किया था, जिसका मतलब था, कि भारत के पास किसी भी वक्त परमाणु बम बनाने की शक्ति आ गई है, लेकिन भारत ने कहा, कि वो अभी हथियार नहीं बनाएगा। बाद में 1998 में अटल बिहारी बाजपेयी ने पोखरण में परमाणु बम का विस्फोट किया था।
इंदिरा गांधी की सरकार ने परमाणु उपकरण का टेस्ट कर दुनिया को चौंका दिया था। खासकर अमेरिका आगबबूला हो गया।
साल 1978 में अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने परमाणु अप्रसार अधिनियम पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद अमेरिका ने भारत को परमाणु सहायता निर्यात करना बंद कर दिया। अमेरिका अपने इस फैसले पर 2005 में उस वक्त तक बना रहा, जब 18 जुलाई 2005 अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने पहली बार वाशिंगटन में परमाणु समझौते में प्रवेश करने के अपने इरादे की घोषणा की।
लेकिन, इस बीच अमेरिका ने 48 देशों का एक ग्रुप Nuclear Suppliers Group (NSG) का गठन किया, जो परमाणु ऊर्जा से संबंधित सप्लायर देशों का समूह है, जिसके तहत परमाणु हथियारों के प्रसार को नियंत्रित करने के मकसद से परमाणु उपकरणों के निर्यात के लिए कुछ नियम बनाए गये और शर्त रखी गई, कि इस ग्रुप में शामिल होने के लिए सभी सदस्य देशों की आम सहमति आवश्यक है।
भारत साल 2008 से ही NSG में शामिल होने की कोशिश कर रहा है, ताकि भारत को भी परमाणु ऊर्जा के कॉमर्शियल इस्तेमाल की इजाजत मिले और भारत को भी परमाणु उपकरण बेचने की इजाजत मिले, लेकिन अभी तक भारत को इसमें एंट्री नहीं मिली है। पहले ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों ने भारत का विरोध किया था, लेकिन अब सिर्फ चीन ही भारत की राह में रोड़ा है। मेक्सिको और स्विट्जरलैंड वो लेटेस्ट देश हैं, जिन्होंने NSG में भारत के प्रवेश का समर्थन किया है, लेकिन चीन का विरोध बना हुआ है।
यह एक बड़ी वजह थी, कि 1974 में परमाणु उपकरण के टेस्ट के बाद परमाणु बम का परीक्षण नहीं किया था और 1998 में ही जाकर भारत ने न्यूक्लियर टेस्ट नहीं किया। हालांकि, बाद के सालों में भारत ने खुद को जिम्मेदार परमाणु शक्ति के तौर पर पेश किया है, जो भारत को NSG जैसे ग्रुप में शामिल होने के लिए रास्ता खोलता है।
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