श्रीलंका से रिश्ते सँवारने को लेकर भारत जल्दी में क्यों
श्रीलंका के नए राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे भारत आए हुए हैं. वो इस दो दिवसीय दौरे के लिए गुरुवार शाम दिल्ली पहुंचे.
श्रीलंका के राष्ट्रपति के तौर पर गोटबाया राजपक्षे की ये पहली आधिकारिक विदेश यात्रा है. वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर भारत आए हैं.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ इस यात्रा के दौरान श्रीलंका के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री मोदी के साथ रणनीतिक द्विपक्षीय रिश्तों को गहरा करने पर बातचीत करेंगे. राष्ट्रपति गोटभाया शुक्रवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात करेंगे.
इससे पहले 19 नवंबर को भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर अघोषित दो दिवसीय दौरे पर कोलंबो पहुंचे थे. वह राष्ट्रपति राजपक्षे से मुलाक़ात करने वाले पहले विदेश मंत्री थे.
श्रीलंकाई अधिकारियों ने बताया कि जयशंकर के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक पत्र था जिसमें राजपक्षे को निजी तौर पर बधाई दी गई थी और उन्हें भारत की यात्रा करने का न्योता दिया गया था.

इतनी जल्दबाज़ी क्यों?
अब तक तो यह देखने को मिलता था कि श्रीलंका के शासन प्रमुख अपने देश में निर्वाचित होने के ठीक बाद भारत का दौरा किया करते थे, नई दिल्ली में उनके स्वागत का समारोह भी होता था.
इसकी वजह दोनों देशों की बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध ही नहीं थे, बल्कि इस क्षेत्र में भारत का दबदबा होना भी था.
लेकिन इस बार लोगों को अचरज हुआ क्योंकि श्रीलंका में गोटाभाया राजपक्षे के राष्ट्रपति चुने जाने के तुरंत बाद भारत ने अपने विदेश मंत्री एस जयशंकर को श्रीलंका भेजा. दो वजहों के चलते यह चौंकाने वाला क़दम लगा.
पहली बात तो यही है कि भारत ने राजपक्षे के भारत आने का इंतज़ार नहीं किया, बल्कि एस जयशंकर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शुभकामना संदेश के साथ भेजा. दूसरी बात यह है कि राजपक्षे का रूझान चीने के प्रति कहीं ज्यादा माना जाता है और भारत को राजपक्षे विरोधी के तौर पर देखा जाता था.

राजपक्षे का चीन के प्रति झुकाव
विश्लेषकों का भी मानना है कि राजपक्षे का चीन के प्रति झुकाव देखते हुए ही भारत, श्रीलंका को अपने साथ लेने की हड़बड़ी दिखा रहा है.
हालांकि कुछ दूसरे विश्लेषकों को गोटाभाया का भारत आने के लिए तैयार होना भी अचरज में डाल रहा है. राष्ट्रपति के तौर पर पदभार संभालने के बाद गोटाभाया सबसे पहले भारत का ही दौरा कर रहे हैं.
श्रीलंका के साथ संबंध को लेकर भारत इतनी हड़बड़ी में क्यों हैं, ये सवाल पूछे जाने पर श्रीलंका में काम कर चुकीं वरिष्ठ पत्रकार निरुपमा सुब्रमण्यम बताती हैं, "पहले तो श्रीलंकाई नेता भारत का दौरा किया करते थे, लेकिन चीन की वजह से गोटाभाया के चुनाव के बाद एस जयशंकर को श्रीलंका का दौरा करना पड़ा."
श्रीलंका से अपने संबंधों को बेहतर बनाने के लिए भारत को क्या कुछ करना चाहिए, इसके जवाब में निरुपमा बताती हैं कि कोई एक बात नहीं है, कई मुद्दों पर काम करने की ज़रूरत है.
उन्होंने कहा, "खासकर जिस तरह से माना जाता है कि महिंदा राजपक्षे की हार में भारत की भूमिका थी, उसे देखते हुए भारत को श्रीलंका को समझाना होगा कि जो बीत चुका है, वो बीत चुका है और अब वह वर्तमान में संबंधों को बेहतर बनाने को इच्छुक है."
वहीं फ्रांस में रह रहे और श्रीलंकाई डायसपोरा पर नज़र रखने वाले तमिल लेखक गोरिपाल सातिरी, गोटाभाया के भारत दौरे पर आने के लिए तैयार होने को अमरीका से जोड़कर देखते हैं.
गोटाभाया की छवि चीन समर्थक की है, ऐसे में उनके भारत आने पर सातिरी कहते हैं, "उन्होंने दावा किया है कि वे अपनी अमरीकी नागरिकता त्याग चुके हैं, लेकिन इसकी पुष्टि अभी अमरीकी अधिकारियों ने नहीं की है. हो सकता है अमरीका इस पहलू को लेकर गोटाभाया पर दबाव बना रहा हो ताकि वे चीन की ओर बढ़ने से पहले सोचें, विचारें."

लेकिन सवाल यही है कि भारत श्रीलंका में क्या कुछ करना चाहता है और श्रीलंका उसके लिए किस हद तक तैयार होता है?
आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के चेन्नई इनिशिएटिव के प्रमुख एन सत्यमूर्ति बताते हैं कि श्रीलंका चीन और पाकिस्तान के दबाव में आए, उससे पहले भारत अपनी बातचीत के रास्ते शुरू करना चाहता है.
वे कहते हैं, "भारत सिरिसेना के शासनकाल से भी खुश नहीं था. सिरिसेना ने उम्मीदों के बावजूद चीन पर भारत को तरजीह नहीं दी.
रणनीतिक तौर पर त्रिन्कोमाली पोर्ट प्रोजेक्ट पर भारत की नज़र थी, लेकिन सिरिसेना के शासनकाल में इसे विकसित करने का काम भारत को नहीं मिला."
सत्यमूर्ति के मुताबिक गोटाभाया के भारत दौरे में कुछ नाटकीय होने की उम्मीद कम है. इस यात्रा के दौरान कई मुद्दों पर बात होगी लेकिन पहले दौरे में किसी तरह के समझौते होने की उम्मीद नहीं है.
वे कहते हैं, "दोनों देश द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एक दूसरे के विचार को जानने की कोशिश करेंगे, उसे आंकने की कोशिश करेंगे."
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