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फिनलैंड, स्वीडन क्यों छोड़ना चाहते हैं अपनी तटस्थता, नाटो से क्यों डरता है रूस?

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फिनलैंड नाटो में शामिल होने का ऐलान कर चुका है। जबकि स्वीडन अगले सप्ताह नाटो में शामिल होने की घोषणा कर सकता है। युक्रेन युद्ध से पहले नाटो में शामिल होने के लिए फिनलैंड में जनमत सर्वेक्षण कराया गया। इसके मुताबिक करीबन 30 फीसदी लोगों ने नाटो में शामिल होने के पक्ष में सहमति दी। लेकिन अब फिनलैंड की 70 फीसदी अधिक नागरिक नाटो में शामिल होना चाहती हैं। इसके साथ ही देश का शीर्ष नेतृत्व भी, स्वीडेन के साथ मिलकर, नाटो में शामिल होने का प्रयास कर रहा है।

चार महीने बाद ही बदले हालात

चार महीने बाद ही बदले हालात

बीते साल दिसंबर में फिनलैंड की प्रधानमंत्री ने इसकी बेहद कम संभावना बतायी थी। लेकिन चार महीने बाद हालात और जज्बात दोनों ही बदल चुके हैं। यहां आपको जानने की जरूरत है कि आखिर कैसे रूस-युक्रेन युद्ध ने दोनों देशों को नाटो में शामिल होने करीब पहुंचा दिया है। जबकि नॉर्वे, डेनमार्क और आइसलैंड जैसे अन्य नॉर्डिक देश नाटो के मूल सदस्य थे, स्वीडन और फिनलैंड ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक कारणों से इसमें शामिल नहीं हुए। फिनलैंड ने 1917 में बोल्शेविक क्रांति के बाद रूस से स्वतंत्रता की घोषणा की और स्वीडन ने शीत युद्ध के दौरान तटस्थ विदेश नीति के रुख को अपनाया। इन दोनों ने ही सोवियत संघ या संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ गठबंधन करने से इनकार कर दिया।

नाटो में शामिल होने से करते रहे परहेज

नाटो में शामिल होने से करते रहे परहेज

फ़िनलैंड के लिए, यह अधिक कठिन साबित हुआ, क्योंकि इसने रूस जैसी सत्तावादी महाशक्ति के साथ एक विशाल सीमा साझा की। शांति बनाए रखने के लिए, फिनलैंड ने "फिनलैंडाइजेशन" नामक एक प्रक्रिया को अपनाने के लिए बाध्य होना पड़ा, जिसमें नेताओं ने समय-समय पर सोवियत मांगों को स्वीकार किया। सोवियत संघ के पतन के साथ ही दोनों देशों के संतुलनकारी कार्य प्रभावी ढंग से समाप्त हो गए। वे चार साल बाद 1995 में एक साथ यूरोपीय संघ में शामिल हुए और धीरे-धीरे अपनी रक्षा नीतियों को पश्चिम के साथ जोड़ दिया। हालांकि वक्त मुफीद होने के बाद दोनों ही देशों ने नाटो में शामिल होने से परहेज किया। यूरोपीय संघ के साथ मिलकर नाटो समझौते पर दस्तखत करने से बचने के लिए दोनों ही देशों के पास अलग-अलग कारण थे। फिनलैंड के लिए यह भू-राजनैतिक अधिक था। फिनलैंड की रूस के साथ साझा सीमा 830 मील की है। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। यूक्रेन पर आक्रमण ने इन दोनों देशों को चौकन्ना कर दिया है।

नाटो के बारे में जानिए

नाटो के बारे में जानिए

नाटो का पूरा नाम नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन है। अमेरिका की अगुआई में स्थापित किया सैन्य संगठन है जो शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ केविस्तार के खतरे को रोकने के लिए बनाया गया था। 4 अप्रैल 1949 को अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस समेत 12 देशों ने सोवियत यूनियन का मुकाबला करने के लिए इसकी स्थापना की थी। NATO में अब 30 सदस्य देश हैं, जिनमें 28 यूरोपीय और दो उत्तर अमेरिकी देश हैं। उत्तरी मेसोडोनिया वह अंतिम देश था जो 2020 में इसका हिस्सा बना। उससे पहले 2017 में मोंटेनेग्रो, 2009 में अल्बानिया और क्रोएशिया, 2004 में बुल्गारिया, एस्टोनिया, लातविया, लिथुवानिया, रोमानिया, स्लोवाकिया जैसे देश इसका हिस्सा बने।

नाटो का आर्टिकल 5 है खास

नाटो का आर्टिकल 5 है खास

इस संगठन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नाटों देशों और उसकी आबादी की रक्षा करना है। NATO के आर्टिकल 5 के अनुसार इसके किसी भी सदस्य देश पर हमले करना, नाटो के सभी देशों पर हमला माना जाएगा। उदाहरण के लिए आइसलैंड के पास अपनी सेना नहीं है। लेकिन फिर भी उसे किसी देश से खतरा नहीं है। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद भी यह संगठन ना केवल कायम रहा बल्कि इसका तेजी से विस्तार भी हुआ। बहुत से देश जो शीत युद्ध में सोवियत संघ के निकट थे अब धीरे धीरे नाटो में शामिल होने लगे। अब यूक्रेन, फिनलैंड और स्वीडन भी नाटो में शामिल होना चाहते हैं।

रूस ने जाहिर की नाराजगी

रूस ने जाहिर की नाराजगी

नाटो का विस्तार रूस के लिए संवेदनशील मुद्दा है। वह इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताता है। यूक्रेन पर हमले के पीछे भी यह एक बड़ी वजह बतायी जाती है। रूस की 1300 किमी लंबी सीमा फिनलैंड से मिलती है। उसके लिए फिनलैंड एक बफर स्टेट है। रूस नहीं चाहता कि नाटो उसके इतने नजदीक आए। इसीलिए रूस, फिनलैंड के भी नाटो में जाने का विरोध करता है। उम्मीद के मुताबिक रूस ने भी अपनी नाराजगी जताते हुए दोनों देशों को चेतावनी भी जारी कर दी है। रूस ने कहा है कि अगर ऐसा होता है तो इसके गंभीर राजनैतिक परिणाम होंगे। इससे पहले रूस ने नाटो को चेतावनी दी थी कि अगर फिनलैंड नाटो में शामिल हुआ तो रूस, यूरोप के बाहरी इलाके में परमाणु हथियार तैनात कर देगा।

रूस की चेतावनी कितनी गंभीर है

रूस की चेतावनी कितनी गंभीर है

रूस की चेतावनी के बाद यह अंदेशा जाहिर किया जा रहा है कि फिनलैंड और स्वीडन पर भी यूक्रेन की तरह हमला न हो जाए। हालांकि इस पर विशेषज्ञों की अलग राय है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि रूस जिस तरह की धमकियां दे रहा है वह कुछ और नहीं बल्कि उसकी निराशा और असंतोष को दिखाता है। उनका तर्क है कि रूस की सेना यूक्रेन में युद्ध में शामिल है और ऐसे में वह वही उलझा हुआ है। वह इस स्थिति में नहीं है कि वह फिनलैंड पर हमला कर सके। अगर वह इन दोनों देशों पर हमला करता है तो आर्थिक तौर पर बुरी तरह से टूट जाएगा।

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English summary
Why Finland, Sweden want to leave their neutrality, why Russia is afraid of NATO
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