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हक्कानी नेटवर्क और तालिबान को अमेरिका ने अलग अलग क्यों कहा? क्या हार से हताशा में हैं बाइडेन?

व्हाइट हाउस प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा है कि हक्कानी नेटवर्क और तालिबान अलग अलग संगठन हैं। जबकि हकीकत ये है कि तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर का बेटा हक्कानी नेटवर्क में नंबर-2 की हैसियत रखता है।

काबुल/वॉशिंगटन, अगस्त 28: हक्कानी नेटवर्क और तालिबान को दो अलग-अलग संगठन बताना कुछ और नहीं, बल्कि अफगानिस्तान से अमेरिका के और जल्दी निकलने के पीछे की हड़बड़ाहट को दिखाता है। अमेरिका ने कहा है कि तालिबान और हक्कानी नेटवर्क दो अलग अलग ग्रुप्स हैं, जिसके बाद अमेरिका के अफगानिस्तान को लेकर 'अर्ध्यज्ञान' की चर्चा हर जगह हो रही है और विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले 20 सालों से अफगानिस्तान में रहने के बाद भी अमेरिका या तो हक्कानी नेटवर्क और तालिबान को समझ नहीं पाया है या फिर अमेरिका झूठ बोल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि व्हाइट हाउस प्रवक्ता नेड प्राइस ने हक्कानी नेटवर्क और तालिबान को दो अलग अलग संगठन बताकर अपने उथले ज्ञान का परिचय दिया है।

हताशा में झूठ बोल रहा अमेरिका?

हताशा में झूठ बोल रहा अमेरिका?

व्हाइट हाउस प्रवक्ता नेड प्राइस के झूठ के पीछे की वजह तो समझ में आ सकती है, लेकिन अगर अमेरिका का विदेश विभाग की भी यही समझ है, तो इसका मतलब साफ है कि दुनियाभर में आतंकवाद के खिलाफ चलने वाली ये जंग अब पूरी तरह से बर्बाद हो गई है। जो बाइडेन का लापरवाह प्रशासन तालिबान के हाथ में उन अमेरिकी लोगों की लिस्ट को सौंप रहा है, जो अफगानिस्तान में फंसे हुए हैं और अमेरिका चाह रहा है कि उन्हें तालिबान खोजे और इसी मुद्दे पर अमेरिका ने कहा कि हक्कानी नेटवर्क और तालिबान अलग-अलग समूह हैं। लेकिन, अमेरिका के इस झूठ की पोल तभी खुल गई। क्योंकि, अफगानिस्तान की जानकारी रखने वाला हर एक शख्स जानता है कि तालिबान की स्थापना करने वाला आतंकी मुल्ला उमर को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में हक्कानिया में स्थिति दारुल उलूम में कट्टरपंथी बनाया गया था, जहां से हक्कानी नेटवर्क नाम आया है।

हक्कानी नेटवर्क को जानिए

हक्कानी नेटवर्क को जानिए

हक्कानी नेटवर्क पाकिस्तान में बनाया गया एक अत्यंत खतनाक, कट्टरपंथी जिहाद आतंकी संगठन है, जिसके दो सदस्य और तालिबान के उप नेता सिराजुद्दीन हक्कानी और तालिबान के दूत खलील हक्कानी के सिर पर 15 मिलियन अमरीकी डालर का इनाम है। एक अन्य रिश्तेदार अनस हक्कानी तालिबान के विभिन्न गुटों और पंजशीरी प्रतिरोध के बीच बातचीत के केंद्र में है। हकीकत ये है कि अफगानिस्तान की राजधानी काबुल, हक्कानी नेटवर्क के 6,000 से ज्यादा हत्यारे आतंकियों के नियंत्रण में है। जिसमें मुल्ला उमर का बेटा मुल्ला याकूब नंबर-2 की हैसियत रखता है। यानि, तालिबान को बनाने वाला मुल्ला उमर का बेटा मुल्ला याकून हक्कानी नेटवर्क में नंबर-2 की हैसियत रखता है, जिसे अमेरिका ने तालिबान से अलग संगठन बताया है।

सारे आतंकी संगठनों का लक्ष्य बस एक

सारे आतंकी संगठनों का लक्ष्य बस एक

पाकिस्तान में दर्जनों आतंकी संगठनों ने जन्म लिया है और आतंकी संगठनों के लिए पाकिस्तान ना सिर्फ उर्वरक जमीन है, बल्कि पाकिस्तान में आतंकियों को पाला भी जाता है, ताकि वो लोकतांत्रिक देशों में अशांति पैदा करे और पाकिस्तान उन देशों को ब्लैकमेल कर सके। लिहादा, जितने भी आतंकी संगठन हैं, उनमें वैचारिक स्तर पर भले ही कुछ मतभेद हो सकते हैं, लेकिन ये तमाम आतंकी संगठन लोकतांत्रिक देशों में अशांति फैलाने के नाम पर एक हो जाते हैं। ये तमाम मुस्लिम आतंकी संगठनों का निर्माण पश्चिमी देशों के खिलाफ जहर उगलकर किया गया है और इन आतंकी संगठन को इस कदर जहरीला बनाया गया है कि ये शिया मुसलमानों का कत्लेआम करने से भी नहीं हिचकते।

पाकिस्तान में पले हैं सभी संगठन

पाकिस्तान में पले हैं सभी संगठन

जब पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा को काबुल स्थिति भारतीय दूतावास पर हमला करना था, तो उसके आतंकियों को काबुल में हक्कानी नेटवर्क ने रहने-खाने से लेकर तमाम सुविधाएं मुहैया कराई और जैसे इस वक्त अगर इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान काबुल एयरपोर्ट पर हमला कर रहा है तो कुछ लोग उसे अलग संगठन बता रहे हैं, लेकिन ऐसे लोग इस बात पर पर्दा डाल देते हैं कि इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान को भी पाकिस्तान से दिशा-निर्देश मिलते हैं और एक बार वो रावलपिंडी के इशारे पर भारतीयों पर हमला कर चुका है।

जैश-ए-मोहम्मद का उदाहरण

जैश-ए-मोहम्मद का उदाहरण

मुफ्ती रऊफ अजहर के नेतृत्व में जैश-ए-मोहम्मद पाकिस्तानी सीमा के दोनों ओर सक्रिय हैं। इस आतंकी संगठन ने दक्षिणी अफगानिस्तान में तालिबान के साथ अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना से लड़ाई लड़ी। जबकि यह खैबर दर्रे में हक्कानी नेटवर्क के साथ प्रशिक्षण शिविरों का हिस्सा लिया। अगर नेड प्राइस को इसे समझने में कोई कठिनाई होती है, तो उन्हें यूके की खुफिया जानकारी से पूछना चाहिए, कि रावलपिंडी के साथ अपने विरासत संबंधों के कारण अमेरिकियों ने पूरी अफगान नीति को किसके लिए आउटसोर्स किया था।

अमेरिका ने क्यों बोला सफेद झूठ?

अमेरिका ने क्यों बोला सफेद झूठ?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि जो बाइडेन और उनकी टीम लगातार अफगानिस्तान के मुद्दे पर झूठ बोल रही है और हक्कानी नेटवर्क और तालिबान को अलग अलग बताना अमेरिका का सबसे शातिर झूठ है, जिसका मकसद है कि अब अमेरिका के लिए अफगानिस्तान कोई मतलब नहीं रखता है। हकीकत ये है कि तालिबान और हक्कानी नेटवर्क...दोनों का पेट एक है। तालिबान जिस हाथ से मासूमों का गला काटता है, वो हाथ हक्कानी नेटवर्क है और पाकिस्तान ही इनका मां-बाप है। और अब इस बात पर भी मुहर लग गई कि सोवियत संघ और ब्रिटिश राज के बाद अफगानिस्तान एक और साम्राज्य के लिए कब्रिस्तान साबित हो गया है और अब एशियाई देशों को तय करना है कि वो इन आतंकी संगठनों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं और अपने अपने देश में कितनी शांति बरकरार रख पाते हैं।

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