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Iran में सर्वोच्च सत्ता किसके पास होती है? ‘रहबर’ से संसद तक, वो 5 शक्तियां जो चलाती हैं शिया मुल्क की सरकार

Who Rules Iran: ईरान में छिड़े भीषण युद्ध और वैश्विक तनाव के बीच ईरान के 'सुल्तान' के मारे जाने के बाद ईरान और मिडिल ईस्ट में एक युग का अंत हो गया। 1 मार्च 2026 को ईरान के सबसे ताकतवर नेता अली खामेनेई के निधन के बाद अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ईरान की सत्ता का 'असली मालिक' कौन होगा।

क्या राष्ट्रपति, संसद या सेना देश चलाती है, या फिर असली सत्ता किसी और के हाथ में है? ईरान की शासन व्यवस्था दुनिया के अन्य देशों से बिल्कुल अलग है, जहां लोकतंत्र और धर्मतंत्र का एक अनोखा मेल देखने को मिलता है।

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इसका सीधा और स्पष्ट जवाब है ईरान में सर्वोच्च रैंक और सबसे ज्यादा ताकत 'रहबर' यानी सुप्रीम लीडर के पास होती है।

Iran leadership structure: ईरान की वो 5 शक्तियां जो चलाती हैं सरकार

दरअसल, ईरान में राष्ट्रपति और संसद भले ही जनता चुनती हो, लेकिन वहां की असल ताकत एक ऐसे पद के पास होती है जिसे 'रहबर' या 'सुप्रीम लीडर' कहा जाता है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद वजूद में आया यह पद ईरान को एक तरह की 'तानाशाही' व्यवस्था में बदल देता है, जहां एक ही व्यक्ति के पास सेना, न्यायपालिका और विदेश नीति के अंतिम फैसले लेने का अधिकार होता है।

Rahbar powers Iran: रहबर यानी खुदा का नुमाइंदा और सेना का सेनापति

ईरान में 'रहबर' सिर्फ एक राजनीतिक पद नहीं, बल्कि एक धार्मिक सर्वोच्चता का प्रतीक है। इसके पास असीमित ताकत होती है। रहबर ही तय करते हैं कि सरकार की दिशा क्या होगी। वे देश की सभी सशस्त्र सेनाओं (Army, Navy, Airforce) और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के कमांडर-इन-चीफ होते हैं।नियुक्तियों का अधिकार भी इनके पास ही होता है। न्यायपालिका का प्रमुख, सरकारी मीडिया का हेड और गार्जियन काउंसिल के आधे सदस्यों को चुनने की ताकत सिर्फ रहबर के पास है।

अक्सर रूहोल्लाह खोमैनी और अली खामेनेई को 'अयातुल्लाह' कहा जाता है, लेकिन यह उनका धार्मिक पद है, राजनीतिक नहीं। रहबर राजनीतिक सर्वोच्च नेता के लिए दिया जाता है वहीं अयातुल्लाह शिया इस्लाम में उच्च धार्मिक रैंक है। ईरान में कई अयातुल्लाह होते हैं, लेकिन रहबर सिर्फ एक ही होता है।

2026 में खाली हुआ रहबर का पद

अली खामेनेई 37 साल तक इस पद पर रहे। ईरान के दूसरे सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के 2026 में निधन के बाद यह पद खाली हो गया। उनसे पहले सिर्फ एक ही व्यक्ति इस पद पर रहे थे रूहोल्लाह खोमैनी, जो 1979 की इस्लामिक क्रांति के नेता थे। यानी अब तक ईरान के इतिहास में केवल दो रहबर हुए हैं।

Assembly of Experts: असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स: रहबर को चुनने वाली 'गुप्त' सभा

यह 88 प्रभावशाली धर्मगुरुओं की एक परिषद है। जनता हर 8 साल में इनके सदस्यों को चुनती है। इनका सबसे बड़ा काम 'रहबर' का चुनाव करना है। अगर रहबर अपने कर्तव्यों का पालन ठीक से न करें, तो यह असेंबली उन्हें पद से हटा भी सकती है। वर्तमान युद्ध की स्थिति में इस असेंबली की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो गई है।

राष्ट्रपति: देश का 'चेहरा' लेकिन फैसले का 'गुलाम'

राष्ट्रपति ईरान का दूसरा सबसे ताकतवर व्यक्ति होता है। वे सरकार चलाते हैं, बजट पेश करते हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। राष्ट्रपति कोई भी बड़ा फैसला (जैसे युद्ध या संधि) रहबर की मंजूरी के बिना नहीं ले सकते। राष्ट्रपति बनने के लिए भी उन्हें 'गार्जियन काउंसिल' की अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ता है।

Guardian Council Iran कानूनों का 'फिल्टर'

इस काउंसिल में 12 सदस्य (6 धर्मगुरु और 6 जज) होते हैं। इनके पास वीटो पावर होता है और यह काउंसिल संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून को रद्द कर सकती है अगर वह इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ हो। चुनाव की चाबी भी इसी काउंसिल के पास होता है। ईरान में कौन चुनाव लड़ेगा और कौन नहीं, इसका फैसला भी यही काउंसिल करती है।

संसद (मजलिस): कानून बनाने वाली संस्था

ईरान की संसद में 290 सदस्य होते हैं जिन्हें जनता चुनती है। संसद कानून बनाती है और मंत्रियों की नियुक्ति पर मुहर लगाती है। हालांकि, इनके हर फैसले पर 'गार्जियन काउंसिल' की निगरानी रहती है।

क्यों खास है 'वेलायत-ए-फकीह' का सिद्धांत?

ईरान की इस व्यवस्था की नींव आयतोलला रुहोल्लाह खोमैनी ने रखी थी। उनका मानना था कि देश का शासन सबसे विद्वान और पवित्र इस्लामी न्यायविद (Faqih) के मार्गदर्शन में चलना चाहिए। इसी सोच ने ईरान को एक ऐसे 'धार्मिक तानाशाही' शासन में बदल दिया, जहां चुनाव तो होते हैं लेकिन अंतिम नियंत्रण 'रहबर' के हाथों में ही रहता है।

अली खामेनेई के निधन के बाद अब 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे नेता को चुनने की है जो अमेरिका और इजरायल के साथ चल रहे युद्ध के बीच देश को संभाल सके। जब तक नया रहबर नहीं चुना जाता, ईरान की सत्ता में भारी अनिश्चितता बनी रहेगी।

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