तालिबान के कब्जे के बाद जानिए क्या है अफगानिस्तान में आगे की राह
काबुल, 16 अगस्त। बिजली की रफ्तार से तालिबान ने एक-एक करके पूरे अफगानिस्तान को अपने नियंत्रण में कर लिया है। जिसकी वजह से अफगानिस्तान के आम नागरिकों की चिंता बढ़ गई है। 1999 में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान में कदम रखा था उस समय अफगानिस्तान में कट्टर इस्लाम और तालिबान का शासन था। ऐसे में लोगों को एक बार फिर से डर सताने लगा है कि क्या एक बार फिर से वही कट्टर शासन लौट आएगा।
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राष्ट्रपति गनी ने छोड़ा देश
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने रविवार को अफगानिस्तान छोड़ दिया है। उन्होंने फेसबुक पर एक पोस्ट करके लिखा है कि तालिबान जीत चुका है, तलवार और बंदूक के माध्यम से तालिबान ने अफगानिस्तान को जीत लिया है। अफगानिस्तान के लोगों की और उनकी संपत्ति की रक्षा करना अब तालिबान के हाथ में है। अफगानिस्तान की मीडिया टोलो न्यूज के अनुसार अशरफ गनी संभवत: तजाकिस्तान चले गए हैं।

राष्ट्रपति के पैलेस में घुसे तालिबानी लड़ाके
तालिबान की ओर से कहा गया कि हमने अपने लड़ाकों से कहा कि आप लोग काबुल के भीतर नहीं जाएंगे। लेकिन बावजूद इसके काबुल के अलग-अलग जिलों में प्रवेश किया और अपना झंडा फहराया। यही नहीं तालिबान के लड़ाके राष्ट्रपति के पैलेस में पहुंच गए हैं। तालिबान के लड़ाकों का पैलेस के भीतर का भी वीडियो सामने आया है जिसमे देखा जा सकता है कि तालिबानी लड़ाके पैलेस के भीतर पार्टी कर रहे हैं।

अंतरिम प्रशासन का गठन
माना जा रहा है कि तालिबान अफगानिस्तान में जो अंतरिम प्रशासन का गठन करेगा उसमे पूर्व गृह मंत्री अली अहमद जलाली को प्रशासन का मुखिया बनाया जा सकता है। हालांकि अभी तक यह साफ नहीं है कि तालिबान किस तरह का प्रशासन अफगानिस्तान में चलाना चाहता है। इसको लेकर स्थिति साफ नहीं है, ऐसे में बैठकों के दौर के बाद माना जा रहा है कि इसपर फैसला लिया जा सकता है। साथ ही इस बात की भी आशंका जताई जा रही है अफगानिस्तान में सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण हो पाएगा या नहीं।

आपसी समझौते की उम्मीद
कूनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा समय में अशरफ गनी की सरकार और तालिबान के बीच आपसी समझौता हो सकता है और कोशिश होगी कि काबुल में हिंसा को नहीं होने दिया जाए। लेकिन इस क्रम में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि क्या तालिबान अशरफ गनी की मौजूदा सरकार के साथ जो समझौता करेगा उसे वह पूरा करेगा। तालिबान ने 2020 में अमेरिका के साथ समझौता किया था कि सबकुछ शांतिपूर्ण होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और अफगानिस्तान में काफी हिंसा देखने को मिली है।

शांति समझौता विफल होने की भी आशंका
इसके अलावा इस बात की भी आशंका जताई जा रही है कि तालिबान और अशरफ गनी सरकार के बीच बातचीत विफल हो जाए। दरअसल अशरफ गनी सरकार के कुछ मंत्री यह कोशिश करेंगे कि वह अभी भी सरकार चला लें। लेकिन अगर ऐसी स्थिति आती है तो तालिबान पूरे काबुल शहर और अफगानिस्तान को अपने हाथ में ले लेने की कोशिश करेगा और हिंसा का एक और दौर देखने को मिल सकता है।

क्या अमेरिका फिर से करेगा वापसी
एक सवाल यह भी उठता है कि क्या अफगानिस्तान में चरम पर हिंसा के दौरान अमेरिका फिर से हस्तक्षेप करेगा। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन पहले ही साफ कर चुके हैं कि वह 31 अगस्त तक सभी अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लेंगे। जो बाइडन के इस फैसले के बाद उनकी काफी आलोचना हो रही है और लोग बाइडन के इस फैसले को सबसे बड़ी भूल करार दे रहे हैं। जो बाइडन से जब पूछा गया कि क्या अफगानिस्तान अपनी सरकार को बचा सकता है तो बाइडन ने कहा कि हमने उनकी फोर्स को तैयार किया है और वो लोग अपने देश की सुरक्षा कर सकते हैं।

मुश्किल है अमेरिका की वापसी
लेकिन जिस तरह से तालिबान ने बिजली की रफ्तार से पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा किया है उससे साफ है कि अफगानिस्तान की सेना इन लोगों पर नियंत्रण पाने में किसी भी तरह से सक्षम नहीं है। ऐसे में अमेरिका एक बार फिर से अफगानिस्तान में प्रवेश करेगा ऐसा संभव नहीं लगता है। इसकी बड़ी वजह यह है कि तालिबान अब पूरे अफगानिस्तान पर नियंत्रण कर चुका है, लिहाजा अमेरिका को अफगानिस्तान में आने के लिए फिर से नई रणनीति को तैयार करना होगा। अमेरिका पहले ही अफगानिस्तान में अपने हजारो सैनिकों को गंवा चुका है लिहाजा अब फिलहाल ऐसा नहीं लगता है कि अमेरिका फिर से अफगानिस्तान में प्रवेश करेगा।












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