अमेरिका और जर्मनी का एक ही वक़्त पर यूक्रेन को टैंक देने का फ़ैसला क्या बताता है?

जर्मनी के लेपर्ड 2 टैंक
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जर्मनी के लेपर्ड 2 टैंक

अमेरिकी सरकार ने बीते बुधवार M1 अबराम्स टैंकों को यूक्रेन को देने का फ़ैसला कर लिया है. लेकिन बाइडन प्रशासन का ये फ़ैसला रूस और यूक्रेन के बीच पिछले कई महीनों से जारी युद्ध के अगले चरण पर कोई असर नहीं डालेगा.

बाइडन प्रशासन की ओर से इन टैंकों को यूक्रेन भेजने का फ़ैसला एक यू-टर्न जैसा है. क्योंकि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पिछले काफ़ी समय से कहता आ रहा है कि ये टैंक यूक्रेनी युद्ध क्षेत्र के लिहाज़ से उचित नहीं हैं.

लेकिन अमेरिका की ओर से इस फ़ैसले ने एक बदलाव ज़रूर किया है. और ये बदलाव जर्मनी की ओर से किए गए फ़ैसले में दिखता है.

जर्मनी के टैंक और अमेरिका की चिंता

यूक्रेन के लिए अमेरिका के पूर्व विशेष प्रतिनिधि रहे कर्ट वॉकर ने बीबीसी को बताया है कि बाइडन प्रशासन के इस 'कदम ने जर्मनी को लेपर्ड 2 टैंक भेजने का फ़ैसला लेने में मदद की है.'

यूक्रेन के पश्चिमी सहयोगी चाहते हैं कि आगामी छह से आठ हफ़्तों में यूक्रेन के पास मौजूद बख़्तरबंद वाहनों की संख्या में बढ़ोतरी हो ताकि वह रूसी हमलों से जुड़ी आशंकाओं का सामना कर सके.

हालांकि, अबराम्स को युद्ध क्षेत्र तक पहुंचने और यूक्रेनी सैनिकों को इसे चलाने में प्रशिक्षित होने में इससे कहीं ज़्यादा समय लगेगा.


अमेरिका के अब्राम्स टैंक
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अमेरिका के अब्राम्स टैंक

अमेरिका के अब्राम्स टैंक

  • अमेरिका यूक्रेन को 31 M1 अब्राम्स टैंक देगा
  • राष्ट्रपति जो बाइडन ने इसे 'दुनिया का सबसे सक्षम टैंक' बताया है
  • चार लोगों का चालकदल, यूक्रेन से मुख्य युद्ध टैंकों से एक अधिक
  • चोबाम सुरक्षा जो सीधे हमलों से टैंक की रक्षा करती है
  • 67 टन वज़न का ये टैंक रूसी टैंकों से मुक़ाबले अधिक भारी है
  • इसमें ग़ैर-नेटो गोला बारूद इस्तेमाल होता है

जर्मनी के लेपर्ड 2 टैंक अपेक्षाकृत रूप से ज़्यादा जल्दी और आसानी से युद्ध क्षेत्र में इस्तेमाल किए जा सकते हैं.

अमेरिकी और जर्मन अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से इन दोनों मुद्दों को नहीं जोड़ा है.

लेकिन दोनों देशों ने एक ही दिन अपने-अपने टैंकों को यूक्रेन भेजने का एलान करके इस मुद्दे पर पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते विवाद का पटाक्षेप करने की कोशिश की है क्योंकि इस विवाद ने अमेरिका को चिंता में डाला हुआ था.

इस युद्ध की शुरुआत से ही बाइडन प्रशासन और उसके सहयोगियों ने यूक्रेन को हथियार देने में बेहद सावधानी का परिचय दिया है ताकि रूसी आक्रामकता से बचा जा सके.

लेकिन यूक्रेन को मिली कुछ सैन्य सफ़लताओं के बाद पश्चिमी देशों ने अपने संकोच और सावधानियों से किनारा करना शुरू कर दिया है.


जर्मनी के लियोपार्ड 2 टैंक
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जर्मनी के लियोपार्ड 2 टैंक

जर्मनी के लेपार्ड 2 टैंक

  • चार लोगों का चालकदल, यूक्रेन से मुख्य युद्ध टैंकों से एक अधिक
  • बहुस्तरीय सुरक्षा कवच से लैस हैं ये टैंक
  • 67 टन वज़न का ये टैंक रूसी टैंकों से मुक़ाबले अधिक भारी है
  • इसमें 120 एमएम की गन है और इसमें नेटो गोला बारूद का इस्तेमाल हो सकता है
  • कई यूरोपीय देशों की सेना में शामिल है ये टैंक

जर्मनी टैंक भेजने में संकोच क्यों कर रहा था?

यूक्रेन पर बढ़ते रूसी हमले की आशंकाओं ने इस युद्ध का फोकस एक फिर टैंकों पर ला दिया है जो यूक्रेनी सेना के लिए पूर्वी यूक्रेन के खुले मैदानों में लड़ने के लिए बेहद ज़रूरी हैं.

जर्मनी के लगभग दो हज़ार 'लेपर्ड 2' टैंक यूरोप के अलग-अलग कोनों में तैनात हैं. और उसके सहयोगी पिछले कुछ महीनों से उस पर इन टैंकों को यूक्रेन भेजने या उन्हें इन टैंकों को निर्यात करने का अधिकार देने के लिए दबाव बना रहे थे.

ये टैंक जर्मनी में बने हैं और इनका एक्सपोर्ट लाइसेंस भी उसके ही पास है. इसका मतलब ये है कि जर्मनी के ये सहयोगी देश उसकी मर्जी के बिना ये टैंक यूक्रेन को नहीं दे सकते.

लेकिन जर्मनी ये नहीं चाहता था कि वह रूस के ख़िलाफ़ टैंक उतारने वाली अकेली पश्चिमी ताक़त के रूप में देखा जाए. और ब्रिटेन की ओर से आधे दर्जन से ज़्यादा चैलेन्जर 2 टैंक भेजने का फ़ैसला उसके लिए काफ़ी नहीं था.

कुछ दिन पहले तक अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अधिकारी M1 अबराम्स टैंकों को विकल्प के रूप में नहीं देख रहे थे.

अमेरिका में बने M1 अबराम्स टैंक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ टैंकों में शामिल हैं. लेकिन इन्हें चलाना बेहद जटिल और महंगा है.

इसके साथ ही इनका रखरखाव करना मुश्किल है और इस्तेमाल करने के लिए काफ़ी ट्रेनिंग की ज़रूरत पड़ती है. इसमें से कोई भी चीज़ बदली नहीं है.


ब्रिटेन के चैलेन्जर 2 टैंक
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ब्रिटेन के चैलेन्जर 2 टैंक

ब्रिटेन के चैलेन्जर 2 टैंक

  • ब्रिटेन यूक्रेन को 14 चैलेन्जर 2 टैंक देगा
  • ये ब्रेटिन का मुख्य युद्धक टैंक है जो सबसे पहले 1990 में बनाया गया था
  • चार लोगों का चालकदल, यूक्रेन से मुख्य युद्ध टैंकों से एक अधिक
  • चोबाम या डोर्चेस्टर सुरक्षा जो सीधे हमलों से टैंक की रक्षा करती है
  • 75 टन वज़न का ये टैंक रूसी टैंकों से मुक़ाबले अधिक भारी है
  • इसमें गैस टरबाइन इंजन होता है और ईंधन की अधिक खपत होती है


लेपर्ड-2 टैंक की इतनी मांग क्यों है?

क्रिस पैरट्रिज, बीबीसी के हथियार विश्लेषक

लेपर्ड-2 टैंक विश्वस्तरीय टैंक है. एक दर्जन से ज़्यादा देश इसका इस्तेमाल करते हैं.

यूक्रेन मानता है कि रूस के ख़िलाफ़ लड़ाई में टैंकों की अहम भूमिका है. लेपर्ड टैंक अफ़ग़ानिस्तान और सीरिया की लड़ाई में अपना कमाल दिखा चुके हैं.

यूक्रेन लेपर्ड टैंक लेने कि इसलिए भी बेताब है क्योंकि दो तिहाई टैंकों का निर्माण यूरोप में ही हुआ है.

इसलिए लेपर्ड टैंकों की डिलीवरी उसके लिए काफ़ी आसान होगी और वो इससे रूस से आमने-सामने की लड़ाई और कारगर ढंग से लड़ सकेगा.


यूरोप - अमेरिकी गठबंधन में दरार

लेकिन बाइडन प्रशासन में पिछले कुछ समय से इस मुद्दे पर विचार-विमर्श जारी था कि यूरोपीय देशों के बीच पड़ती दरार का क्या हल निकाला जाए.

इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और जर्मन चांसलर ओलाफ़ स्कॉल्ज़ के बीच फ़ोन पर कई बार बातचीत हुई.

अमेरिकी सरकार के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया है कि बाइडन अमेरिकी और यूरोपीय देशों के गठबंधन की एकता बनाए रखना चाहते हैं.

अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने बताया है कि 'ये फ़ैसला दिखाता है कि हम अपने सहयोगियों और भागीदारों के साथ कितने एकजुट हैं और यह सब समन्वित तरीके से कर रहे हैं.'

उन्होंने ये भी कहा है कि जर्मन टैंकों के साथ अबराम एक दीर्घकालिक प्रतिबद्धता दर्शाता है.

हालांकि, यूक्रेन में अमेरिकी राजदूत रहे जॉन हर्बस्ट का इस दीर्घकालिक प्रतिबद्धता पर नज़रिया अपेक्षाकृत रूप से ज़्यादा व्यवहारिक है.

वह कहते हैं कि बाइडन 'सरकार टैंक देने को लेकर ज़्यादा इच्छुक नहीं थी. लेकिन उन्होंने देखा कि ये डिबेट कहां जा रहा है. उन्होंने लोगों के नज़रिए को भी देखा और जर्मनी को मनाने में ईमानदारी कोशिश की. लेकिन इस कोशिश में उन्हें अबराम देने के लिए तैयार होना पड़ा. लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं थे. इसी वजह से अबराम बहुत देर से यूक्रेन पहुंचेंगे.'


पोलैंड का T-72M1 टैंक
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पोलैंड का T-72M1 टैंक

पोलैंड का T-72M1 टैंक

  • फरवरी 2022 के बाद से पोलैंड यूक्रेन को 200 से अधिक T-72M1 टैंक दे चुका है
  • चेक गणराज्य और कुछ और देशों की सेना में भी ये टैंक शामिल है
  • सोवियत दौर का ये टैंक यूक्रेन सकी सेना में आम तौर में देखा जा सकता है
  • 46 टन वज़न का ये टैंक नेटो मुल्कों के दूसरे टैंकों के मुक़ाबले हलका है
  • लेकिन इसकी स्पीड 60 किलोमीटर प्रतिघंटा है जो आधुनिक टैंकों के मुक़ाबले काफी कम है
  • इसमें ग़ैर-नेटो गोला बारूद इस्तेमाल होता है

अमेरिकी टैंक कब पहुंचेंगे यूक्रेन

अमेरिकी प्रशासन ने अपने M1 अबराम्स टैंकों को यूक्रेन भेजने का एलान भले ही कर दिया हो लेकिन इन टैंकों के यूक्रेन पहुंचने में अभी लंबा समय लगेगा.

इसके लिए इन्हें मंगाने की विशेष प्रक्रिया ज़िम्मेदार है. इन टैंकों को पहले निजी कॉन्ट्रेक्टरों से ख़रीदा जाएगा. क्योंकि अमेरिकी सेना अपने एम 1 अबराम टैंकों को यूक्रेन नहीं भेजेगी.

ऐसे में इन टैंकों के यूक्रेन पहुंचने में कई महीने या साल भर का समय लग सकता है.

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि जर्मनी के लेपर्ड टैंकों के यूक्रेन पहुंचने से उसकी मारक क्षमता में काफ़ी बढ़ोतरी होगी. लेकिन ये किसी सिल्वर बुलेट जैसा नहीं होगा. सरल शब्दों में कहें तो ये उसकी सभी समस्याओं को एकाएक ख़त्म नहीं करेगा.

क्योंकि इन टैंकों को यूक्रेनी सेना की पैदल सेना दस्ते और तोपखाने के साथ जोड़ना होगा. यह देखना भी अहम होगा कि क्या ये इस संघर्ष को बदलने वाला पल होगा.

ये भी देखा जाएगा कि क्या हथियारों को लेकर मांग एक बार फिर टैंक से हटकर लंबी दूरी वाली मिसाइलों और लड़ाकू विमानों तक पहुंचेगी.

क्या बोले ज़ेलेंस्की?

अमेरिका और यूरोपीय देशों के सैन्य संगठन नेटो के प्रमुख जेन्स स्टोल्टेनबर्ग ने कहा है, "इस कदम से यूक्रेन को रूसी आक्रामकता का सामना करने में मदद मिलेगी. हम जानते हैं कि रूस कुछ नए हमलों की योजना बना रहा है. ये (टैंक) उन्हें खोई हुई ज़मीन वापस हासिल करके इस युद्ध को जीतकर एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में उभरने में मदद करेगी.'

इस बीच यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने कहा है कि अब आगे ये मायने रखता है कि उन्हें किस तेज़ी से और कितनी संख्या में ये नए टैंक मिलेंगे.

उन्होंने कहा, "अब ज़रूरी है कि हमें कितने और कितनी जल्दी टैंक मिलेंगे. हमारी सेना की ट्रेनिंग, टैंकों के लिए ज़रूरी मदद कैसे और कितनी जल्दी मिलती है. हमें इन टैकों के साथ अपनी ताकत को बढ़ाना है, अपना मुक़ाबले को बढ़ाना है ताकि कोई निरंकुश शासन सिर न उठा सके."

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