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#MeToo अभियान के पांच सालों में दुनिया भर में क्या कुछ बदला

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  • #MeToo आंदोलन ने दुनिया भर में महिलाओं के यौन शोषण की ओर ध्यान खींचा था
  • पांच साल पहले शुरू हुए इस आंदोलन ने इस बारे में जागरुकता फैलाने में अहम भूमिका निभाई थी
  • कई देशों में यौन हिंसा के ख़िलाफ़ ज़बर्दस्त प्रदर्शन हुए और सत्ता प्रतिष्ठानों पर दबाव बढ़ा
  • यह आंदोलन भले अमेरिका में शुरू हुआ था, लेकिन इसका असर दुनिया भर में देखने को मिला
  • इसने महिलाओं के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ बहस को मज़बूती दी

पांच साल पहले हम सब की सोशल मीडिया टाइम लाइन पर अचानक से #MeToo से जुड़े पोस्ट दिखाई देने लगे थे.

एक ट्वीट से यह अभियान शुरू हुआ और देखते-देखते दुनिया भर की महिलाएं अपने साथ हुए बुरे अनुभव को याद करने लगी थीं.

ग्लासगो में यूनिवर्सिटी ऑफ़ स्ट्रेचक्लायड में फ़ेमिनिस्ट मीडिया स्टडीज़ में जेंडर स्टडीज़ विभाग की निदेशिका प्रोफ़ेसर कैरन बॉयले बताती हैं, "यौन हिंसा और उत्पीड़न को बताने के लिए #MeToo कोई पहला हैशटैग नहीं था और ना ही वायरल होने वाला यह पहला हैशटैग था. हालांकि दुनिया के कई हिस्सों में इसने उस अभियान को आवाज़ दी जो राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर पर पहले से ही वायरल हो चुके थे."

कई लोगों का ये भी मानना है कि इस आंदोलन ने दुनिया भर के समाज में और कार्यस्थलों पर महिलाओं की स्थिति और उनके साथ किए जा रहे व्यवहार के बारे में बहस को विस्तार दिया.

इसने महिलाओं को अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के अनुभवों को सार्वजनिक करने के लिए उत्साहित किया.

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अलिसा मिलानो
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अलिसा मिलानो

इसकी शुरुआत कैसे हुई थी?

MeToo अभियान की शुरुआत अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता टैराना बर्क ने महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा और उत्पीड़न को लेकर जागरुकता बढ़ाने के लिए 2006 में की थी.

इसके 11 साल बाद, यह तब दुनिया भर में चर्चा के केंद्र में तब आया, जब अमेरिकी अभिनेत्री अलिसा मिलानो ने इसका इस्तेमाल अपने ट्वीट में किया.

उन्होंने महिलाओं से अपने यौन उत्पीड़न के अनुभवों को साझा करने की अपील की, जिसका असर दुनिया भर में देखने को मिला. हॉलीवुड के जाने-माने फ़िल्मकार हार्वी वाइंस्टीन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली वो पहली अभिनेत्री थीं.

उन्होंने 15 अक्टूबर को ट्वीट किया था, इसके बाद सोशल मीडिया पर उसी दिन #MeToo का इस्तेमाल दो लाख बार से ज़्यादा बार किया गया.

अगले दिन तक पांच लाख लोग इसका इस्तेमाल कर चुके थे. #MeToo दुनिया के 85 से ज़्यादा देशों में विभिन्न भाषाओं में ट्रेंड में बना रहा.

यह आंदोलन भले अमेरिका में शुरू हुआ था, लेकिन इसका असर दुनिया भर में देखने को मिला.

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#MeToo आंदोलन के कई पहलू

प्रोफ़ेसर बॉयले के मुताबिक़, वायरल हैशटैग और MeToo आंदोलन को अलग-अलग करके देखना चाहिए. उनके मुताबिक़ ये हैशटैग कई वजहों से वायरल हुआ था और इसमें दशकों से ऑनलाइन और ऑफ़लाइन अभियान चलाने वाले लोगों की भूमिका थी.

बॉयले कहती हैं, "MeToo आंदोलन और हैशटैग को अलग-अलग देखना चाहिए. आप इसे हैशटैग और आम लोगों की चर्चा के तौर पर अलग कर सकते हैं. मेरे ख़्याल से यह आंदोलन तो हैशटैग के वायरल होने से काफ़ी पहले से चल रहा था और उसके बाद भी चलता रहा है."

बॉयले इसके एक दूसरे पहलू की ओर भी ध्यान दिलाती हैं, "मेनस्ट्रीम मीडिया इसके बारे में क्या कहती है और यह विस्तृत अर्थों में क्या है, इसे भी समझना होगा.''

वह कहती हैं, ''कई बार दशकों से ऑनलाइन और ऑफ़लाइन काम करने वाली महिलाओं की कहानी को उनके रंग के आधार पर तरजीह मिलती है. यह अभियान एक गोरे सेलिब्रेटी की कहानी से जुड़ गया था."

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#MeToo का दुनिया भर में असर

साल 2015 में ब्राज़ील में महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली एक संस्था 'थिंक ओल्गा' की संस्थापिका जूलियाना डि फारिया ने #MyFirstHarrassment नाम से अभियान शुरू किया था.

कुछ ही दिनों के अंदर हज़ारों महिलाओं ने अपने अनुभव साझा किए. यह जल्दी ही लैटिन अमेरिकी देशों में भी लोकप्रिय हो गया.

पिछले कुछ सालों में दुनिया भर के यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की कई मुहिम देखने को मिली है. चीन, ब्रिटेन और भारत जैसे देशों में इसको लेकर बहस का दौर देखने को मिला है.

हाल ही में भारत में लोकप्रिय टीवी रियलिटी शो बिग बॉस के घर से फ़िल्म निर्देशक साजिद ख़ान को निकालने की मांग उठ रही है. साजिद ख़ान पर चार साल पहले आठ महिला अभिनेत्रियों और एक पत्रकार ने यौन दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाया था.

साजिद ख़ान ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया था और उन पर कोई पुलिस केस भी दर्ज नहीं हुआ है. लेकिन सोशल मीडिया पर बिग बॉस का मंच उनको दिए जाने का काफ़ी विरोध हो रहा है.

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चीन में भी ज़ोरदार आंदोलन

साल 2018 में चीन में भी #MeToo आंदोलन का असर दिखा. तब जियांज़ी उन कई महिलाओं में से एक थीं जिन्होंने अपने यौन उत्पीड़न की बात सबके सामने रखी.

उनका असली नाम ज़ोऊ जियाओजुअन है, लेकिन वो जियांज़ी नाम से लोकप्रिय हैं.

जियांज़ी ने 3,000 शब्दों के एक लेख में सरकारी समाचार चैनल सीसीटीवी के होस्ट ज़ू जुन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया.

जियांज़ी का लेख वायरल हो गया था. उन्होंने बताया था कि जब यह घटना हुई, उस समय वो 21 साल की एक इंटर्न थीं और ज़ू जुन का इंटरव्यू मिलने की उम्मीद में उनके ड्रेसिंग रूम में गई थीं.

हालांकि बीते साल अदालत ने उनके आरोपों को पर्याप्त सबूतों के अभाव में खारिज़ कर दिया था. लेकिन उन्होंने अदालत के फ़ैसले के बाद कहा कि वे अपनी लड़ाई जारी रखेंगी.

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साल 2019 में केपटाउन पोस्ट ऑफ़िस में 19 साल की छात्रा यूइनेने मर्वेत्याना की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी. इसके बाद दक्षिण अफ्रीका में महिलाओं के ख़िलाफ़ पुरुषों की हिंसा की आलोचना करते हुए हैशटैग #MenAreTrash ट्रेंड में रहा.

इस हत्या के बाद पूरे देश में महिलाओं के प्रति हिंसा के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन देखने को मिला. दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने माना कि महिलाओं के साथ हिंसा एक राष्ट्रीय समस्या है.

दक्षिण अफ्रीका में दुनिया भर के औसत से पांच गुना अधिक महिलाओं की हत्या उनके जेंडर के चलते की जाती है.

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नेपाल में प्रदर्शन

इस साल मई के महीने में नेपाल में लोग सड़कों पर उतर पड़े. ये लोग मौजूदा क़ानून में रेप की परिभाषा को बदलने की मांग कर रहे थे, यह मांग एक पूर्व मॉडल के टिकटॉक पर जारी वीडियो के बाद शुरू हुई जिसमें उन्होंने कहा था कि 16 साल की उम्र में उनका बलात्कार हुआ था.

उन्होंने दावा किया था कि एक ब्यूटी कांटेस्ट के आयोजक ने उन्हें ड्रग्स देकर बलात्कार किया और उसके बाद ब्लैकमेल किया. नेपाल के क़ानूनों के मुताबिक बलात्कार का मामला अपराध के एक साल के भीतर दर्ज होना चाहिए.

हालांकि लोगों के दबाव को देखते हुए ब्यूटी कांटेस्ट के आयोजक को पुलिस ने गिरफ़्तार किया, लेकिन उन पर मानव तस्करी से जुड़े अपराध का मामला दर्ज किया गया.

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यौन हिंसा के खिलाफ प्रदर्शन
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यौन हिंसा के खिलाफ प्रदर्शन

ईरान में उठी आवाज़

ईरान में पिछले दिनों 22 साल की कुर्द महिला महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में हत्या के बाद लोगों का आक्रोश सड़कों पर दिखा. महसा अमीनी को कथित तौर पर सिर पर हिजाब नहीं पहनने के लिए पुलिस ने हिरासत में लिया था.

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक़, पुलिस वैन में उन्हें मारा-पीटा गया जिसके बाद वह कोमा में चली गईं. हालांकि ईरानी पुलिस ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि सडन कार्डिएक अरेस्ट से उनकी मौत हुई.

ईरान के सामाजिक कार्यकर्ता मौजूदा विरोध प्रदर्शन और #MeToo आंदोलन को जोड़ते हैं.

ईरानी अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता गोल्सफितेह फराहान ने अपने ट्वीट में कहा, "आप #MahsaAmini आंदोलन से अनुपस्थित होकर पुरुषों और महिलाओं में बराबरी की मांग कैसे कर सकते हैं, कैसे #MeToo आंदोलन की मदद कर सकते हैं.

इसका धर्म, विचारधारा और हिजाब पहनने और नहीं पहनने से कोई लेना-देना नहीं है. यह महिलाओं की अपनी पसंद का चुनाव करने और अपने शरीर पर अधिकार से जुड़ा है."

महसा अमीनी
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महसा अमीनी

हैशटैग से आगे भी विरोध

पांच साल बीतने के बाद #MeToo आंदोलन के बारे में विश्लेषकों का मानना है कि इसने महिलाओं के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ बहस को मज़बूती दी है, इससे दूसरे हैशटैग, विरोध प्रदर्शन और नए मामलों का सिलसिला भी शुरू हुआ है.

प्रोफेसर बॉयले कहती हैं, "हैशटैग MeToo का आम लोगों पर असर पड़ा है. हज़ारों महिलाएं अब सार्वजनिक तौर पर यौन उत्पीड़न के अनुभवों को सार्वजनिक कर रही हैं, लोग सुन रहे हैं और उन पर विश्वास भी कर रहे हैं."

वह कहती हैं कि महिलाओं के वैश्विक स्तर पर होने वाले सामाजिक व्यवहार के मुद्दे ने इसके साथ कुछ अन्य सामाजिक मुद्दों को भी उजागर किया है.

उन्होंने कहा, "दुर्भाग्य से, पहले आरोप लगाने वाली और सार्वजनिक तौर पर मर्दों के ख़िलाफ़ बोलने को लेकर महिलाओं की ही आलोचना शुरू हो जाती थी. ना तो कोई उनके आरोपों को सुनता था और ना ही विश्वास करता था."

बॉयले का मानना है कि सार्वजनिक हस्तियों के ख़िलाफ़ आरोपों का विरोध इसलिए होता है क्योंकि ये सच्चाइयां असहज करने वाली होती हैं.

उन्होंने कहा, "MeToo आंदोलन ने न केवल व्यक्तिगत अपराधियों के व्यवहार को समाज के सामने उजागर किया है, बल्कि कुछ इंडस्ट्री के कामकाज के तरीक़े और सामाजिक मूल्यों पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया है."

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आंदोलन के लिए आगे क्या?

प्रोफेसर बॉयले का कहना है कि वायरल #MeToo आंदोलन ने एक महत्वपूर्ण मुद्दे को रफ़्तार दी है. लेकिन अभी बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता है.

उन्होंने कहा, "एक समय आएगा जब हमें मालूम होगा कि उस मुकाम पर पहुंच गए हैं जहां कोई यौन उत्पीड़न और यौन हमला नहीं होता है, लेकिन हम इससे बहुत दूर हैं."

उन्होंने यह भी कहा, "MeToo आंदोलन का वास्तविक असर दिखने में वक़्त लगेगा. इसके लिए कार्यस्थलों, स्कूलों से लेकर खेल के मैदानों तक हर जगह संरचनात्मक परिवर्तन की आवश्यकता है. यह काम दशकों से हो रहा है, लेकिन यह केवल शुरुआत है."

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