यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल के रिफॉर्म से जुड़े पांच मुद्दे और अहम बातें
न्यूयॉर्क। 14 सितंबर को 2015 को यूनाइटेड नेशंस के न्यूयॉर्क स्थित हेडक्वार्टर में करीब 200 सदस्य देशों की एक मीटिंग हुई। इस मीटिंग में यह फैसला लिया गया कि अगले वर्ष सिक्योरिटी काउंसिल में बदलाव के लिए एक ड्रॉफ्ट को
पेश किया जाएगा।
सिक्योरिटी काउंसिल 15 देशों की उच्चतम संस्था है जो संयुक्त राष्ट्र से जुड़े अहम फैसले करती है। इसके साथ ही यूएन में भारत की स्थायी सदस्यता की राह में खड़ी मुश्किलों में से एक मुश्किल दूर होती नजर आई। भारत के लिए 14 सितंबर का दिन काफी एतिहासिक बन गया है क्योंकि भारत पिछले कई वर्षों से रिफॉर्म की मांग कर रहा था।
कौन-कौन से पांच मुद्दे
यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल में ये पांच अहम मुद्दे हैं
- सदस्यता की श्रेणी
- पांच स्थायी सदस्यों की वीटो पावर
- क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व
- काउंसिल का आकार और उसके काम करने के तरीके
- सिक्योरिटी काउंसिल और महासभा के बीच संबंध
आगे की स्लाइड पर इस अहम खबर से जुड़ी कुछ और बातों पर नजर डालिए। साथ ही जानिए कि कैसे रूस और अमेरिका ने बदलाव का विरोध किया।

दो तिहाई सदस्यों की मंजूरी जरूरी
सिक्योरिटी काउंसिल में कोई भी रिफॉर्म तभी मंजूर होता है जब सिक्योरिटी काउंसिल के स्थायी सदस्य, यूएन सदस्य और स्थायी सदस्यों के वीटो राइट साथ इसे दे तिहाई मंजूरी मिले।

दो दशकों के बाद बदलाव
यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल में दो दशकों के बाद कोई बदलाव किया जाएगा।

चीन और रूस का विरोध
यह पहला मौका था जब अलग-अलग देशों ने सिक्योरिटी काउंसिल के रिफॉर्म के लिए अलग-अलग देशों से प्रस्ताव मांगे। हालांकि चीन, अमेरिका और रूस ने इस प्रस्तावों पर बात करने और सिक्योरिटी काउंसिल के सदस्यों की संख्या बढ़ाए जाने का विरोध किया।

अपनी चाल में फेल हो गया चीन
चीन सिक्योरिटी काउंसिल में किसी भी तरह की वृद्धि के खिलाफ था। बताया जा रहा है कि चीन की मंशा थी रिफॉर्म के ड्राफ्ट को मंजूरी दी जाए या नहीं, इस पर वोट कराकर ही कोई फैसला लिया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

अमेरिका और रूस बदलाव के खिलाफ
जहां अमेरिका ने इस ड्राफ्ट के पक्ष में बोलने से साफ इंकार कर दिया तो वहीं रूस ने भी इस ड्राफ्ट का विरोध किया।

रूस के रवैये से हैरान भारत
जिस तरह से रूस ने इस पूरे मसले पर विरोध जताया है, उससे भारत को काफी हैरानी है। माना जा रहा है कि दिसंबर में पीएम मोदी अपने मास्को दौरे पर इस मुद्दे को उठाएंगे।












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