सूर्य के प्रकाश से 10 सेकंड में 99.9% स्वच्छ होगा पानी, शोध में मिला पेयजल समस्या का बड़ा समाधान

दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो दुनिया भर में शुद्ध पेयजल के संकट को खत्म कर सकती है। यह तकनीक किफायती भी है और लगभग 100 फीसदी शुद्धता की गारंटी भी देती है।

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दुनिया में शुद्ध पेयजल का संकट एक झटके में हल होने की उम्मीद जग गई है। यह संभव हुआ है दक्षिण कोरियाई वैज्ञानिकों के रिसर्च के माध्यम से। उन्होंने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो सौर ऊर्जा पर काम करती है और उसे पानी में घुले खतरनाक अशुद्धियों को हटाने में मुश्किल से 10 सेकंड लगते हैं। उनका दावा है कि यह तकनीक किफायती भी है, इसलिए उसका इस्तेमाल दुनिया भर के गरीब देशों में भी किया जा सकता है। इस रिसर्च के मुताबिक इस तरीके से पानी को 99.9% तक शुद्ध किया जा सकता है।

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    10 सेकंड में 99.9% शुद्ध होगा पानी- रिसर्च

    10 सेकंड में 99.9% शुद्ध होगा पानी- रिसर्च

    दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने पानी साफ करने के लिए ऐसा सिस्टम विकसित करने का दावा किया है, जो सिर्फ 10 सेकंड में पानी से 99.9% प्रदूषित पदार्थों को निकाल सकता है। डायेगू ग्योंगबक इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (DGIST) के वैज्ञानिकों का यह शोध जर्नल एडवांस्ड मटेरियल में प्रकाशित हुआ है। इस शोध पेपर का टाइटल है- सुपरमॉलेक्यूलर इंजीनियरिंग ऑफ एमॉर्फस पोरस पॉलिमर्स फॉर रैपिड एड्जॉर्प्शन ऑफ माइक्रोपॉल्यूटेंट्स एंड सोलर-पावर्ड वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स मैनेजमेंट'।

    'अल्ट्रा-हाई स्पीड से काम करने में सक्षम'

    'अल्ट्रा-हाई स्पीड से काम करने में सक्षम'

    शोध पत्र के मुताबिक सोखने वाले पदार्थ के रूप में मॉलेक्यूलर इंजीनियरिंग से तैयार बहुत ही उन्नत सुराखदार पदार्थ का इस्तेमाल किया गया है। इसके मुताबिक यह इतना बेहतरीन है कि महज 10 सेकंड में पानी में मौजूद 99.9% माइक्रोपॉल्यूटेंट्स को हटाने में सक्षम है और बिना किसी भी दिक्कत के कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है। कोरिया के DGIST से जुड़े इस शोध पत्र के एक लेखक चियंग पार्क ने कहा है, 'यह टेक्नोलॉजी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ शुद्धिकरण दक्षता के साथ बेजोड़ है, जो कि पानी में मौजूद 99.9 फीसदी से ज्यादा दूषित पदार्थों, फीनॉलिक माइक्रोप्लास्टिक और वोलाटाइल ऑरेगेनिक कंपाउंड को अल्ट्रा-हाई स्पीड से निकाल देता है। '

    'सूर्य के प्रकाश से शुद्ध होगा पानी'

    'सूर्य के प्रकाश से शुद्ध होगा पानी'

    दरअसल, पानी की सफाई के लिए इस टीम ने थर्मल ऊर्जा की जगह सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया है और इसमें ऐसी वाटर ट्रीटमेंट मेम्ब्रेन का भी उपयोग किया गया है, जो इसके जरिए पानी को वाष्पीकृत करके इसे साफ करने में सहायता करता है। फीनॉलिक अशुद्धियों को सूर्य के प्रकाश के जरिए शुद्ध करने के लिए वाटर ट्रीटमेंट मेम्ब्रेन पर ऑक्सीडाइज्ड पॉलिमर की लेप चढ़ाने की भी पुष्टि की गई है। कुल मिलाकर जल शुद्ध करने की यह प्रक्रिया एक जटिल वैज्ञानिक विधि से पूरी होती है, लेकिन बड़े काम की साबित हो सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी जो पानी शुद्ध करने के तरीके अपनाए जाते हैं, वह काफी धीमे हैं।

    खोज करने वाले वैज्ञानिक मान रहे हैं बड़ी कामयाबी

    खोज करने वाले वैज्ञानिक मान रहे हैं बड़ी कामयाबी

    रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिकों के सामने अभी तक यह बड़ी चुनौती रही है कि उन्हें ऐसा मटेरियल विकसित करना था, जो रीसाइक्लिंग में भी बेहतर हो, बहुत ही उच्च क्षमता वाला हो, आर्थिक तौर पर भी उपयोगी साबित हो। इस नजरिए से कोरिया में विकसित नई तकनीक बहुत बड़ी कामयाबी है, क्योंकि रीसाइक्लिंग के लिए इसमें इस्तेमाल होने वाले पॉलिमर के लिए बहुत ज्यादा थर्मल एनर्जी की आवश्यकता नहीं है और बार-बार उपयोग करने के बाद भी इसकी परफॉर्मेंस प्रभावित नहीं होती। शोधकर्ताओं का दावा है कि प्रयोगों से इस बात की पुष्टि हो चुकी है।

    पानी शुद्ध करने की यह खोज क्यों महत्वपूर्ण है ?

    पानी शुद्ध करने की यह खोज क्यों महत्वपूर्ण है ?

    पानी की माइक्रोप्लास्टिक अशुद्धि अब दुनिया के पर्यावरण के लिए बहुत बड़ी चिंता बन चुकी है। नेचर में 2021 में प्रकाशित एक शोध पत्र के मुताबिक मुख्य रूप से 150 से 500 माइक्रोन तक के आकार के माइक्रोप्लास्टिक कण समुद्री जल और समुद्री जीवों के 100 फीसदी सैंपल में पाए चुके हैं। एक और रिसर्च के मुताबिक ताजा पानी के स्रोतों में प्रति लीटर माइक्रोप्लास्टिक के 56 से लेकर 0.33 के बीच कणों की मौजूदगी पाई गई है।

    गरीब देशों के लिए बेहद उपयोगी-रिपोर्ट

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    दक्षिण कोरियाई वैज्ञानिकों ने जो शोध पत्र तैयार किया है, उसकी लाइन की शुरुआत ही यहीं से होती है- 'सबसे मुश्किल वैश्विक चुनौतियों में ताजे पानी की किल्लत बहुत बड़ी समस्या बनकर उभरी है, जो कि माइक्रोपॉल्यूटेंट्स और वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स (VOCs) के कारण होने वाले पानी का गंभीर प्रदूषण है।' इन वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि उनके द्वारा विकसित तकनीक आर्थिक रूप से उपयोगी होने के कारण सबके लिए उपयोगी साबित हो सकती है, जो कि प्रदूषित जल को शुद्ध करके ऐसे इलाकों में भी पेयजल की आपूर्ति करने में सक्षम है, जहां बिजली नहीं है।

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