US Think Tank: ग्वादर पोर्ट के रास्ते पाकिस्तान में मिलिट्री बेस बना रहा है चीन
एक अमेरिकी थिंक टैंक का कहना है कि पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में चीन की खासी दिलचस्पी है। उसकी दिलचस्पी की वजह है पाकिस्तान में अपना मजबूत सैन्य ठिकाना स्थापित करना। इस थिंक टैंक के मुताबिक चीन, पाकिस्तान में अपनी सैन्य स्थिति मजबूत करना चाहता है।
वाशिंगटन। एक अमेरिकी थिंक टैंक का कहना है कि पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में चीन की खासी दिलचस्पी है। उसकी दिलचस्पी की वजह है पाकिस्तान में अपना मजबूत सैन्य ठिकाना स्थापित करना। इस थिंक टैंक के मुताबिक चीन, पाकिस्तान में अपनी सैन्य स्थिति मजबूत करना चाहता है। इसलिए ही ग्वादर पोर्ट चीन के आर्थिक व वाणिज्यक हितों में है। वहीं दूसरी ओर थिंक टैंक ने अमेरिकी सांसदों को भारत के साथ राजनीतिक, सैन्य तथा असैन्य सेवाओं के लिए भी साझेदारी मजबूत करने की सलाह दी और कहा कि यह अमेरिका के हित में होगा। थिंक टैंक ने इस दिशा में ट्रंप प्रशासन द्वारा उठाए जाने वाले कदमों को भी सराहा।

भारत ने करीब एक दशक पहले जताई थी चिंता
अमेरिकी थिंक टैंक द हैरिटेज फाउंडेशन के सदस्यों ने अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की विदेश मामलों की समिति से कहा कि हाल में हुए बदलाव यह संकेत दे रहे हैं कि पाकिस्तानी नेतृत्व को यह अहसास होता जा रहा है कि चीन का निवेश उसके अपने आर्थिक तथा रणनीतिक हितों के बारे में अधिक है। थिंक टैंक में दक्षिण एशिया विषय पर रिसर्च फेलो जेफ स्मिथ ने कहा है कि एक दशक पहले की बात करें तो बड़ी संख्या में भारतीय रणनीतिकारों ने चिंता जताई थी और सार्वजनिक तौर पर शिकायत की थी कि चीन हिंद महासागर के किनारे-किनारे बंदरगाह सुविधाएं और साजो-सामान सुविधाएं विकसित कर सकता है, लेकिन उस वक्त इन चिंताओं को खास महत्व नहीं दिया गया।
ट्रंप प्रशासन की तारीफ
स्मिथ ने भारत के साथ साझेदारी को मजबूत करने के लिए ट्रंप प्रशासन की तारीफ की। उन्होंने कहा कि अमेरिका का भारत के साथ अनोखा नाता है और ट्रंप प्रशासन नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार के साथ इसे और आगे ले जाने के लिए आशावान है। उनका मानना है कि अमेरिका और भारत के बीच मजबूत साझेदारी हिंद महासागर में हमारे हितों की रक्षा करेगी। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के सदस्य एन वागनर ने कहा कि चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) के लिए चीन की वित्त पोषण की जो शर्तें हैं, वह एक ऐसा मुद्दा बन गया है, जो दोनों देशों के बीच सहयोग रोकने का काम कर सकता है। कार्नेगी एनडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस में दक्षिण एशिया कार्यक्रम के नॉन रेसिडेंट स्कॉलर अकील शाह ने कहा कि पाकिस्तानी अधिकारियों को यह अहसास है कि यह असल में पाकिस्तान के आर्थिक विकास के लिए नहीं, बल्कि चीन के वाणिज्यिक, आर्थिक और सैन्य हितों के लिए है।
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