भारत में दो साल बाद भी अमेरिका के राजदूत नहीं, बाइडेन क्यों नहीं भेज पा रहे 'दोस्त' के घर अपना दूत?

अमेरिकी रिवाज के मुताबिक, हर राष्ट्रपति के कार्यकाल में अलग अलग राजदूत होता है और ट्रंप प्रशासन के जाने के बाद केनेथ जस्टर भी भारत से चले गये थे। केनेथ जस्टर के जाने के बाद भारत में नये राजदूत की नियुक्ति नहीं हुई है।

US-India Tie: जो बाइडेन के राष्ट्रपति पद संभालने के बाद से अब दो साल होने वाले हैं, जबसे भारत में अमेरिका के राजदूत नहीं है। यानि, जो अमेरिका भारत को एशिया का सबसे खास स्ट्रैटजिक पार्टनर मानता है, उसने पिछले दो सालों से भारत में अपना राजदूत नहीं भेजा है। राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पिछले साल एरिक गार्सेटी को भारत में राजदूत बनाने के लिए नॉमिनेट किया था, लेकिन सीनेट ने उसे रोक दिया था, जिसके बाद से भारत में अमेरिका ने अभी तक राजदूत नहीं भेजा है।

भारत में राजदूत का मामला लंबित

भारत में राजदूत का मामला लंबित

एक्सपर्ट्स का कहना है कि,चूंकी भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर कई सालों तक अलग अलग देशों में एंबेसडर रह चुके हैं, जिसमें अमेरिका भी शामिल है और उन्हें अमेरिका में किससे बात करनी है, इसकी तमाम जानकारियां मालूम है, नहीं तो अमेरिका की जो व्यवस्था है, और जो लॉबी है, उसके जरिए बाइडेन प्रशासन तक पहुंचना भारत के लिए काफी मुश्किल होता है। वहीं, यूएस फॉरेन सर्विस के प्रोफेशनल एसोसिएशन अमेरिकन फॉरेन सर्विस एसोसिएशन (एएफएसए) के आंकड़ों को देखने पर पता चलता है, कि एरिक गार्सेटी का नॉमिनेशन सीनेट के सामने पिछले 16 महीनों से लंबित है। सीनेट में 20 राजदूतों का नॉमिनेशनल लंबित पड़ा हुआ है, जिसमें सबसे लंबे वक्त से नॉमिनेशन एरिक गार्सेटी का ही लंबित है।

भारत-अमेरिका संबंध अहम

भारत-अमेरिका संबंध अहम

विशेषज्ञों का मानना है कि, भारत में अमेरिकी राजदूत का पद पिछले दो सालों से खाली रहना काफी आश्चर्यजनक है और ये उस वक्त खाली पड़ा है, जब नये सिरे से काफी तेजी के साथ भारत और अमेरिका के संबंध विकसित हो रहे हैं। वहीं, अमेरिका लगातार और बार बार भारत को अपना स्ट्रैटजिक पार्टनर बताता आ रहा है। हाल ही में संपन्न अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में ऊपरी सदन में डेमोक्रेट्स को कम बहुमत मिलने के बावजूद, दिप्रिंट ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है, कि उसने जिस पूर्व राजनयिक से बात की, वह गार्सेटी के नामांकन की पुष्टि के बारे में आशावादी नहीं था। कुछ लोगों का अनुमान है, कि 2024 में राष्ट्रपति पद के कार्यकाल के अंत तक अधिक चार्ज डी अफेयर्स का 'रोलओवर' हो सकता है। पूर्व राजदूत केनेथ जस्टर की जनवरी 2021 में भारत से विदाई के बाद से बाइडेन प्रशासन ने पांच अंतरिम दूतों को भारत में नियुक्त किया है, लेकिन राजदूत की नियुक्ति अभी तक नहीं हो पाई है।

गार्सेटी की नियुक्ति क्यों है पेडिंग

गार्सेटी की नियुक्ति क्यों है पेडिंग

एरिक गार्सेटी को जुलाई 2021 में आधिकारिक रूप से बाइडेन प्रशासन ने भारत में राजदूत बनाने के लिए नामांकित किया गया था, लेकिन सीनेट में उनका नाम पेंडिंग पड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, एरिक गार्सेटी के ऊपर आरोप है, कि उन्होंने अपने एक सहयोगी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की, जबकि उसके खिलाफ यौन उत्पीड़न और पीड़ित को धमकाने का आरोप था। हालांकि, एरिक गार्सेटी ने इन आरोपों का बार बार खंडन किया है। वहीं, बाइडेन प्रशासन भी एरिक गार्सेटी के नामांकन को लेकर अड़ा हुआ है और इस बात की उम्मीद न्यूनतम है, कि किसी नये नाम को नॉमिनेट किया जाएगा। 15 दिसंबर को सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी को बहुमत हासिल हो चुकी है और बाइडेन प्रशासन ने कहा था, कि गार्सेटी का नामांकम उसके लिए प्राथमिकता है और वो गार्सेटी का समर्थन करना जारी रखेगा। हालांकि, पूर्व भारतीय विदेश सचिव कंवल सिब्बल का मानना है, कि 'गार्सेटी का नामांकन अपनी प्राथमिकता खो चुका है।'

बाइडेन का आधा कार्यकाल खत्म

बाइडेन का आधा कार्यकाल खत्म

बाइडेन प्रशासन की प्राथमिकता कैसी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है, कि उनके 4 साल के कार्यकाल में से 2 साल खत्म हो चुके हैं, लेकिन अभी तक वो भारत में राजदूत नियुक्त नहीं कर पाए हैं। पूर्व भारतीय विदेश सचिव कंवल सिब्बल का कहना है, कि "नामांकन में जिस तरह की देरी पहले ही हो चुकी है, उससे यही लगता है कि, इसने प्राथमिकता की डिग्री खो दी है। इसमें जितना ज्यादा देरी होगा, नियुक्तिकर्ता के पास दिल्ली में उतना ही कम समय होगा"। सिब्बल ने दिप्रिंट को बताया कि, "नियुक्तियों को अपने पैर जमाने में छह महीने का समय लगता है और तब तक नये राष्ट्रपति का चुनाव आ जाएगा, लिहाजा जो नये एंबेसडर आएगा, क्या वो अपने पद के साथ इंसाफ कर पाएगा।"

भारत में ही नियुक्ति में सबसे ज्यादा देरी

भारत में ही नियुक्ति में सबसे ज्यादा देरी

AFSA के आंकड़ों के मुताबिक, 20 देश ऐसे हैं जिनके अमेरिकी राजदूत नामितों की पुष्टि लंबित है। इनमें शामिल देश हैं, अज़रबैजान, बहामास, बारबाडोस, काबो वर्डे, कंबोडिया, इक्वाडोर, गुयाना, भारत, कुवैत, मालदीव, मोंटेनेग्रो, नाइजर, नाइजीरिया, पापुआ न्यू गिनी और वानुअतु, रवांडा, सऊदी अरब, तिमोर-लेस्ते, तुर्कमेनिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात और जिम्बाब्वे। लेकिन, इस साल घोषित किए गये सभी अन्य नॉमिनेशन के विपरीत गार्सेटी एकमात्र ऐसे नॉमिनेशन हैं, जो पिछले 16 महीने से लंबित है। लंबित सूची में भारत एकमात्र एशियाई देश भी है। इस बीच, अमेरिका ने पाकिस्तान में आधिकारिक तौर पर इस साल अप्रैल में अपने राजदूत की नियुक्ति कर दी है।

भारत के पड़ोसी देशों में नियुक्ति

भारत के पड़ोसी देशों में नियुक्ति

फरवरी महीने में श्रीलंका में, अक्टूबर में नेपाल में और पिछले दिसंबर में बांग्लादेश में भी राजदूत की नियुक्ति कर दी गई। AFSA के डेटा से यह भी पता चलता है, कि 15 देशों में कोई नामांकन नहीं हुआ है, जिसमें शामिल देश हैं, इटली, हैती, गैबॉन, इथियोपिया, इरिट्रिया, डोमिनिकन गणराज्य, क्यूबा, ​​क्रोएशिया, कोलंबिया, बोलीविया, अफगानिस्तान, माइक्रोनेशिया, पलाऊ, सोलोमन द्वीप और सीरिया। इस तरह कुल 35 देश ऐसे हैं जहां अमेरिकी राजदूत का पद खाली है। वहीं, इस हफ्ते, सीनेट ने दो लंबे समय से लंबित राजदूतों के नामांकन की पुष्टि की है, इनमें रूस के लिए लिन एम ट्रेसी और ब्राजील के लिए एलिजाबेथ फ्रॉली बागले का नाम है।

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