हाइपरसोनिक हथियारों की विनाशक रेस में उलझे अमेरिका और चीन, दुनिया के लिए कैसे है बड़ा खतरा?
इस सप्ताह यूएस नेवल इंस्टीट्यूट द्वारा जारी सैटेलाइट तस्वीरें चीनी रेगिस्तान के पूर्वी किनारे पर बनाए गये नकली लक्ष्यों की एक स्ट्रिंग दिखाती हैं जो विमान वाहक, विध्वंसक और नौसेना के ठिकानों जैसे युद्धपोतों की तरफ हैं।
नई दिल्ली, मई 15: दक्षिण चीन सागर में अमेरिकी युद्दपोतों को अपने हाइपरसोनिक मिसाइलों से कैसे ध्वस्त करेगा, इसकी काफी तेज तैयारी चीन ने शुरू कर दी है। चीन ने अमेरिकी युद्धपोतों और ठिकानों पर हाइपरसोनिक मिसाइल हमलों का अभ्यास काफी तेज रफ्तार से शुरू कर दिया है। और चीन के शिनजियांग प्रांत के तकलामाकन डेजर्ट शो में नकली लक्ष्यों को भेदती चीन की हाइपरसोनिक मिसाइलों की हालिया सैटेलाइट तस्वीरें इस बात की पुष्टि करती हैं। वहीं, अमेरिका भी चीन को उसी की भाषा में जवाब दे रहा है, जिससे सवाल ये उठ रहे हैं, कि क्या दो सुपरपॉवर्स की हथियारों की रेस दुनिया के लिए विनाशकारी साबित होगा?

अमेरिका बनाम चीन...
इस सप्ताह यूएस नेवल इंस्टीट्यूट द्वारा जारी सैटेलाइट तस्वीरें चीनी रेगिस्तान के पूर्वी किनारे पर बनाए गये नकली लक्ष्यों की एक स्ट्रिंग दिखाती हैं जो विमान वाहक, विध्वंसक और नौसेना के ठिकानों जैसे युद्धपोतों की तरफ हैं। लक्ष्यों पर कॉन्फ़िगरेशन, दूरस्थ स्थान और प्रभाव क्रेटर का मतलब है, कि वे चीन की हाइपरसोनिक एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलों (एएसबीएम) के परीक्षण के लिए लाए गये थे, जो प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी युद्धपोतों के लिए एक खतरनाक खतरा है। पिछली बार, पिछले साल दिसंबर महीने में अमेरिकी सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला था कि, इस जगह से 13 किलोमीटर दक्षिण पूर्व दिशा में चीन ने एक विमान वाहक अभ्यास लक्ष्य का निर्माण किया था और उसे ध्वस्त करने की प्रैक्टिस की गई थी। लेकिन, इस साल फरवरी महीने में, मिसाइल हमले के अभ्यास में उस बेस को नष्ट कर दिया गया।

चीन का खतरनाक अभ्यास
वहीं, अब जो सैटेलाइट तस्वीरें आईं हैं, उनसे पता चला है कि, प्रशांत महासागर में जिस जगह पर वास्तव में अमेरिकी युद्धपोत है, उस जगह से 310 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में चीन ने अमेरिकी युद्धपोत की तरह ही एक बेस तैयार किया है और उसपर निशाना लगाकर ध्वस्त करने का अभ्यास किया जा रहा है। माना जा रहा है कि, इस बेस का निर्माण दिसंबर 2018 में किया गया था, लेकिन इस बेस का पता अभी चला है। एशिया टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबित, चीन ने जिन लक्ष्यों का निर्माण किया है, वो काफी ज्यादा जटिल हैं और जहाज और घाट को अलग अलग सामग्रियों से बना है, जिनमें रडार और इन्फ्रारेड टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया गया है, वहीं, जहाज के लक्ष्य जमीन पर रखी शीट धातु से बने होते हैं।

क्या करना चाहता है चीन?
एशिया टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यदि ऐसा है, तो यह चीन की सोफिस्टिकेटेड लक्ष्य भेदने की क्षमता की तरफ इशारे करता है, जो रडार, इन्फ्रारेड गाइडेंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी से लैस हो, ताकि भीड़भाड़ में भी लक्ष्य को सटीकता से खोजकर उसे निशाना बनाया जा सके। विश्लेषकों का कहना है कि, भीड़भाड़ वाले इलाकों से मतलब है, तटीय क्षेत्रों में, सी लेंस ऑफ कम्युनिकेशन (एसएलओसी) और नौसैनिक ठिकानों में प्रमुख लक्ष्यों में किसी खास लक्ष्य को खोजकर उसे भेदना हो। ताइवान के काऊशुंग नेवल अकादमी के पूर्व इंस्ट्रक्टर लू ली शिह के अनुसार, चीन की नई सुविधा ताइवान में सुआओ नौसैनिक अड्डे का अनुकरण करने के लिए है, जिसमें टारगेट शिप, बंदरगाह पर की लुंग श्रेणी के विध्वंसक जहाजों का का प्रतिनिधित्व करता है।

क्या ताइवान के ठिकाने हैं निशाने पर?
लू ली शिह का मानना है कि, चीन का यह लक्ष्य रेंज और मिसाइल परीक्षण, गुआम और ताइवान पर मिसाइल हमलों का अनुकरण करने के लिए चीन की नई YJ-21 हाइपरसोनिक मिसाइल को टाइप 55 क्रूजर से दागने के लिए हैं। सुआओ नौसैनिक अड्डा ताइवान के पूर्वी हिस्से में है, जो इसे कीलुंग नौसैनिक अड्डे की तुलना में मिसाइल और हवाई हमले के लिए कम संवेदनशील बनाता है, जो द्वीप के पश्चिम की ओर स्थिति है। ताइवान के लिए सुआओ नौसैनिक हवाई अड्डा रणनीतिक तौर पर इसलिए काफी ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगर चीन ताइवान की नाकेबंदी कर देता है, फिर भी ताइवान अपने लोगों तक और अपने सैनिकों तक इस नौसैकिन अड्डे के जरिए जरूरी सामानों की सप्लाई करता रहेगा। लिहाजा, इस प्रकार आक्रमण की स्थिति में चीनी मिसाइल हमलों के लिए सुआओ नेवल बेस एक प्रमुख लक्ष्य है।

गुआम नौ-सैनिक हवाई अड्डा भी निशाने पर
इसके साथ ही चीन के हाइपरसोनिक मिसाइल के निशाने पर गुआम नौसैनिक हवाई अड्डा भी है, जहां अमेरिकी नौसैनिक मौजूद हैं। गुआम नौसैनिक हवाई अड्डे पर विध्वंसक अमेरिका एयरक्राफ्ट कैरियर, पानी और जमीन में मार करने वाले हथियार, मौजूद हैं। गुआम नौसैनिक हवाई अड्डा अमेरिका के लिए रणनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण अड्डा है, लिहाजा चीन के लिए गुआम नौसैनिक हवाई अड्डा उसका प्राथमिक लक्ष्य है और अपने अभ्यास में चीन गुआम नौसैनिक हवाई अड्डा को उड़ाने की योजना पर भी काम कर रहा है। इतना ही नहीं, इसके साथ साथ चीन अपनी अंतरिक्ष-आधारित लक्ष्यीकरण क्षमताओं में भी सुधार कर रहा है और अब ड्यूएल यूज टेक्नोलॉजी का लाभ उठाने की कोशिश में है, ताकि अंतरिक्ष में चीन ना सिर्फ अपने अंतरिक्ष स्टेशन की हिफाजत कर सके, बल्कि अंतरिक्ष में होने वाली किसी लड़ाई का भी मुकाबला कर सके। चीन की क्षमता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं, कि पिछले साल जून में न्यूयॉर्क के तट पर युद्धाभ्यास में शामिल अमेरिकी युद्धपोतों को चीमी रिमोट सेंसिग उपग्रह ने वास्तविक समय में ट्रैक कर लिया था, जो अमेरिका के लिए काफी चिंता की बात है।

चीन की शक्तिशाली क्षमता
चीन की क्षमता में कितना इजाफा हुआ है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं, कि पहले जब पहले अमेरिकी नौसैनिक अभ्यासों पर नजर रखी जाती थी, तो चीन को विश्लेषण के लिए अपने ग्राउंड स्टेशनों पर सैटेलाइट डेटा पर भरोसा करना पड़ता था और चीन को उससे जानकारी तब मिलती थी, जब इस तरह से युद्धाभ्यास खत्म हो जाते थे। लेकिन, अब चीनी सैटेलाइट उसकी लाइव जानकारी पीएलए तक पहुंचा सकती है। इस सैटेलाइट को लेकर चीन ने दावा किया है कि, यह प्रति सेकंड 200 हाई-डेफिनिशन फ्रेम का विश्लेषण कर सकता है और ये ऐसी रफ्तार है, जो दुश्मन सेना की सटीक जानकारी देने के लिए काफी है।

आर्टिफिशयल टेक्नोलॉजी का अहम योगदान
इसके साथ ही, चीन ने अपने जहाज पर सैटेलाइट आधारित आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस को अपने कॉमर्शियल इमेजिंग सैटेलाइट्स में बदलने की योजना बनाई है, और चीन ने अपने इन सैटेलाइट्स को शक्तिशाली, कम लागत वाली जासूसी और लक्ष्यीकरण प्लेटफार्मों में बदल दिया है, जिसका फायदा पाकिस्तान काफी आसानी से उठा सकता है। ये सैटेलाइट कितने खतरनात होते हैं, ये यूक्रेन युद्ध से समझा जा सकता है, जहां अमेरिकी सैटेलाइट से जानकारी लेकर यूक्रेन ने रूस के कई युद्धपोतों को डूबा दिया है। और साल 2025 तक चीन की कोशिश अंतरिक्ष में 125 ऐसे सैटेलाइट को इंस्टॉल करना है।

भारत के लिए भी खतरा बनेगा चीन
एशिया टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की कोशिश आने वाले वक्त में कम से कम एक हजार ऐसे सैटेलाइट को इंस्टॉल करने की है, जो आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस से लैस रहेंगे, जिनका डेटा वो पारंपरिक रिमोट सेंसिंग उपग्रहों से कच्चे डेटा प्राप्त करेगा और उनका विश्लेषण करेगा और फिर चीन अपने लिए खतरनाक लक्ष्यों की पहचान करेगा और फिर उनके खत्म करने की कोशिश करेगा, या फिर उन देशों को बेचेगा, जिनके साथ चीन का करार होगा। जाहिर तौर पर भारत के लिए ये एक बड़ा खतरा है। भले ही मौजूदा टेक्नोलॉजी के तहत हाइपरसोनिक मिसाइलों को रोकना संभव नहीं है, लेकिन अमेरिका सक्रिय रूप से खतरे को खत्म करने के लिए काउंटरमेशर्स पर काम कर रहा है।

अमेरिका की तैयारी क्या है?
अमेरिका ने चीन के हाइपरसोनिक शस्त्रागार को नष्ट करने के लिए लेजर हथियार विकसित करने में महत्वपूर्ण संसाधनों का इस्तेमाल कर टेक्नोलॉजी का निर्माण कर रहा है। लेजर-आधारित मिसाइल रक्षा प्रणालियों के जरिए तत्काल हिट, सटीक लक्ष्यीकरण और स्केलेबल लेजर पावर शामिल हैं। हालांकि, लेजर सुरक्षा स्थापित करना काफी महंगा तो होता है, लेकिन इससे जो लेजर शॉट फायर किया जाता है, उसका खर्च नगण्य होता है।

इजरायल भी विकसित कर रहा टेक्नोलॉजी
इजरायल भी इस टेक्नोलॉजी को विकसित करने में लगा है, ताकि हमास आतंकियों द्वारा दागी जा रही मिलाइलों को वो काफी कम लागत में ध्वस्त कर सके। इसी साल फरवरी में, अमेरिकी नौसेना ने एक ड्रोन के खिलाफ एक जमीन-आधारित लेजर प्रणाली का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है, जिसने पहली बार उड़ान में एक सबसोनिक क्रूज मिसाइल को मार गिराया है। इसके अलावा अमेरिका, लॉकहीड मार्टिन टैक्टिकल एयरबोर्न लेजर सिस्टम भी विकसित कर रहा है, जिसका उपयोग आने वाली सामरिक मिसाइलों को नीचे गिराने के लिए किया जाएगा, उदाहरण के लिए हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल या सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों का ये दुश्मन होगा।












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