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मुस्लिमों का खलीफा बनना चाहता है तुर्की, जानिए,भारत के खिलाफ क्या है राष्ट्रपति एर्दोगन के मंसूबे?

नई दिल्ली। पूरी दुनिया आतंकवाद नामक दहशतगर्दी का शिकार है, लेकिन तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयब एर्दोगन के मुस्लिमों का खलीफा बनने की धुन में लगातार आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई को कमजोर करने में लगा है। फिलहाल तुर्की के निशाने पर भारतीय मुसलमान हैं, जिन्हें तुर्की पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के साथ मिलकर साधने की कोशिश में कर रहा है। यह कवायद जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद अधिक मुखर हुई है। सीमापार से घुसपैठ कर पाकिस्तान लगातार भारत को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है, जिसके मंसूबों में साथ देकर तुर्की मुस्लिमों का खलीफा बनना चाहता हैं।

Erdogan

अनुच्छेद 370 की समाप्ति पर तुर्की ने पाकिस्तान का समर्थन किया

अनुच्छेद 370 की समाप्ति पर तुर्की ने पाकिस्तान का समर्थन किया

गौरतलब है तुर्की लगातार ऐसे बयान देता आया है, जो मुद्दा भारत के घरलू मामलों से जुड़ा है। इनमें जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति का मुद्दा प्रमुख है, जब तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने पाकिस्तान का समर्थन किया। इसके बाद से पाकिस्तान और तुर्की की गठजोड़ और मजबूत हुई है। भारत के खिलाफ खतरनाक मंसूबों पालने वाले तुर्की और पाकिस्तान के इरादे भारतीय मुसलमानों को भटकाना है। इसके लिए तुर्की अपनी यूनिवर्सिटीज और जिहाद फैलाने वाले एनजीओ को हथियार बना रहा है, जिससे वह भारत में तुर्की समर्थक मुस्लिम आबादी खड़ी करना चाहता है।

आईएसआई भारतीय मुस्लिमों को भारत के खिलाफ बरलगाने में लगी है

आईएसआई भारतीय मुस्लिमों को भारत के खिलाफ बरलगाने में लगी है

खुफिया रिपोर्ट कहती है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई पिछले एक साल से तुर्की राष्ट्रपति एर्दोगन समेत तुर्की के कई प्रभाशाली सांसदों, लेखकों और बड़े संस्थानों के अधिकारियों की मदद से भारतीय मुस्लिम आबादी में एक ऐसा वर्ग तैयार करने में जुटी है, जो मौका पड़ने पर भारत के खिलाफ नारे लगा सकें। तुर्की और पाकिस्तान के इस नापाक इरादों में पिछले एक साल से वर्ल्ड कश्मीर फोरम चलाने वाला पीओके निवासी गुलाम नबी फई भी उनकी मदद कर रहा है।

जम्मू-कश्मीर पर 30 से अधिक कार्यक्रम तुर्की करवा चुकी है आईएसआई

जम्मू-कश्मीर पर 30 से अधिक कार्यक्रम तुर्की करवा चुकी है आईएसआई

सूत्र बताते हैं कि तुर्की, पाकिस्तान और पीओके निवासी गुलाम नबी फई पिछले एक साल में जम्मू-कश्मीर पर 30 से अधिक कार्यक्रम तुर्की की अलग-अलग यूनिवर्सटीज में करवा चुकी है। पाकिस्तान की आईएसआई तुर्की में इन कार्यक्रमों के लिए खुली फंडिंग कर रही हैं। इनका मकसद तुर्की में पढ़ रहे भारतीय मुसलमानों को भारत के खिलाफ तैयार करना है। य़ही कारण है कि लगातार तुर्की में भारतीय मुसलमानों को छात्रवृत्ति के जरिए एडमिशन दिया जा रहा है।

तुर्की में हो रहे कार्यक्रमों में एर्दोगन का बेटा बिलाल एर्दोगन कर रहा है

तुर्की में हो रहे कार्यक्रमों में एर्दोगन का बेटा बिलाल एर्दोगन कर रहा है

एजेंसियों के मुताबिक तुर्की राष्ट्रपति एर्दोगन का बेटा बिलाल एर्दोगन इसमें मदद कर रहा है, जिसके तहत भारतीय मुसलमानों को उनके देश से काटकर उन्हें तुर्की समर्थक बनाने के लिए सुनियोजित तरीके से ब्रेन वॉश किया जा रहा है। इसके लिए तुर्की ने अपनी यूनिवर्सिटीज और सोशल वर्क के नाम पर बनाए गए सैकड़ों एनजीओ का हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जहां भारतीय मुसलमानों को पढ़ने के लिए लालच देकर बुलाया जाता है।

एनजीओ UNIW और TUGVA इस काम में आईएसआई की मदद कर रहे हैं

एनजीओ UNIW और TUGVA इस काम में आईएसआई की मदद कर रहे हैं

इन कामों को अंजाम देने के लिए खड़े गए तुर्की के इन एनजीओ का सबसे बड़ा संगठन यूनियन ऑफ एनजीओ ऑफ इस्लामिक वर्ल्ड (UNIW) और TUGVA हैं, जो तुर्की सरकार के सीधे नियंत्रण पर काम करते हैं। बताया जाता है कि एनजीओ UNIW से दुनिया के 66 देशों के 354 मुस्लिम एनजीओ जुड़े हुए हैं, जिन्हें तुर्की सरकार हर साल करोड़ों रुपए अनुदान में देती है। बड़ी बात यह है कि UNIW एनजीओ से भारत के कई मुस्लिम संगठन जुड़े हुए हैं, जिनका प्रमुख काम पूरी दुनिया में इस्लाम खतरे होने का नारा लगवाना है।

जम्मू-कश्मीर में तुर्की से आए मुस्लिमों की आबादी भी काफी संख्या है?

जम्मू-कश्मीर में तुर्की से आए मुस्लिमों की आबादी भी काफी संख्या है?

सूत्रों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में तुर्की से आए मुस्लिमों की आबादी भी काफी संख्या में मौजूद हैं, जो जम्मू-कश्मीर में छुप कर रह रहे हैं, जिन्हें किसी खास मकसद के लिए वहां जमा किए जा रहा है। अभी हाल में ग्रीस पत्रकार की वेबसाइट Pentapostagma ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया था कि एर्दोगन पाकिस्तान की मदद से कश्मीर में सीरिया के विद्रोही आतंकियों को भेजने की योजना पर काम रहा है, जिसको अंजाम देने के लिए तुर्की ने कई आतंकी गुटों से भी बातचीत की है।

तुर्की अपने कुछ यूनिट्स कश्मीर में तैनात करना चाहता है: अबू इम्सा

तुर्की अपने कुछ यूनिट्स कश्मीर में तैनात करना चाहता है: अबू इम्सा

रिपोर्ट में कहा गया है कि सीरिया नेशनल आर्मी मिलिशिया के सुलेमान शाह ब्रिगेड्स के कमांडर मुहम्मद अबू इम्सा ने हाल में अपने मिलिशिया सदस्यों से कहा है कि तुर्की अपने यहां से कुछ यूनिट्स कश्मीर में तैनात करना चाहता है। सभी जानते हैं कि सुलेमान शाह ब्रिगेड्स को तुर्की का खुला समर्थन है, जिसका उत्तरी सीरिया के अफरीन जिले पर नियंत्रण है। सूत्र बताते हैं कि कश्मीर जाने वाले आतंकियों को तुर्की की ओर से 2000 डॉलर दी जाएगी।

फ्रांस इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ खुलकर खड़ा हो गया है

फ्रांस इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ खुलकर खड़ा हो गया है

उल्लेखनीय है एक इस्लामी अतिवादी द्वारा पेरिस में एक शिक्षक का सिर कलम किए जाने के बाद फ्रांस इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ खुलकर खड़ा हो गया है, जिससे तुर्की राष्ट्रपति एर्दोगन बौखला गए हैं। फ्रांस राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस्लामिक आतंकवाद को मुसीबत करार देते हुए जल्द इससे छुटकारा पाने का आह्वान किया, जिससे एर्दोगन के खलीफा बनने की चाहत पर पानी पड़ता जा रहा है।

मैक्रों के नेतृत्व फ्रांस बहुत ही खतरनाक दौर से गुजर रहा हैः एर्दोगन

मैक्रों के नेतृत्व फ्रांस बहुत ही खतरनाक दौर से गुजर रहा हैः एर्दोगन

तुर्की राष्ट्रपति एर्दोगन ने इसी बौखलाहट में दिए एक बयान में कहा है कि मैक्रों के नेतृत्व फ्रांस बहुत ही खतरनाक दौर से गुजर रहा है। हालांकि एर्दोगन पहले भी फ्रांस के राष्ट्रपति के खिलाफ जहर उगल चुके हैं। यही कारण था कि फ्रांस ने तुर्की राष्ट्रपति की बयानबाजी से नाराज होकर तुर्की से अपने राजदूत को वापस बुलाने का कदम उठाने का निर्णय कर लिया।

तुर्की की फ्रांस के साथ अदावत पेरिस की घटना के बाद शुरू हुई है

तुर्की की फ्रांस के साथ अदावत पेरिस की घटना के बाद शुरू हुई है

फ्रांस के साथ तुर्की की यह अदावत पेरिस की घटना के बाद शुरू हुई है, जब फ्रांस राष्ट्रपति द्वारा आतंकवाद को इस्लाम से जोड़कर बयान दिया। हालांकि फ्रांस के उक्त बयान से केवल तुर्की ही नहीं, बल्कि सभी मुस्लिम देशों द्वारा नाराजगी व्यक्त की गई थी। बावजूद इसके फ्रांस की सरकार चरमपंथी इस्लामिक गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई से पीछे नहीं हटी है। इसका नमूना हाल में फ्रांस में बंद की गई कई मस्जिदों के निर्णय से समझा जा सकता है।

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