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भारत की इज्जत हजम नहीं कर पा रहे तुर्की के राष्ट्रपति, मोदी को मिले 'स्पेशल ट्रीटमेंट' पर भड़के

ग्लासको जलवायु परिवर्तन सम्मेलन सीओपी-26 के दौरान पीएम मोदी को मिले स्पेशल ट्रीटमेंट के खिलाफ गुस्साए तुर्की ने विरोध दर्ज कराया था।

अंकारा/नई दिल्ली, नवंबर 14: कश्मीर पर बार बार पाकिस्तान के पक्ष में बोलने वाले और भारत को लेकर बार बार अपना भड़ास निकालने वाले तुर्की के राष्ट्रपति अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को मिल रही इज्जत और भारत की प्रतिष्ठा को पचा नहीं पा रहे हैं। ग्लासको शिखर सम्मेलन में भारत को जो स्पेशल ट्रीटमेंट मिला है, उसपर तुर्की के राष्ट्रपति ने जमकर भड़ास निकाली है, जबकि जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के दौरान तुर्की तमाम देशों के बीच उपेक्षित बना रहा।

'स्पेशल ट्रीटमेंट' पर भड़का तुर्की

'स्पेशल ट्रीटमेंट' पर भड़का तुर्की

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लासको शिखर सम्मेलन के दौरान मेजबान ब्रिटेन के लिए उस वक्त अजीब समस्या उत्पन्न हो गई, जब तुर्क ने ब्रिटेन के सामने एक 'देश' को 'स्पेशल ट्रीटमेंट' देने का आरोप लगाकर विरोध दर्ज कराया। तुर्की का इशारा सीधे तौर पर भारत था और तुर्की ने बैठक के दौरान मेजबान ब्रिटेन के सामने भारत के खिलाफ गुस्से का इजहार किया।

तुर्की को गुस्सा क्यों आया?

तुर्की को गुस्सा क्यों आया?

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लासको में जलवायु परिवर्तन को लेकर हुई बैठक के दौरान इतने बड़े वैश्विक कार्यक्रम के लिए मेजबानी करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे। ग्लासको में कई सुविधाओं का अभाव था। लिहाजा यूनाइटेड किंगडम सरकार ने वैश्विक समुदाय के प्रतिनिधिमंडलों से होटल साझा करने का आग्रह किया। इसके साथ ही वैश्विक नेताओं को होटलों से आयोजन स्थल तक लाने और ले जाने के लिए भी बसो की व्यवस्था की गई थी। लेकिन तीन देशों के लिए स्पेशल व्यवस्था की गई थी और उन तीन देशों में ब्रिटेन, अमेरिका और भारत शामिल था। इन तीन देशों के राष्ट्राध्यक्ष के लिए विशेष तौर पर बुक होटलों में रहने की अनुमति दी गई थी। वहीं, ग्लासको सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए अपने अपने होटल से अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन, भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन मोटरसाइकिल से कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे थे, जिसको लेकर तुर्की भड़का हुआ है।

भारत को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा तुर्की

भारत को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा तुर्की

रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन को ग्लासको सम्मेलन में कोई खास प्रोटोकॉल नहीं दिया गया और वो विश्व के दूसरे नेताओं के साथ ही बस में बैठकर सम्मेलन स्थल तक पहुंचे थे, जिसके बाद उन्होंने ब्रिटिश सरकार के साथ अपनी नाराजगी जताई है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों में कहा कि, कार्यक्रम स्थल पर मौजूद कई पर्यवेक्षकों को लगता है कि, तुर्की के राष्ट्रपति बेहद जो बेहद सावधानी से खुद को नये खलीफा की तरफ प्रोजेक्ट करने की कोशिश कर रहे हैं, वो भारत को मिले स्पेशल ट्रीटमेंट से काफी नाराज हो गये थे। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने ब्रिटिश सरकार से पूछ कि 'भारत को मिल रहे विशेषाधिकार व्यवहार को लेकर वो क्या मानते हैं?'। सूत्रों ने कहा कि, तुर्की के नेता ने भारत तो मिले स्पेशल ट्रीटमेंट के विरोध के निशान के रूप में खुद को कार्यवाही से दूर रखा, जो पहले से ही तनावपूर्ण द्विपक्षीय समीकरणों को और बढ़ा सकता है।

''भारत का विशेषाधिकार सही''

''भारत का विशेषाधिकार सही''

रिपोर्ट के मुताबिक, जब तुर्की के राष्ट्रपति ने ब्रिटिश सरकार के अधिकारियो के पास अपनी नाराजगी जताई तो ब्रिटिश अधिकारियों ने भारत को मिले स्पेशल ट्रीटमेंट को सही ठहराया और कहा कि, भारत ने हाल ही में जलवायु संकट के संबंध में "समस्या का हिस्सा" टैग को हटाने और जलवायु परिवर्तन को कम करने की दिशा में नये संकल्प के साथ अपने विचार देशों के बीच ट्रांसफर करने के लिए ईमानदारी से काम किए हैं। भारत ने अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन लॉन्च किया है, जिसमें अमेरिका भी शामिल हुआ है, और इससे पहले 2015 में हुए पेरिस जलवायु परिवर्तन सम्मेलन और 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव के जलवायु कार्रवाई शिखर सम्मेलन में इतने बड़े फैसले नहीं हुए थे, इसीलिए भारत को ज्यादा महत्व दिया गया है।

भारत के प्रोजेक्ट्स की तारीफ

भारत के प्रोजेक्ट्स की तारीफ

तुर्की के राष्ट्रपति को ब्रिटिश अधिकारियों ने बताया कि, जलवायु परिवर्तन रोकने की दिशा में पहल करते हुए पीएम मोदी ने कई बड़े प्रोजेक्ट्स लॉन्च किए हैं। स्वच्छ भारत अभियान, उज्ज्वला योजना और नमामि गंगे योजना को भी भारत सरकार ने काफी प्रमुखता से पेश किया है। इसके अलावा सीओपी "शिखर सम्मेलन" में भी पीएम मोदी ने निश्चित तौर पर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रिपोर्ट के मुताबिक, कहा गया है कि, भारत ने 2030 तक अनुमानित कार्बन उत्सर्जन को एक बिलियन टन कम करने के साहसिक लक्ष्य को निर्धारित करने का लक्ष्य रखा है और भारत के इस संकल्प से 'कुछ लोग' नाराज हो सकते हैं।

पहले होता था भेदभाव

पहले होता था भेदभाव

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार की तरफ से इस बार ग्लोबल वॉर्मिंग और ग्रीन हाउस गैस को लेकर बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पेश किया गया है। वहीं, सूत्रों ने कहा कि, भारत के लिए ऐसा करना अत्यंत आवश्यक था। ऐसा इसलिए, क्योंकि, 1870 से 2019 के बीच भारत सिर्फ 4 प्रतिशत ही ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता था, बावजूद इसके भारत को 'तीसरे सबसे बड़े प्रदूषक' के तौर पर देखा जाता था और भारत के साथ ये सबसे बड़ी बेइमानी की जा रही थी और अब जलवायु परिवर्तन को लेकर जिस तरह से वैश्विक विमर्श हो रहे हैं, उसको देखते हुए भारत को प्रमुखता से अपनी बात रखना बेहद जरूरी था और भारत वैश्विक विमर्श को नजरअंदाज नहीं कर सकता था। लिहाजा, इस बार ग्लासको में हुए जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में भारत ने खुद को वैश्विक नेता के तौर पर प्रोजेक्ट किया और अपनी बात प्रमुखता से दुनिया के सामने रखते हुए दुनिया के सामने नये विकल्पों को भी उठाया है।

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