तीन कहानियां: बंदूक से सामना होने पर इन्होंने क्या किया?
बीते दिनों फ्लोरिडा के स्कूल में हुई गोलीबारी ने दुनिया को हिलाकर रख दिया. स्कूली बच्चों की मौत की ख़बर ने सबकी आंखों को नम कर दिया. अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा कि अगर वो वहां मौजूद होते तो बिना हथियार के भी स्कूल में चले जाते और बच्चों को बचाने की कोशिश करते.
लेकिन क्या दूसरे लोग भी ऐसा ही करते? बीबीसी ने तीन लोगों से बात की और जानने की कोशिश की कि जब मौत उनके सामने बंदूक ताने खड़ी थी तो उन्होंने क्या किया? यानी जब उनका किसी बंदूकधारी से सामना हुआ तो उन्होंने उस स्थिति का सामना कैसे किया?
'मैं खुद को बचाने के लिए लड़ा'
हीदर ब्रायंट, 42, मैरीलैंड
एक शाम मैं स्टोर में अकेले काम कर रहा था. तभी एक आदमी स्टोर में घुसा और मेरी छाती पर बंदूक तान दी. उसने मुझसे पैसे मांगे.
मौत को सामने देख मैंने सारे पैसे एक बैग में डालकर उसे दे दिए. मुझे लगा कि अब वो मुझे बख़्श देगा और चला जाएगा.
लेकिन उसने मुझे उसके साथ एक बार फिर स्टॉक रूम में चलने के लिए कहा. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं ऐसी हालत में क्या करूं. मेरे पास सोचने का बहुत कम समय था.
मैंने स्टॉक रूम खोलने का नाटक किया. मैं रूम खोल रहा था तभी उसने पल भर के लिए मेरी छाती से बंदूक हटाई. इसी पल का फायदा उठाकर मैंने लोहे की अलमारी उसके सर पर धकेल दी.
वो घुटनों पर गिर गया. सारे पैसे फर्श पर फैल गए. वो मुझ पर लपका, उसकी बंदूक दूर गिर चुकी थी. मैंने उसके साथ संघर्ष किया.
तभी वहां से गुज़रती हुई एक महिला ने खिड़की से झांककर ये सब देख लिया.
इससे वो हमलावर डर गया और बंदूक उठाकर वहां से भाग खड़ा हुआ. भागते वक्त उसने मुझे चेतावनी दी कि वो वापस लौटेगा और मुझे देख लेगा.
मैं जानता हूं कि किसी के भी साथ ऐसी ख़तरनाक स्थिति होने पर वो घबरा सकता है. उसे समझ नहीं आएगा कि वो क्या करे. मुझे खुशी है कि मैं उस स्थिति में लड़ा. मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था.
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'हम लड़े, और फिर भाग गए'
टीना रिंग, 53, ओकलाहोमा
इसी हफ्ते जब मेरे लिकर स्टोर को 10 साल पूरे हुए, एक बंदूकधारी हमारे स्टोर में घुस आया. उस वक़्त मैं और मेरी 30 वर्षीय बेटी एश्ले ली काम कर रहे थे.
उसने हमसे पैसों की मांग की. ऐसा पहले मेरे साथ कभी नहीं हुआ था. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं.
मैंने अपनी बेटी से कहा कि दराज से पैसे निकालकर उसे दे दे. उसने सारे पैसे ले लिए और दरवाज़े की ओर बढ़ने लगा.
वो वापस मुड़कर काउंटर की ओर बढ़ा. हम काउंटर के पीछे छुप गए और वहां रखी दो बंदूकें उठा लीं.
मुझे अपनी बेटी की चिंता हो रही थी और अपनी जान की भी. मैं भूल चुकी थी कि बंदूक का ट्रिगर कैसे दबाया जाता है, लेकिन मैंने फिर भी दबा दिया.
उसने मुझे पकड़ लिया. उसका चेहरा देखकर मुझे याद आया कि ये तो ग्राहक बनकर एक घंटे पहले ही स्टोर में आया था.
मैंने और मेरी बेटी ने उस पर गोली चला दी. लेकिन उसे लगी नहीं. हम लड़े और फिर वहां से भाग निकले.
मैं उसे नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती थी. मैं बस चाहती थी कि वो मेरी बेटी को नुकसान ना पहुंचाए.
आपको सच में पता नहीं होता कि जब आपके साथ कुछ ऐसा होगा तो आप किस तरह से रिएक्ट करेंगे.
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'मैं हिल नहीं पा रहा था, मैं सन्न रह गया'
लेन पेंज़ों, 54, कैलिफोर्निया
मैं 16 साल की उम्र में एक स्थानीय सुपर मार्केट में काम करता था.
वो हफ्ते का आखिरी दिन था. सुपर मार्केट में कई लोग थे.
मैं एक ग्राहक को सामान दे रहा था. तभी सुपरमार्केट के दरवाज़े पर एक कार तेज़ी से आकर रुकी.
उसमें से तीन नकाबपोश भागते हुए अंदर घुसे और चिलाए कि 'कोई भी हिलेगा नहीं! सब हाथ ऊपर कर लो'
चिल्लाते हुए एक बंदूकधारी ने चेकआउट लाइन पर खड़े लोगों की ओर बंदूक लहराई. मुझे भरोसा नहीं हो रहा था कि ये सब सच में हो रहा है.
तीसरा हमलावर बंदूक के साथ मेरी ओर आया. उसने मुझे ज़मीन पर लेट जाने को कहा ताकि वो सारे पैसे निकाल सके.
मैं डर के मारे हिल नहीं पा रहा था. मेरे पैर काम नहीं कर रहे थे.
वो फिर चिल्लाया, "मैंने कहा ज़मीन पर लेटो!"
उसने झल्लाकर मुझे मुंह के बल ज़मीन पर गिरा दिया. उसने बंदूक की नोक मेरे सिर पर रख दी. उसने कहा कि अगर मैं हिला तो वो मेरा सिर उड़ा देगा.
मुझे लगा अब मैं नहीं बचूंगा. मैं बेबस महसूस कर रहा था.
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मैं सोच रहा था कि वो बंदूक का ट्रिगर दबा देगा तो मुझे कैसा महसूस होगा. मैं अपने मां-बाप, बहन और भगवान को याद कर रहा था.
तभी लुटेरों ने अपना काम ख़त्म किया और दरवाज़े से निकलकर वहां से चले गए.
आज भी मैं उस दिन के बारे में सोचता हूं तो मुझे लगता है कि वो डर ही था जिसकी वजह से मैं हिल तक नहीं पाया.
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