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एशिया के छोटे से देश से 11 साल तक लड़ा अमेरिका और मारे गए उसके 56 हजार सैनिक

वाशिंगटन, 01 सितंबर। हार और शर्मिंदगी के बाद अमेरिका ने आखिरकार अफगानिस्तान से बोरिया बिस्तर समेट लिया। इसके पहले अमेरिका की वियतनाम में मिट्टीपलीद हुई थी। वियतनाम की हार अमेरिकी प्रभुत्व पर एक बदनुमा दाग है। ये ऐसा दाग है जो कभी मिट नहीं सकता।

story of America fought with Vietnam for 11 years and lost its 56 thousand soldiers in war

अफगानिस्तान में तो अमेरिका ने थोड़ा बहुत अपना जलवा दिखाया भी लेकिन वियतनाम में तो उसे करारी हार झेलनी पड़ी थी। एटम बम वाले अमेरिका को एशिया के एक छोटे से देश वियतनाम ने हरा दिया था। अमेरिकी इतिहास की ये सबसे शर्मनाक हार है।

वियतनाम संकट

वियतनाम संकट

वियतनाम दक्षिण पूर्व एशिया में अवस्थित है। इसके पूर्व में दक्षिण चीन सागर और उत्तर में चीन है। 1954 की जिनेवा संधि के बाद वियतनाम का विभाजन हो गया। उत्तर वियतनाम (वियतमिन्ह) में कम्युनिस्ट सरकार बनी जिसे सोवियत संघ और चीन का समर्थन हसिल था। दक्षिण वियतनाम में अमेरिका समर्थक सरकार सत्ता में आयी। लेकिन इस विभाजन का कोई फायदा नहीं हुआ। गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो गयी। उत्तर वियतनम की कम्युनिस्ट सरकार ने सोवियत संघ और चीन के सहयोग से अपनी सेना को मजबूत बनने की मुहिम शुरू की। इसके बाद उत्तर वियतनाम के कम्युनिस्ट छापामारों ने दक्षिण वियतनाम में गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिय। दक्षिण वियतनाम में हिंसा और अशांति फैलने लगी। वह परेशान हो गया। 1961 के आते आते दोनों देशों में औपचारिक लड़ाई शुरू हो गयी। उस समय जॉन एफ कैनेडी अमेरिका के राष्ट्रपति थे। वे दक्षिण वियतनाम के समर्थन में उत्तर वियतनाम के खिलाफ आक्रामक नीति अपनाने के हिमायती थे। जब हालात बेकाबू हो गये तो दक्षिण वियतनाम ने अमेरिका से मदद मांगी। तब अमेरिका ने 1962 में वहां एक सैनिक कमांड स्थापित किया और चार हजार सैनिक दक्षिण वियतनाम में उतार दिये। 1963 में कैनेडी की हत्या हो गयी तो लिंडन बी जॉनसन अमेरिका के राष्ट्रपति बने। वे उत्तर वियतनाम को ताकत के बल पर कुचलना चाहते थे। अमेरिका ने 1965 से उत्तर वियतनाम पर हवाई हमले शुरू कर दिये। इसके बाद अमेरिका की उत्तर वियतनाम से सीधी जंग शुरू हो गयी। सोवियत संघ और चीन ने वियतनाम में अमेरिकी सैनिक हस्तक्षेप का विरोध किया।

अमेरिका ने गिराया नापलम बम

अमेरिका ने गिराया नापलम बम

अमेरिका ने उत्तर वियतनाम को हराने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। उसने जंग जीतने के लिए नापलम बम का इस्तेमाल शुरू किया। इस बम से जहरीली गैस निकलती थी। हजारों कम्युनिस्ट लड़ाके मारे गये। लाखों बीमार हो गये। लेकिन अमेरिका की सारी कोशिश बेकार चली गयी। अमेरिकी बमबारी का उल्टा असर पड़ा। कम्युनिस्ट और संगठित हो गये और पूरी हिम्मत के साथ अमेरिका के खिलाफ लड़ने लगे। 1968 तक अमेरिका के हजारों सैनिक मारे गये। कई लड़ाकू विमान नष्ट हो गये। लेकिन वह उत्तर वियतनाम को हरा नहीं पा रहा था। सोवियत संघ और चीन उसकी मदद कर रहे थे। तीन साल से लगातार युद्धरत रहने से अमेरिका अर्थव्यस्था पर बुरा असर पड़ रहा था। स्थिति इतनी खराब हो गयी कि डॉलर जैसी मजबूत मुद्रा का अवमूल्यन होने लगा। अमेरिका के मित्र देशों ने भी उसे युद्धविराम के लिए समझाया लेकिन राष्ट्रपति जॉनसन अपनी जिद पर अड़े रहे। वे दक्षिण पूर्व एशिया में चीन के विस्तार को हर हाल में रोकना चाहते थे और इसके लिए कोई कीमत चुकाने का तैयार थे। इसके चलते अमेरिका में जॉनसन का विरोध बढ़ने लगा।

5 लाख अमेरिकी सैनिक फिर भी हार

5 लाख अमेरिकी सैनिक फिर भी हार

1967 में जब युद्ध चरम पर था तब अमेरिका के लगभग दो सौ विमान दो महीने तक रोज उत्तरी वियतनाम में घातक बम गिराते रहे। उत्तर वियतनाम तबाह हो गया लेकिन वह अमेरिका को मुंहतोड़ जवाब देता रहा। इस युद्ध में अमेरिका के करीब एक हजार विमान नष्ट हुए थे। इस हार से तिलमिलाये अमेरिका ने परमाणु हमला करने की सोचने लगा थ। लेकिन उसके सामने सोवियत संघ और चीन भी खड़े थे। दक्षिण वियतनाम में अमेरिका के 5 लाख सैनिक थे तब भी वह जंग नहीं जीत पा रहा था। जब अमेरिका में आर्थिक संकट बढ़ गया और सरकार के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट पड़ा तो जॉनसन बैकफुट पर आ गये। कुछ समय के लिए लड़ाई ढीली पड़ गयी। 1968 के चुनाव में रिचर्ड निक्सन राष्ट्रपति चुने गये। निक्सन के कार्यकाल में शांति समझौता की कोशिश हुई। लेकिन कोई हल नहीं निकल। 1970 में अमेरिका ने उत्तर वियतनाम पर फिर बम बरसाने शुरू कर दिये। लेकिन नतीजा कुछ न निकला।

56 हजार अमेरिकी सैनिक मारे गये, मिला क्या ?

56 हजार अमेरिकी सैनिक मारे गये, मिला क्या ?

इस लड़ाई में अमेरिका का घोर अपमान हुआ। उसके करीब 56 हजार सैनिक मारे गये। करीब एक लाख करोड़ रुपये खर्च हुए। 11 साल लड़ाई लड़ने के बाद भी अमेरिका को कुछ हासिल न हुआ। 1972 में उसे समझौते के लिए राजी होना पड़ा। अमेरिका दक्षिण वियतनाम से सैनिक हटाने के लिए राजी हो गया। यह अमेरिका की नौतिक और सैनिक हार थी। 1972 में जैसे ही अमेरिकी सैनिक हटे दो साल बाद ही उत्तर वियतनाम ने दक्षिण वियतनाम को हरा कर उस पर कब्जा कर लिया। इस तरह 1975 में वियतनाम की समस्या का अंत हो गया। लेकिन तब तक अमेरिका के माथे पर कलंक क टीका लग चुका था।

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