Sri Lanka Protest: नेपाल के बाद सुलग रहा श्रीलंका, Gen-Z नहीं साधु उतरे सरकार के खिलाफ, फिर होगा तख्तापलट?
Sri Lanka Protest: श्रीलंका की राजधानी में बौद्ध भिक्षुओं ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उनका कहना है कि देश के बहुसंख्यक धर्म 'बौद्ध धर्म' और भिक्षुओं को बदनाम करने के लिए एक संगठित अभियान चलाया जा रहा है। भिक्षुओं का आरोप है कि यह सिर्फ सामान्य आलोचना नहीं है, बल्कि प्लानिंग के साथ किया जा रहा प्रयास है, जिससे बौद्ध धर्म की छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके।
सरकार को दिया अल्टीमेटम
अपनी बरत रखते हुए भिक्षुओं ने 10-सूत्रीय मांग जारी किया है। उनका कहना है कि बौद्ध धर्म की प्रतिष्ठा को 'राजनीतिक रूप से कमजोर' किया जा रहा है और इस पर सरकार को तुरंत ध्यान देना चाहिए। उनका मानना है कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए तो हालात सरकार की हद से बाहर सकते हैं।

क्या है मामला?
भिक्षुओं का दावा है कि निहित स्वार्थों द्वारा संगठित सोशल मीडिया अभियान चलाए जा रहे हैं, जिनका मकसद बौद्ध धर्म और भिक्षुओं को बदनाम करना है। इस पर एक अन्य प्रमुख भिक्षु वेन कोट्टापोला रत्नपाला ने सरकार से इसे रोकने का आग्रह किया है। पिछले एक साल में कुछ राजनेताओं द्वारा खुले तौर पर बौद्ध भिक्षुओं की आलोचना भी की गई है, जिससे तनाव और बढ़ गया है।
बौद्ध भिक्षुओं की गिरफ्तारियां और विवाद
पूर्वी त्रिंकोमाली जिले में तटीय संरक्षण नियमों का उल्लंघन कर अस्थायी पूजा स्थल बनाने के आरोप में कई भिक्षुओं को गिरफ्तार किया गया। भिक्षुओं का आरोप है कि इन गिरफ्तारियों के पीछे स्थानीय सत्ताधारी दल के नेता थे। इस घटना ने भी भिक्षुओं और सरकार के बीच टकराव को और तेज कर दिया है।
संविधान का अनुच्छेद 9 क्या कहता है?
श्रीलंका के संविधान के अनुच्छेद 9 के तहत, राज्य प्रमुख और सरकार पर यह जिम्मेदारी है कि वे देश की 74% आबादी के धर्म-बौद्ध धर्म-को विशेष रूप से बढ़ावा दें। साथ ही, अन्य धर्मों के अधिकारों की भी रक्षा करना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि लगभग 2.2 करोड़ की आबादी वाले इस देश में 70% से अधिक लोग बौद्ध हैं। संविधान बौद्ध धर्म को राजधर्म घोषित करता है, लेकिन साथ ही कानून धार्मिक स्वतंत्रता की भी गारंटी देता है।
राष्ट्रपति और भिक्षुओं के बीच बातचीत
प्रमुख भिक्षु मुरुत्थेत्तूवे आनंदा ने बताया कि राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने उनसे प्रांतों के भिक्षुओं की एक बैठक रोकने का आग्रह किया था। आनंदा के मुताबिक, 'उन्होंने मुझे बातचीत के लिए अपने पास बुलाया और इस बैठक को रोकने के लिए कहा था।' यह बयान बताता है कि सरकार और धार्मिक नेताओं के बीच सीधे संवाद भी चल रहे हैं, लेकिन मतभेद अभी भी बने हुए हैं।
राजधानी में सैकड़ों भिक्षुओं का शांतिपूर्ण प्रदर्शन
20 फरवरी को राजधानी कोलंबो में सैकड़ों बौद्ध भिक्षुओं ने प्रदर्शन किया। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि उनके धर्म का अनादर किया जा रहा है और राज्य के मामलों में उनसे परामर्श की पुरानी परंपरा को नजरअंदाज किया जा रहा है। यह विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ। हालांकि, ये प्रोटेस्ट उस स्तर का नहीं है जितना कि 2022 में आर्थिक संकट के दौरान था, जिसने राजपक्षे की सरकार गिरा दी थी।
सरकार से क्या चाहते हैं बौद्ध भिक्षु?
कोलंबो में भिक्षुओं ने राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके को एक अपील ज्ञापन पढ़कर सुनाया। इसमें सरकार से आग्रह किया गया कि वह अपने मूल्यों को बौद्ध धर्म के सिद्धांतों पर आधारित करे। ज्ञापन में यह भी कहा गया कि राज्य के मामलों में धर्मगुरुओं के परामर्श अधिकार को मान्यता दी जाए।
गैर-बौद्धों को शीर्ष पदों से बाहर रखने की मांग
इस ज्ञापन में कुछ विवादास्पद मांगें भी शामिल थीं। इसमें गैर-बौद्धों को श्रीलंका के शीर्ष पदों से बाहर रखने की बात कही गई है। साथ ही, स्कूलों और शिक्षा प्रणाली में बौद्ध मूल्यों को शामिल करने और धर्म से जुड़े पुरातात्विक स्थलों की रक्षा करने की मांग की गई है। यह कदम भिक्षुओं द्वारा सरकार पर दबाव बनाने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
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