SCO Summit Explained: एससीओ में भारत को शामिल करवाने के लिए क्यों की थी जोरदार पैरवी? पूर्व राजदूत से जानिए
SCO Summit Explained: भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर 15-16 अक्टूबर को शंघाई सहयोग संगठन (SCO Summit) के शासनाध्यक्षों (HoG) की बैठक के लिए इस्लामाबाद मे हैं और दिसंबर 2015 में सुषमा स्वराज के बाद किसी भारतीय विदेश मंत्री की यह पहली पाकिस्तान यात्रा है।
एससीओ की स्थापना 15 जून 2001 को 1996 में गठित पुराने शंघाई फाइव समूह - चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान - और उज्बेकिस्तान के सदस्यों की तरफ की गई थी। भारत और पाकिस्तान 2017 में पूर्ण सदस्य बन गए, ईरान पिछले साल और बेलारूस इस साल इसमें शामिल हुआ है।

10 सदस्यीय एससीओ समूह भौगोलिक क्षेत्र और जनसंख्या के हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन है, जिसके केंद्र में पश्चिम विरोधी सहयोगी चीन और रूस हैं।
कजाकिस्तान, स्वीडन और लातविया में भारत के पूर्व राजदूत अशोक सज्जनहार बता रहे हैं, कि एससीओ भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है, और पाकिस्तान में होने वाले शिखर सम्मेलन से क्या उम्मीद की जा सकती है?
भारत के लिए एससीओ क्यों महत्वपूर्ण है?
मध्य एशियाई देश कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और किर्गिस्तान भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। यह क्षेत्र भारत के विस्तारित पड़ोस का हिस्सा है और भारत के इस क्षेत्र के साथ मजबूत सभ्यतागत और सांस्कृतिक संबंध हैं, जो सम्राट अशोक के समय से चले आ रहे हैं। एससीओ एक ऐसा मंच प्रदान करता है, जहां नई दिल्ली सरकार के कई स्तरों पर इन सभी देशों के साथ बातचीत कर सकती है।
भारत के इस क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण हित हैं, जैसे सुरक्षा, ऊर्जा और कनेक्टिविटी की जरूरतों के लिए और व्यापार और निवेश के लिए ये क्षेत्र काफी अहम हो जाता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 85% आयात करता है और तुर्कमेनिस्तान में प्राकृतिक गैस का दुनिया का चौथा सबसे बड़ा भंडार है। कजाकिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम अयस्क उत्पादक है। भारत कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास भी करता है।
चीन और पाकिस्तान भी हैं एससीओ के सदस्य, तो भारत इससे क्या उम्मीदें कर सकता है?
भारत के एससीओ का हिस्सा बनने से पहले, कई लोगों ने पूछा था कि क्या चीन के प्रभुत्व वाले गठबंधन में शामिल होने से हमें कोई लाभ होगा? अशोक सज्जनहर ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा है, कि "कजाकिस्तान में राजदूत के रूप में (2007 से 2010 तक), मैंने भारत के एससीओ में शामिल होने की जोरदार वकालत की थी।"
उन्होंने कहा, कि "मेरा कहना था, कि हमें वहां सिर्फ इसलिए होना चाहिए, क्योंकि चीन वहां है। मध्य एशियाई क्षेत्र भारत के लिए महत्वपूर्ण है, और अगर कोई ऐसा मंच है जहां चीन सक्रिय रूप से उनके साथ जुड़ रहा है, तो भारत को भी वहां मौजूद होना चाहिए। भारत को चीन का सामना करने की स्थिति में होना चाहिए, न कि खुद को पीछे हटाना चाहिए।"
चीन फैक्टर के साथ भी, एससीओ हमारे लिए व्यापार और कनेक्टिविटी के मामले में बहुत कुछ फायदा पहुंचाता है, लेकिन सुरक्षा के मामले में भी ये उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत एससीओ के क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी ढांचे (RATS) का हिस्सा है, जो हमारे सुरक्षा गणित में महत्वपूर्ण है।
पाकिस्तान में हाल ही में चीनी नागरिकों पर आतंकवादी हमले हुए हैं। क्या आतंकवाद का मुद्दा चर्चा में प्रमुखता से उठेगा?
आतंकवाद हमेशा से एससीओ का मुख्य फोकस क्षेत्र रहा है। आरएटीएस बैठकें करता है और सूचनाओं का आदान-प्रदान करता है। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, साझा की गई सूचनाओं के परिणामस्वरूप एससीओ के देश लगभग 500 आतंकवादी अभियानों का मुकाबला करने में कामयाब हुए हैं।
भारत के अलावा अन्य देश भी आतंकवाद से पीड़ित हैं। रूस में मार्च में एक बड़ा आतंकी हमला हुआ था। अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद, मध्य एशियाई देशों को डर है, कि विभिन्न आतंकवादी समूह उनके क्षेत्रों में फैलना शुरू कर देंगे।

आज बैठक में किन प्रमुख मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है?
एससीओ ग्रुप में ईरान और बेलारूस भी सदस्य हैं, लिहाजा ये दोनों ही देश दुनिया में इस वक्त चल रहे दो युद्ध, इजराइल-हमास युद्ध और रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए काफी अहम हो जाते हैं। बेलारूस, रूस का कट्टर दोस्त है, जबकि हमसा और हिज्बुल्लाह, ईरान के प्रॉक्सी हैं, लिहाजा इन दोनों ही युद्ध पर इस बैठक में चर्चा हो सकती है।
इसके अलावा, आतंकवाद भी निश्चित तौर पर एससीओ शिखर सम्मेलन पर चर्चा की जाएगी।
पिछले साल, जब भारत ने एससीओ की अध्यक्षता की थी, तो विभिन्न सदस्यों को एकजुट करने के लिए कई सकारात्मक पहल की गई थी, जैसे कि पारंपरिक दवाओं पर ध्यान केंद्रित करना, बाजरा के उपयोग पर, स्टार्टअप पर, बौद्ध विरासत पर भारत का फोकस था। लिहाजा, इस साल भारत को उम्मीद होगी, कि इनमें से कुछ पहलों को आगे बढ़ाया जाए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एससीओ से संपर्क करने के तरीके के लिए एक संक्षिप्त नाम गढ़ा था। यह था "सिक्योर" जिसमें S का मतलब सुरक्षा, E का मतलब आर्थिक विकास, C का मतलब कनेक्टिविटी, U का मतलब एकता, R का मतलब क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के लिए सम्मान और दूसरा E का मतलब पर्यावरण संरक्षण है।
एक और पहलू है, जिस पर भारत ने G-20 में भी चर्चा की थी, वह है डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर। भारत वैश्विक भलाई के रूप में अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण पर अपने अनुभव को साझा करने के लिए बहुत इच्छुक रहा है, और इसकी पूरी संभावना है, कि भारत एससीओ की इस बैठक में भी ऐसा करेगा।
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