कहां ग़ायब हो जाते हैं सऊदी अरब के आलोचक

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जमाल ख़ाशोज्जी इस्तांबुल में सऊदी कंसुलेट में दाख़िल हुए और दोबारा कभी नहीं देखे गए.

अब सऊदी अरब मानता है कि उनकी हत्या हुई है.

इस्तांबुल में जमाल के दोस्तों से बीबीसी ने बात की. उन्होंने बताया कि मौत से पहले के कई महीनों तक ख़ाशोज्जी को लगता था कि सऊदी सरकार उनपर नज़र रख रही है.

वही सरकार जिसके बारे में अकसर अपने आलोचकों को ग़ायब करने की ख़बरें आती रहती हैं.

अब लगता है कि जमाल ख़ाशोज्जी के पास डरने की बहुत सारी वजहें थीं.

जमाल ख़ाशोज्जी के एक दोस्त ने नए सऊदी युवराज के बारे हमें ये बताया , "अपराध रोकने वाले मंत्री की बजाय, आप क्राइम के चीफ़ बन गए हैं."

सऊदी शाही ख़ानदान

पिछले साल बीबीसी की अरबी सेवा ने महीनों की मेहनत के बाद एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी जिसमें विदेश में रह रहे तीन सऊदी राजकुमारों को अग़वा करने के बारे में आरोप शामिल थे.

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ये तीनों सऊदी सरकार के आलोचक थे.

इन तीन के अलावा इस डॉक्यूमेंट्री में ख़ालिद बिन फ़रहान भी थे जो सऊदी शाही ख़ानदान के आलोचक थे.

बीबीसी से बात के बाद उन्होंने जर्मनी में शरण ले ली थी.

तब ख़ालिद बिन फ़रहान ने बीबीसी को बताया था, "यूरोप में हम चार राजकुमार थे जो शाही ख़ानदान के आलोचना करते थे. तीन को अग़वा कर लिया गया है. सिर्फ़ मैं बचा हूं."



पेरिस से काहिरा

इन्हीं में से प्रिंस तुर्की बिन सुल्तान पेरिस से काहिरा ले जाने के लिए एक प्राइवेट जेट मुहैया करवाया गया था. उस प्राइवेट जेट पर सवार स्टाफ़ से हमें पता चला कि विमान काहिरा की बजाय रियाद चला गया था.

उन तीनों राजकुमारों के बारे अब कोई जानकारी नहीं है. सऊदी सरकार उन पर कोई बयान नहीं देती. जमाल ख़ाशोज्जी के ग़ायब होने के बाद, बीबीसी ने एक बार फिर प्रिंस ख़ालिद से संपर्क किया.

ख़ालिद बिन फ़रहान ने बीबीसी को बताया, "सऊदी सिस्टम अब और भी तानाशाह हो गया है और अब वहां ख़ूब गिरफ़्तारियां होती हैं."

"जिन लोगों के मुंह खोलने का डर है, उनमें से 99 फ़ीसदी लोगों को जेल में डाल दिया गया है. साथ ही विदेश में रह रहे विपक्षी नेताओं का पीछा करने की घटनाएं भी बढ़ी हैं."

किंगडम का बर्ताव

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पिछले साल जमाल ख़ाशोज्जी ने सऊदी अरब छोड़, निर्वासन की ज़िंदगी चुनी.

ग़ायब होने से पहले जमाल इस्तांबुल में अपनी मंगेतर के साथ शादी की तैयारियों में जुटे थे.

बीबीसी टीम इयाद अल-हाजी से मिलने पुहंची. इयाद एक फ़िल्म मेकर हैं जो जमाल ख़ाशोज्जी के साथ एक डॉक्युमेंट्री बना रहे थे.

इयाद अल-हाजी ने बताया, "जमाल ख़ाशोज्जी ने मुझे कई बार बताया था कि वो सऊदी किंग और क्राउन प्रिंस के प्रति वफ़ादार हैं."

"लेकिन... उसके शब्द थे.... किंगडम मेरे साथ ऐसे बर्ताव करता है जैसे कि मैं किंग को गोली मारकर फ़रार हो गया हूं."

बोलने की आज़ादी

पिछले साल जमाल ख़ाशोज्जी ने वॉशिंगटन पोस्ट में कई लेख लिखे.

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इन लेखों में प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान द्वारा की गई अपने आलोचकों की गिरफ़्तारियों पर टिप्पणियां थीं.

जमाल ख़ाशोज्जी के पत्रकार दोस्त अज़्ज़ाम तामिमी कहते हैं, "उन्होंने कभी ये दावा नहीं किया कि वो शाही ख़ानदान का विरोधी हैं. वो तख़्ता पलट भी नहीं चाहते थे."

"उन्हें सऊदी अरब में इंकलाब भी नहीं लाना था. वो सिर्फ़ इतना चाहते थे कि दुनिया प्रिंस सलमान पर दवाब डाले कि वो अपनी नीतियों पर लगाम लगाएं."

ग़ायब होने के बाद वॉशिंगटन पोस्ट में छपे उनके लेख में जमाल ख़ाशोज्जी ने अरब जगत में बोलने की आज़ादी की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था.

एक ऐसे मुल्क में जहां शाही ख़ानदान के लोग भी ग़ायब होते रहे हैं, जमाल ख़ाशोज्जी ने आज़ादी के लिए एक बड़ी क़ीमत चुकाई है.


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