यूक्रेन युद्ध खत्म करवाने में नाकाम हुआ सऊदी अरब, प्रिंस सलमान का 'शांति दूत' बनने का सपना टूटा

Saudi Arab Ukraine Peace Talk: यूक्रेन युद्ध को खत्म करवाकर वैश्विक नेता बनने की चाहत पालने वाले प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का सपना टूट गया है और सऊदी अरब प्रायोजित "शांति वार्ता" कुछ भी हासिल करने में नाकाम साबित हो गई है।

यूक्रेन चाह रहा था, कि दुनिया के 'तटस्थ' देश उसकी नीतियों का समर्थ करे और सऊदी के जेद्दा शहर में आयोजित शांति वार्ता में उसके पक्ष में फैसला आए, ताकि रूस के खिलाफ एक माहौल बनाया जा सके। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और जेद्दा से यूक्रेन को निराश होकर लौटना पड़ा। वहीं, सऊदी अरब का ये भव्य आयोजन, सिर्फ एक आम शो बनकर रह गया।

Saudi Arab Ukraine Peace Talk

सबसे हैरान करने वाली बात ये थी, कि सऊदी अरब ने इस 'शाति शिखर सम्मेलन' में रूस को न्योता नहीं भेजा था और अगर रूस को आमंत्रित किया जाता, तो यूक्रेन ने नहीं आने की शर्त रख दी थी, लिहाजा इस शांति सम्मेलन के पहले ही फेल होने की भविष्यवाणी रूस की तरफ से कर दी गई थी। सऊदी ने इस शांति सम्मेलन में 40 देशों को आमंत्रित किया था और सभी देशों के प्रतिनिधि पहुंचे भी थे, लेकिन आम सहमति नहीं बनने की वजह से "शांति सम्मेलन" अपनी कथित उपलब्धियों पर कोई बयान दिए बिना या आगे बढ़ने के लिए किसी घोषणा के बिना समाप्त हो गया।

नाकाम हो गया शांति सम्मेलन

शांति सम्मेलन में ब्राज़ील, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका ने भाग लिया, जिसमें ईरान को भी शामिल किया गया था। बैठक में चीन ने कहा, कि सम्मेलन उपयोगी था और उसे भविष्य में एक और सम्मेलन देखने की उम्मीद है। चीन, यूक्रेन-रूस विवाद में मध्यस्थ की भूमिका में रहा है, लेकिन उसे भी कामयाबी नहीं मिल पाई है।

चीन को एक स्विंग देश के रूप में माना जा सकता है, यदि रूस के बिना आम सहमति से शांति समझौता किया जाता। लेकिन, चीन इस कोशिश में शामिर रहा है, कि अमेरिका रूस के खिलाफ और ज्यादा प्रतिबंध नहीं लगा पाए।

चीन की अर्थव्यवस्था वर्तमान में गंभीर संकट में है, और चीन के शीर्ष नेतृत्व में राष्ट्रपति शी जिनपिंग फिलहाल शुद्धिकरण अभियान चला रहे हैं, और इसी के तहत विदेश मंत्री किन गैंग को पद से हटाया गया और शी जिनपिंग ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के रॉकेट फोर्स के प्रमुख को भी बर्खास्त कर दिया। ये घटनाएं बता रही हैं, कि शी जिनपिंग के खिलाफ पार्टी के अंदर आक्रामक अभियान चलाया जा रहा है और वो बचने के लिए आक्रामक फैसले ले रहे हैं।

वही, चीन की अर्थव्यवस्था का लगातार पतन हो रहा है और एक के बाद एक लगातार विदेशी निवेशक चीन से या तो अपना निवेश निकालने में लगे हैं, या चीन से संबंध तोड़ते जा रहे हैं। लिहाजा, शी जिनपिंग का भविष्य अनिश्चित है और लड़खड़ाती चीनी कम्युनिस्ट शासन पर काले बादल मंडरा रहे हैं।

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शांति वार्ता क्यों हो रहे हैं नाकाम?

यूक्रेन पर रूसी आक्रमण से पहले से ही, अमेरिका ने यूक्रेन पर रूस के साथ किसी भी बातचीत का लगातार विरोध किया है।

किसी भी शांति सौदे पर अमेरिकी आपत्तियों की वजह से फ्रांस, जर्मनी, तुर्की और इज़राइल के प्रयासों पर भी पानी फिर चुका है। अमेरिकी नीति, जहां तक यह उसके कार्यों से निर्धारित की जा सकती है, यूक्रेन को रूस के खिलाफ युद्ध जीतने में मदद करना है, जबकि अमेरिका ने रूस में शासन परिवर्तन को भड़काने की पूरी कोशिश की है।

एक्सपर्ट्स का कहना है, कि यूक्रेन के कंधे पर बंदूक रखकर अमेरिका चला रहा है और वो यूक्रेन को मोहरा बनाकर रूस के खिलाफ दशकों की दुश्मनी को निकाल रहा है और अमेरिका की वजह से ही, जेलेस्की किसी भी समझौते को मानने को तैयार नहीं हैं।

लिहाजा, दो बातें अब पूरी तरह से साफ हैं। पहली बात ये, कि रूस में पुतिन सरकार को उखाड़ फेंकने की अमेरिका की कोशिश नाकाम रही है और आगे भी नाकाम ही रहने की संभावना है। दूसरी बात ये, कि पूर्वी और दक्षिणी यूक्रेन में रूसी सेनाओं के खिलाफ यूक्रेनी जवाबी हमला, एक महंगी नाकामी साबित हुई है, और उस नाकामी का नाटो पर गहरा प्रभाव पड़ा है।

यूक्रेन के सैनिकों को ट्रेनिंग देने से लेकर भारी हथियारों की आपूर्ति तक, अमेरिका ने अपनी पूरी ताकत यूक्रेन को जिताने में झोंक दी है। अब कुछ ही ऐसे हथियार हैं, जिसे अमेरिका ने यूक्रेन को नहीं दिए हैं। इसके अलावा, अमेरिका ने युद्ध में रूसी सैनिकों की रीयल टाइम जानकारियां, नेविगेशन और कम्युनिकेशन मदद भी यूक्रेन को दी है, लेकिन रूस को हराने में यूक्रेन नाकाम ही रहा है।

अमेरिका की इन्हीं कोशिशों का नतीजा है, कि रूस ने परमाणु हथियारों की तैनाती तक कर दी है और दुनिया परमाणु लड़ाई की आशंकाओं में घिरा हुआ है। इसके अलावा, यूरोप को इस युद्ध से बहुत बड़ा नुकसान हुआ है और यूरोपीय देशों को काफी ज्यादा कीमत चुकाकर ऊर्जा खरीदना पड़ रहा है। नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन को अमेरिका के ही कहने पर यूक्रेन ने उड़ा दिया था, जिससे जर्मनी तक रूसी गैस और तेल की आपूर्ति बंद हो चुकी है।

लिहाजा, निकट भविष्य में किसी भी मोड़ पर यूरोपीय देश यूक्रेन को समर्थन देने से पीछे हट जाएगे। लिहाजा, यूक्रेन को उसी प्वाइंट से अरबों डॉलर की मदद और सैन्य उपकरण मिलने बंद हो जाएंगे। युद्ध ने जर्मनी की कमर को तोड़ना शुरू कर दिया है और अमेरिका की धमकियों की वजह से अभी भी जर्मनी इस युद्ध को समर्थन दे रहा है, लेकिन अमेरिका के लिए फ्रांस को धमकाना संभव नहीं है। वहीं, डराने-धमकाने की भी अपनी सीमाएं होती हैं।

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प्रिंस सलमान का प्लान नाकाम

इन सबके बीच प्रिंस सलमान युद्ध को खत्म करवाकर 'चौधरी' बनने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन शिखर सम्मेलन में वो औंधे मुंह गिरे हैं। इस्लामिक देशों में अपना वर्चस्व बनाने के लिए प्रिंस सलमान ने इस वार्ता का आयोजन करवाया था, लेकिन उनका सपना टूट गया है।

प्रिंस सलमान, इस शांति सम्मेलन के लिए अमेरिका को भी एक संदेश देना चाह रहे थे, कि उन्होंने 40 देशों को एक मंच पर बुला लिया है, लेकिन यूक्रेन की इस शर्त के साथ, कि 'रूस को बुलाने पर वो नहीं आएगा', प्रिंस सलमान को समझ जाना चाहिए था, कि इस शिखर सम्मेलन से यूक्रेन को शांति से कोई मतलब नहीं है, बल्कि वो सिर्फ अपना शक्ति प्रदर्शन करना चाहता है और वो दिखाना चाहता है, कि वो अपने 10 सूत्रीय शांति फॉर्मूले से पीछे नहीं हटेगा, जिसे रूस खारिज कर चुका है।

यानि, जियो-पॉलिटिकल रस्साकसी और जेलेंस्की की जिद की वजह से ये युद्ध कब खत्म होगा, फिलहाल ये कोई नहीं जानता है, लेकिन प्रिंस सलमान के हाथों में निराशा के अलावा कुछ और नहीं लगा है।

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