सद्दाम हुसैन की तरह ही होगा पुतिन का अंत, एक जैसा होता घटनाक्रम
एक रक्षा विशेषज्ञ का कहना है, ब्लादिमिर पुतिन, सद्दाम हुसैन और एक हद तक हिटलर के रास्ते पर जा रहे हैं। तख्तापलट की घटना पर उनका अंध क्रोध ही उनके पतन का कारण बनेगा। जैसे कि आखिरी समय में सद्दाम और हिटलर बेबस हो गये थे और उनका परिस्थितियों पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया था वही हाल पुतिन का भी है। जब विद्रोही वैगनर आर्मी मास्को से केवल 120 मील दूर थी तब भयभीत पुतिन, येवगेनी प्रिगोजिन से समझौता करने के लिए मजबूर हो गये। इस समझौते के तहत वैगनर आर्मी और प्रिगोजिन को सैन्य विद्रोह के लिए माफी और प्रिगोजिन को बेलारूस जाने के लिए सेफ पैसेज दिया गया। अगर पुतिन का शासन और सेना पर पूरी तरह नियंत्रण होता तो प्रोगोजिन को इतनी आसानी से माफी नहीं मिलती। अगर पुतिन का वश चलता तो वह प्रिगोजिन को जरूर क्रूरतम सजा देते। वह इसलिए क्योंकि वे अपने विरोधियों के प्रति वे बहुत ही क्रूर और बर्बर हैं।
पुतिन के खोखलेपन से बदलेगी यूरोप की राजनीति
प्रिगोजिन के विद्रोह से भले पुतिन बच गये। लेकिन तख्तापलट की इस कोशिश से उनकी जो दुनिया भर में बदनामी हुई है उससे उनका गुस्सा सांतवें आसमान पर पहुंच गया है। इस गुस्से में वे कोई ऐसा कदम उठाएंगे जो उनके पतन का कारण बनेगा। किंग्स कॉलेज लंदन में डिफेंस स्टडी के शिक्षक डॉ. मिशेल ग्रोपी का कहना है, बेगनर आर्मी का विद्रोह न केवल रूस के लिए बल्कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के लिए बहुत बड़ी घटना थी। इस एक दिन के विद्रोह से ऐसा प्रतीत होने लगा था कि परमाणु शक्ति सम्पन्न रूस के राष्ट्रपति पुतिन का अब अंत होने वाला है। एक पल के लिए यह सुन कर विश्वास नहीं हुआ कि वह वैगनर आर्मी को माफी दे रहे हैं। पुतिन को इस विश्वसघात के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करनी चाहिए थी लेकिन उन्होंने नहीं की। इस घटना ने पुतिन के खोखलेपन को उजागर कर दिया। पुतिन और और उनके सैन्य कमांडरों की इस कमजोरी से यूरोप की की कूटनीति और राजनीति बदलने वाली है।

क्या हुआ था सद्दाम हुसैन के साथ
पुतिन 23 साल से रूस की सत्ता पर काबिज हैं और निरंकुश सत्ता के प्रतीक हैं। यूक्रेन युद्ध के कारण अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में उनकी छवि खलनायक की बन गयी है। पुतिन पर अपने विरोधियों की हत्या तक का आरोप लगा। क्रीमिया और चेचन्या में पुतिन ने अत्याचार किये। लेकिन सदैव शक्ति का प्रदर्शन करने वाले पुतिन अब लाचार दिख रहे हैं। वैसे जैसे कि निरंकुश सद्म हुसैसन अपने अंतिम दिनों में शक्तिविहीन हो गये थे। सद्दाम हुसैन ने भी इराक पर 24 साल तक शासन किया था। वह विस्तारवादी और क्रूर था। उसने कुवैत पर हमला कर दिया था। इराक-ईरान युद्ध के दौरान सद्दाम ने करीब दो लाख कुर्दों को मौत के घाट उतार दिया था।
अमेरिका का इराक पर हमला
सद्दाम हुसैन कुर्द मुसलमानों से नफरत करता था लेकिन उसने अपनी सेना में कुर्द लड़ाके भर्ती कर रखे थे। कहा जाता है कि इसमें से ही किसी ने उसके खिलाफ विश्वासघात कर दिया था जिससे उसका अंत हुआ था। 20 मार्च 2003 में अमेरिका और उसकी सहयोगी सेना ने इराक पर हमला कर दिया। ये आक्रमण सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल करने के लिए किया गया था। अमेरिका का आरोप था कि सद्दाम हुसैन ने रसायनिक हथियार विकसित कर अपने विरोधियों का नरसंहार किया है। अमेरिकी सेना के सामने सद्दाम के सैनिक टिक नहीं सके। अमेरिका ने केवल 21 दिनों में ही बगदाद पर कब्जा जमा लिया। 9 अप्रैल 2003 को सद्दाम के निरंकुश और अत्याचारी शासन का अंत हो गया। हार होते ही सद्दाम अपने विश्वस्त सैनिकों के साथ बगदाद से भाग गया।
हार के बाद बगदाद से भागे थे सद्दाम
सद्दाम हुसैन अपनी जान बचाने के लिए भागा भागा फिर रहा था। आठ महीने हो गये लेकिन अमेरिकी सेना को सद्दाम हुसैन का सुराग नहीं मिला रहा था। वह लगातार अपना ठिकाना बदल रहा था। इस साल जनवरी में न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में अमेरिका के पूर्व सैनिक अधिकारी जनरल सार्जेंट केविन हॉलैंड के हवाले से बताया गया था सद्दाम हुसैन आखिर कैसे पकड़ में आया था। अमेरिका की डेल्टा फोर्स सद्दाम हुसैन की टोह में लगी हुई थी। इस बीच एक व्यक्ति से गुप्त सूचना मिली की इराक का पूर्व राष्ट्रपति अभी एक गांव के बंकर में छिपा हुआ है। 7 दिसम्बर 2003 को अमेरिकी डेल्टा फोर्स ने सद्दाम को पकड़ने का अभियान शुरू किया। माना जाता है कि अमेरिकी सेना को ये जानकारी सद्दाम हुसैन के एक निकट सहयोगी ने दी थी। अमेरिकी सैनिक उस गांव में पहुंचे । सूचना के मुताबिक उस स्थान पर गये। वहां जाने पर पहले तो कुछ नजर नहीं आया। अचानक फोम के कुछ टुकड़े बिखरे नजर आये। इन्हें छिपाने के लिए सूखी पत्तियां और बालू डाल दिया गया था।
बंकर में छिपे मिले थे सद्दाम
जब पत्तियां और बालू को हटाया गया तो ईंट की एक परत दिखायी पड़ी और लगा के अंदर एक गड्ढा है जिसमें कोई छिपा हुआ है। अंदर से एक पाइप बाहर निकली हुई थी ताकि सांस लेने के लिए हवा जा सके। अमेरिकी सौनिकों ने गड्ढे के अंदर एक छोटा हथगोला फेंका। अंदर से अरबी में कुछ बोलने की आवाज आने लगी। यह सद्दाम हुसैन ही था। पहले उसने दोनों हाथ बाहर निकाले। फिर सिर निकाला। अमेरिकी सैनिकों ने बाल पकड़ कर सद्दाम को ऊपर खींच लिया। इसके पास ग्लॉक 18 बंदूक भी थी लेकिन अमेरिकी सैनिकों ने उसे दबोच कर छीन लिया।
विश्वासघात के कारण हुआ था सद्दाम का अंत
सद्दाम हुसैन को कब्जे में लेने के बाद अमेरिकी सैनिकों ने उसे इराक की अंतरिम सरकार को सौंप दिया था। इराकी सरकार ने सद्दाम पर हत्या और नरसंहार का मुदकमा चलाया जिसमें उसे फांसी की सजा सुनायी गयी। दिसम्बर 2006 में इसे फांसी पर लटका दिया गया। इस तरह एक निरंकुश और अत्यारी शासक का अंत हुआ। एक सहयोगी ने अगर सद्दाम हुसैन का ठिकाना नहीं बताया होता तो अमेरिकी सेना शायद ही उसे खोज पाती। जब किसी निरंकुश शासक का कोई नजदीकी विश्वसघात करता है तो उसका अंत सुनिश्चित हो जाता है। सद्दाम तो सत्ता गंवाने के बाद बंकर में छिपे थे लेकिन पुतिन ने तो केवल आक्रमण के डर से ही बंकर में शरण ले ली थी। प्रिगोजिन का खतरा तो टल गया लेकिन अगले धोखे से कैस बचेंगे ? यूक्रेन युद्ध के कारण पुतिन ने देश में और देश के बाहर कई दुश्मन बना लिये हैं।












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