यूरोप का डबल गेम देखिए, यूक्रेन युद्ध के बीच रूस को पहुंचाया दोगुना फायदा, भारत होता है निशाने पर

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर की रिपोर्ट से पता चलता है कि, एक तरफ यूरोपीय देश भारत की तरफ आंख तरेरते हैं, जबकि खुद लगातार रूस को लाभ पहुंचा रहे हैं।

नई दिल्ली, अप्रैल 29: जब भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में ब्रिटिश पत्रकारों को कहा, कि भारत रूस से एक महीने में जितना तेल खरीदता है, उतना यूरोप एक शाम में खरीद लेता है, तो ब्रिटिश पत्रकार बिलबिला उठे थे, लेकिन अब पता चला है कि, जब यूरोपीय देश लगातार भारत पर रूस से तेल नहीं खरीदने के लिए दवाब बना रहे थे, उस वक्त यूरोप ने रूस से 46 अरब डॉलर के तेल खरीद लिए हैं।

यूक्रेन युद्ध के बाद दोगुना खरीदा तेल

यूक्रेन युद्ध के बाद दोगुना खरीदा तेल

ब्रिटिश अखबार गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन में रूसी आक्रमण के बाद यूरोपीय देशों ने तेल और गैस की खरीददारी दोगुनी कर दी है और तेल और गैस की बढ़ी कीमतों के बाद भी यूरोप ने रूस से भारी मात्रा में तेल और गैस खरीदना जारी रखा, जिससे रूस को भारी फायदा पहुंचा है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर ने जो रिपोर्ट जारी की है, उसमें कहा गया है कि, यूक्रेन पर रूसी आक्रमण शुरू होने के बाद से दो महीनों में रूस को तेल, गैस और कोयले के लिए 62 अरब यूरो प्राप्त हुए हैं। जिनमें से यूरोपीय संघ ने पिछले दो महीने में 44 अरब यूरो (46.3 अरब डॉलर) का आयात किया है। जबकि, पूरे साल की बात करेंस तो 140 अरब यूरो के तेल यूरोपीय देश सिर्फ इस साल के पहले चार महीने में खरीद चुके हैं।

रूस को पहुंचाया भारी फायदा

रूस को पहुंचाया भारी फायदा

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर की रिपोर्ट से पता चलता है कि, एक तरफ यूरोपीय देश भारत की तरफ आंख तरेरते हैं, जबकि खुद लगातार रूस को लाभ पहुंचा रहे हैं। भले ही यूरोप और अमेरिका ने रूस के खिलाफ सख्त प्रतिबंध लगाए हैं, यूरोपीय देशों की सरकार ने तेल और गैस की खरीददारी रूस से दोगुना तक बढ़ा दी है, जिससे रूस को भारी फायदा पहुंचा है और रूस के खिलाफ जिन आर्थिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया था, वो चूकने लगे हैं।

प्रतिबंधों का असर हो गया कम

प्रतिबंधों का असर हो गया कम

इसके बाद भी, जबकि रूस से सामानों का आयात काफी कम हो चुका है और प्रतिबंधों की वजह से रूस के कई सेक्टर तबाही के कगार पर पहुंच चुके हैं, उसके बाद भी सिर्फ तेल और गैस की बदौलत रूस ने अपनी अर्थव्यवस्था को डिगने से बचा रखा है और युद्ध के बाद जैसे ही तेल और गैस की कीमतों में इजाफा हुआ, रूस को और भी ज्यादा फायदा मिलने लगा। CREA के आंकड़ों के अनुसार, आक्रमण से पहले जनवरी और फरवरी में दरों की तुलना में अप्रैल के पहले तीन हफ्तों में रूस से विदेशी बंदरगाहों पर कच्चे तेल की शिपमेंट में 30% की गिरावट आई है। लेकिन रूस अब अपने तेल और गैस के लिए ऊंची कीमतों का आदेश दे सकता है, जिसका उसका मतलब है, कि उसका राजस्व, सीधे सरकार के पास पहुंचेगा। रूस की तेल कंपनियां सरकार के अधीन हैं, लिहाजा रुपयों का प्रवाह सीधे सरकार तक हो रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि, रूस ने प्रभावी रूप से यूरोपीय संघ को एक ऐसे जाल में फंसा लिया है, जहां और ज्यादा प्रतिबंध लगाना संभव नहीं है और इन प्रतिबंधों से रूस को नाममात्र के नुकसान हो रहे हैं।

रूस पर नहीं पड़ा ज्यादा फर्क

रूस पर नहीं पड़ा ज्यादा फर्क

CREA के प्रमुख विश्लेषक लॉरी माइलीविर्टा ने कहा कि, रूस के पास लगातार रुपये पहुंचने का सिलसिला जारी है, जिसकी वजह से युद्ध की रफ्तार भी बनी हुई है। उन्होंने कहा कि, पुतिन को रोकने का एकमात्र तरीका है, जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाना, लेकिन अचानक ये संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि, 'जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता की वजह से चाहे वो रूस हो या फिर कोई और दुष्ट राष्ट्र, इनपर प्रतिबंध का ज्यादा असर नहीं हो पाता है।' उन्होंने कहा कि, 'हर कोई जो इन जीवाश्म ईंधन को खरीदता है, वह रूसी सेना द्वारा किए गए अंतरराष्ट्रीय कानून के भयानक उल्लंघन में शामिल है'। रूस हाल के दिनों में पोलैंड और बुल्गारिया को जीवाश्म ईंधन की आपूर्ति रोक दी है, जिससे यूरोपीय देश परेशान हो गये हैं।

‘रूस कर रहा नियमों का उल्लंघन’

‘रूस कर रहा नियमों का उल्लंघन’

कैंपेनियन ग्रुप ग्लोबल विटनेस के सीनियर सलाहकार लुई जे विल्सन ने कहा कि, रूस अपने ही अनुबंधों का उल्लंघन कर रहा है, जिसका मतलब ये हुआ, कि अब दूसरे उद्योगपतियों के पास रूस के साथ व्यापार जारी रखने का कोई बहाना नहीं बचा है। उन्होंने कहा कि, 'जीवाश्म ईंधन की बड़ी कंपनियों और कमोडिटी व्यापारियों ने रूसी जीवाश्म ईंधन में व्यापार जारी रखा है और उन्होंने दावा किया है, कि वो अपने दीर्घकालिक अनुबंधों की वजह से ऐसा करने के लिए मजबूर हैं, लेकिन अब उन्हें रूसी संस्थाओं के साथ किए गये समझौतों के मूल्यों की तरफ ध्यान देना चाहिए'। उन्होंने कहा कि, रूस अपने स्वयं के युद्ध प्रयासों का समर्थन करने के लिए इन अनुबंधों को फाड़ने के लिए तैयार है, फिर भी यूरोपीय कंपनियां रूस के सम्मान में उनके साथ व्यापार कर रही हैं और रूस को आर्थिक मदद पहुंचा रही हैं'। उन्होंने इस व्यापार को घातक और 'ब्लड ऑयल' करार दिया है।

मजबूरी या यूरोप का स्वार्थ?

मजबूरी या यूरोप का स्वार्थ?

CREA के डेटा में पाया गया कि, कई जीवाश्म ईंधन कंपनियों ने रूस के साथ बीपी, शेल और एक्सॉनमोबिल सहित उच्च मात्रा में व्यापार करना जारी रखा है। पिछले दो महीनों में जर्मनी, रूस का सबसे बड़ा आयातक बनकर सामने आया है, जबकि जर्मनी की सरकार ने काफी आक्रामकता के साथ रूस पर प्रतिबंध लगाने और रूसी तेल पर निर्भरता को रोकने की वकालत की है। इस अवधि के दौरान जर्मनी ने 9 अरब यूरो के तेल रूस से खरीदे हैं। जबकि, इटली और नीदरलैंड ने 6.8 अरब यूरो और 5.6 अरब यूरो का तेल रूस से आयात किया है।

क्या कहती हैं यूरोपीय कंपनियां?

क्या कहती हैं यूरोपीय कंपनियां?

शेल के एक प्रवक्ता ने गार्डियन को बताया कि, कंपनी ने यूक्रेन पर रूस के युद्ध के जवाब में निर्णायक कार्रवाई की थी। उन्होंने कहा कि, 'हमने गज़प्रोम (रूसी तेल कंपनी) और संबंधित संस्थाओं के साथ अपने संयुक्त कारोबार से बाहर निकलने और सरकारों के परामर्श से सभी रूसी हाइड्रोकार्बन को चरणबद्ध तरीके से निकलने के बारे में विचार कर रहे हैं'। यानि, आप समझ सकते हैं, कि अपने स्वार्थ में यूरोपीय देश कितने आगे निकल चुके हैं, जबकि यही जर्मनी सिर्फ भारत को जी-20 में इसलिए नहीं बुलाना चाह रहा था, क्योंकि भारत रूस से डिस्काउंट पर कच्चा तेल खरीदने के लिए तैयार हो गया था।

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