रुपया इंटरनेशनल होते ही भारत को छप्पर फाड़ फायदा, आएंगे अरबों डॉलर, सरकार का मास्टरस्ट्रोक

रूस के अलावा अब ईरान, अरब देश और यहां तक कि श्रीलंका जैसे देशों के लिए नई दिल्ली के साथ जुड़ने की संभावना के दरवाजे खोलती है।

नई दिल्ली, जुलाई 13: पिछले कुछ महीनों में अंतर्राष्ट्रीय हालात काफी बदल गये हैं और बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में भारत के लिए अपने व्यापार घाटे को मैनेज करना काफी मुश्किल हो गया था। जून महीने में भारत का व्यापार घाटा 25.63 अरब डॉलर हो गया है, जो भारत के लिए एक चिंताजनक संकेत हैं, क्योंकि डॉलर के मुकाबले रुपया भी कमजोर हो रहा था, लिहाजा इसका सीधा असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ा है और 1 जुलाई को आई रिपोर्ट के मुताबिक, जून के आखिरी हफ्ते में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार से 5 अरब डॉलर कम हो गये, लिहाजा भारतीय रिजर्व बैंक ने बड़ा फैसला करते हुए रुपये को इंटरनेशनल कर दिया है। आरबीआई ने जो कदम अब जाकर उठाया है, उसकी मांग भारतीय अर्थशास्त्री पिछले कई सालों से कर रहे थे और भारत के इस कदम से देश को बंपर फायदा होने की संभावना है।

भारत को होगा बंपर फायदा

भारत को होगा बंपर फायदा

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रुपये में इंटरनेशनल ट्रेड शुरू करने के आरबीआई के फैसले के बाद भारत को हार्ड करेंसी में सालाना 30 से 36 अरब डॉलर की बचत हो सकती है और रुपये में कारोबार करने की वजह से कई देशों के साथ व्यापार की गुंजाइश बढ़ सकती है, जिससे रुपये के एक्सचेंज पर प्रेशर कम हो जाएगा। भारतीय करेंसी रुपये के जरिए शुरू होने वाले इस नये व्यापार तंत्र के जरिए अब रूस के साथ बिना देरी किए व्यापार शुरू किया जा सकता है,जो भारत सरकार के बांडों के लिए भी अनुकूल हो सकता है। इस दौरान भारत को जो सरप्लस भुगतान होगा, उसे एक स्पेशल 'वोस्ट्रो' खाते में रखा जाएगा। आपको बता दें कि, वोस्ट्रो खाता एक ऐसा खाता है जो एक बैंक दूसरे बैंक में खोलता है। ये खाते संपर्ककर्ता बैंकिंग का एक अनिवार्य पहलू हैं जिसमें निधि रखने वाला बैंक किसी विदेशी समकक्ष के खाते के संरक्षक के रूप में कार्य करता है या उसका प्रबंधन करता है। ये वोस्ट्रो अकाउंट भारतीय रुपये में कारोबार के लिए खोला जाएगा, जिसका इस्तेमाल भारत किसी देश के स्थानीय बाजार में व्यापारिक भागीदारी निभाने के लिए और निवेश करने के लिए कर सकता है।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि, "जब कोई देश रिकॉर्ड उच्च चालू खाता घाटे का सामना करता है, यानि, अगर किसी देश की करेंसी डॉलर के मुकाबले गिरने लगती है, तो चुनिंदा देशों के साथ इस तरह के स्थानीय करेंसी में आपसी व्यापार किया जाता है, ताकि डॉलर को देश से बाहर निकलने से बचाया जा सके'। वहीं, अर्थव्यवस्था के जानकारों का कहना है कि, रिजर्व बैंक के इस फैसले से भारत की निर्भरता अब सिर्फ डॉलर्स पर नहीं रहेगी, वहीं दूसरी तरफ अब भारत के लिए रिजर्व बैंक का ये कदम व्यापार घाटे को कम करने में मददगार साबित हो सकता है। आपको बता दें कि, सोमवार की शाम रिजर्व बैंक ने एक परिपत्र जारी करते हुए भारतीय रुपये को इंटरनेशनल करने की घोषणा की है, जिसमें कहा गया है कि, अब रुपये को आपकी व्यापार में शामिल करने, आयात निर्यात में सेटलमेंट करने और इनवायस बनाने की सुविधा दी गई है।

कई सालों से की जा रही थी मांग

कई सालों से की जा रही थी मांग

पिछले हफ्ते स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने भी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से रुपये को इंटरनेशनल करने की अपील की थी और ये मांग पिछले कई सालों से की जा रही थी, लेकिन पूरा मामला यहां आकर अटक जाता था, कि इंटरनेशनल ट्रेड सेटलमेंट के केन्द्र में भारतीय रुपये की स्वीकार्यता कहां तक होगी। लेकिन, यूक्रेन संकट के दौरान खुद रूस ने भारत को स्थानीय करेंसी में व्यापार करने का ऑफर दिया था और भारत और रूस के बीच अभी जो पेट्रोलियम का व्यापार हो रहा है, वो चीन की करेंसी युआन के जरिए हो रही है। लेकिन, अब भारत खुद अपनी करेंसी के जरिए ना सिर्फ व्यापार कर सकता है, बल्कि अपने मित्र देशों को भी रुपये के जरिए व्यापार करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।

'मुद्रा बास्केट का विस्तार करने की जरूरत'

'मुद्रा बास्केट का विस्तार करने की जरूरत'

वहीं, बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि, "आरबीआई के इस कदम से बॉन्ड और इक्विटी सहित स्थानीय परिसंपत्ति वर्गों में रुपये का निवेश भी होना चाहिए।" यहां आपको बताते चलें कि, अप्रैल और मई में रूस को भारत का आयात लगभग 2.5 अरब डॉलर था, जो सालाना आधार पर करीब 30 अरब डॉलर होता है। कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि, इस वित्त वर्ष के दौरान यह बढ़कर मासिक औसत 3 अरब डॉलर या सालाना कुल मिलाकर 36 अरब डॉलर हो जाएगा। वहीं, इकोनॉमिक टाइम्स से बात करते हुए वैश्विक बाजारों के प्रमुख बी प्रसन्ना ने कहा कि, "इसका मतलब ये हुआ, कि इस साल सामानों के आयात के लिए भारत जो 36 अरब डॉलर रुस को देने वाला था, वो अब नहीं देना होगा। इसकी जगह पर भारत अब रूस के साथ रुपये में कारोबार करेगा, वहीं, रूस को भारत में व्यापार करने के लिए भारतीय मुद्रा भंडार भी मिलेगा, जो भारत के बांड के लिए स्वागत योग्य मांग प्रदान करता है।"

किन देशों के खुल सकते हैं दरवाजे?

किन देशों के खुल सकते हैं दरवाजे?

रूस के अलावा अब ईरान, अरब देश और यहां तक कि श्रीलंका जैसे देशों के लिए नई दिल्ली के साथ जुड़ने की संभावना के दरवाजे खोलती है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ईरान और रूस के खिलाफ व्यापक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध हैं, लिहाजा अब वो काफी आसानी के साथ, बिना प्रतिबंधों का उल्लंघन कि, रुपये में भारत के साथ कारोबार कर सकते हैं। वहींस, श्रीलंका जैसे देश, जिनके पास डॉलर खत्म हो चुके हैं, उनके लिए रुपये में भारत से सामान खरीदना एक वरदान जैसा होगा और भारत उन्हें अब मदद अपनी करेंसी में कर सकता है, जिससे उनके पास रुपये का भंडार जमा होगा। सबनवीस ने कहा कि, 'रुपये को इंटरनेशनल बनाने का मतलब ये है, कि अब भारतीय करेंसी की मौजूदा तादाद को बढ़ाकर पांच से सात या आठ गुना तक करने की जरूरत होगी।'

डॉलर का प्रभाव हो जाएगा कम

डॉलर का प्रभाव हो जाएगा कम

दुनिया के ज्यादातर देश व्यापार करने के लिए विदेशी मुद्रा, जैसे डॉलर, यूरो, रॅन्मिन्बी और पाउंड का इस्तेमाल करते हैं। अब चीन की मुद्रा युआन भी इस्तेमाल की जाने लगी है। लेकिन, डॉलर अभी भी इंटरनेशनल ट्रेड के लिए सबसे प्रभावी मुद्रा बना हुआ है और इसीलिए पूरी दुनिया में अमेरिका की बादशाहत भी है। लेकिन, जैसे जैसे नई करेंसी को इंटरनेशनल किया जा रहा है, डॉलर का प्रभुत्व कुछ हद तक कम हो रहा है। फाइनेंशियल टाइम्स ने एक हफ्ते पहले आईएमएफ के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया था कि, साल 2022 की पहली तिमाही के अंत में डॉलर का आवंटित भंडार 2016 के मुकाबले 5 प्रतिशत तक कम होकर 60 प्रतिशत पर आ गया है और आने वाले वक्त में इसके और भी कम होने की पूरी संभावना है।

भारत का व्यापार घाटा धीरे-धीरे होगा कम

भारत का व्यापार घाटा धीरे-धीरे होगा कम

आपको बता दें कि, दुनियाभर में कई देशों के आर्थिक संकट में फंसने की चेतावनी जापान की रेटिंग एजेंसी नोमुरा होल्डिंग्स की तरफ से इसी महीने दी गई है, जिसको लेकर भारत में भी चिंताएं हैं, लेकिन पिछले हफ्ते पब्लिश किए गये ताजा रिपोर्ट से पता चला था कि, भारत का व्यापार घाटा सिर्फ जून महीने में बढ़कर रिकॉर्ड 25.63 अरब डॉलर हो गया है, जो भारत सरकार के लिए बड़ा टेंशन है, क्योंकि भारत सरकार की कोशिश लगातार व्यापार घाटे को पाटने की रही है, ताकि देश का निर्यात बढ़ाने के साथ साथ विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाया जाए, लेकिन इस पहल में सरकार को बड़ा झटका लगा है। हालांकि, रिकॉर्ड व्यापार घाटे के पीछे की सबसे बड़ी वजह पेट्रोलियम, कोयले और सोने के आयात में भारी बढ़ोतरी को बताया जा रहा है, वहीं जून महीने में भारत के निर्यात में भारी गिरावट भी दर्ज की गई है, जिससे रुपये में और गिरावट आई है और बड़े करेंट अकाउंट डेफिसिट (सीएडी) के बारे में चिंता बढ़ गई है।

कितना हो गया है भारत का व्यापार घाटा?

कितना हो गया है भारत का व्यापार घाटा?

भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों से पता चला है कि, जून में भारत का व्यापारिक निर्यात 16.8% बढ़कर 37.9 अरब डॉलर हो गया है, जो मई के मुकाबले 20.5% से कम था, जबकि भारत के आयात में 51% का उछाल आया है और जून महीने में भारत का आयात बढ़कर 63.58 अरब डॉलर हो गया है। वहीं, पिछले साल से तुलना करें, तो साल 2021 के जून महीने में भारत का व्यापार घाटा 9.61 अरब डॉलर था। वहीं, ICRA की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर का अनुमान है कि, इन परिस्थितयों के बीच फिलहाल डॉलर के मुकाबले रुपया और गिर सकता है। उन्होंने कहा कि, 'वैश्विक प्रतिकूल परिस्थितियों और डॉलर की मजबूती को देखते हुए, बढ़ते व्यापार घाटे के साथ, दूसरी तिमाही में भारतीय रुपया और कमजोर हो सकता है और ये 80-81 तक जा सकता है'। लिहाजा, रुपये को इंटरनेशनल करना सरकार का एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है।

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