भारत दौरे पर विक्रमसिंघे.. डिफॉल्ट होने के एक साल बाद कैसे हैं श्रीलंका के हाल? राजापक्षे परिवार फिर मजबूत
Sri Lanka Crisis One Year: आज से एक साल पहले श्रीलंका के लोग राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को राष्ट्रपति भवन से बाहर निकालकर सड़कों पर जश्न मना रहे थे। उस वक्त रिटायर्ड अकाउंटेंट मिल्टन परेरा अपने घर में बैठकर यह विचार कर रहे थे, कि क्या उनका परिवार अगली सुबह खाना खा पाएगा या नहीं?
पिछले साल देश की आर्थिक अव्यवस्था के लिए देश की जनता ने गोटाबाया राजपक्षे सरकार को जिम्मेदार ठहराया और उनके खिलाफ देशभर का गुस्सा फूट पड़ा। श्रीलंका में कई घंटों तक बिजली कट रही थी, ईंधन की कमी हो गई थी और बेतहाशा मुद्रास्फीति ने देश की जनता का हाल बेहाल कर दिया था।

लेकिन मिल्टन परेरा ने उस समय कहा था, कि एक वक्त जनता के चहेते रहे गोटाबाया के पद से हटने के बाद, उनके देश ने अब तक जो कठिनाइयां झेली थीं, वे और भी बदतर हो जाएंगी। आज एक साल बाद, मिल्टन परेरा और उनके उनके लाखों हमवतन, मेज पर पर्याप्त भोजन देखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
75 साल के मिल्टन परेरा का कहना है कि उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई है।
जापान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मिल्टन परेरा ने अपने जर्जर सरकारी आवास से कहा, 'पिछले साल हमारे पास पैसा था, लेकिन कोई सामान नहीं था, लेकिन अब हमारे पास सामान तो है, लेकिन पैसे खत्म हो गये हैं।'
मिल्टन परेरा का घर समुद्र के किनारे विरोध स्थल से थोड़ी दूरी पर है, जहां पिछले साल राजपक्षे की सरकार को गिराने के लिए भारी विरोध प्रदर्शन किया गया था।
स्लेव द्वीप में उनका घर है, जो कोलंबो का एक मजदूर वर्ग का इलाका है, जहां औपनिवेशिक काल के दौरान पुर्तगालियों ने अफ्रीकी दासों को गुलाम बनाकर रखा था। उन्हीं मकानों में से एक में मिल्टन परेरा रहते हैं, जिसका मरम्मत कई सालों से नहीं किया गया है।

धंसे हुए गालों और पतले अंगों से उभरी हुई नसों के साथ, परेरा जब अपनी रसोई में इधर-उधर घूमते हैं, तो उनके छाती से घरघराहट की आवाज आती है, जो उसके पुराने अस्थमा का परिणाम है।
आर्थिक संकट से पहले सरकारी अस्पताल में उनका मुफ्त इलाज किया जाता था और उन्हें दवाएं भी मुफ्त मिलती थीं, लेकिन एक साल पहले देश के डिफॉल्ट होने के बाद सरकार ने सार्वजनिक इलाज प्रणाली को खत्म कर दिया है।
दो महीने पहले परेरा के कल्याण भुगतान अकाउंट को सरकार ने खर्चों में कटौती की बात कहकर बंद कर दिया। जिसका मतलब है, कि वह अब अपने इलाज के लिए इन्हेलर खरीदने में भी सक्षम नहीं हैं।
सरकार ने बिजली और पानी के ऊपर से सब्सिडी हटा दिया है, जिसकी वजह से परेरा और लाखों श्रीलंकन परिवारों के बिजली और पानी का बिल दोगुने से ज्यादा हो गया है।
आर्थिक संकट ने पहले ही परेरा, उनकी पत्नी, उनके दो बच्चों और उनके आसपास के परिवारों ने खाना खाना कम कर दिया था और आज भी स्थिति वही है।
हालांकि, एक साल बाद श्रीलंका के सुपरमार्केट फिर से रसोई के सामानों से पूरी तरह भर गए हैं, जो पिछले साल की पुरानी कमी के दौरान दुकानों की अलमारियों से गायब हो गए थे, किन परेरा और उनके जैसे लाखों परिवार अब उन सामानों को खरीद नहीं सकता है।
परेरा की पत्नी बी. एम. पुष्पलता ने कहा, कि "हम मांस, मछली और अंडे नहीं खरीद सकते और चावल और दाल ही हम काफी लंबे वक्त से खा रहे हैं और वो भी काफी महंगे हैं।"

डिफॉल्ट से बाहर निकलने की कोशिश
श्रीलंका की सरकार आईएमएफ के प्रोग्राम में है और इसीलिए उसे आईएमएफ की शर्तों के मुताबिक, तमाम सब्सिडी और सार्वजनिक योजनाओं को बंद करना पड़ा है।
अप्रैल 2022 में श्रीलंका ने अपने 46 अरब डॉलर के विदेशी ऋण पर चूक कर दी, क्योंकि इसकी अर्थव्यवस्था एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपने इतिहास में अभूतपूर्व गिरावट में चली गई थी।
पंपिंग स्टेशनों पर पेट्रोल के लिए कतारें मीलों तक फैली हुई थीं, और उस लाइन में लगे हुए दर्जनों ऑटो ड्राइवर्स की मौत हो गई।
एक साल पहले परिवारों के पास खाना पकाने के लिए गैस नहीं थी, उर्वरक आयात पर प्रतिबंध के कारण कृषि उपज में नाटकीय रूप से गिरावट आई और अस्पताल जीवन रक्षक फार्मास्यूटिकल्स से खाली हो गए थे।
कई महीनों तक चले गुस्से वाले विरोध प्रदर्शन की वजह से 9 जुलाई को राजपक्षे के राष्ट्रपति महल पर हमला किया गया, जो मिल्टन परेरा की घर से थोड़ी ही दूरी पर था और इसकी वजह से गोटाबाया राजपक्षे को श्रीलंका छोड़कर जाना पड़ा।
लेकिन राजपक्षे के जाने से श्रीलंका की आर्थिक संकट समाप्त नहीं हुई, सितंबर में मुद्रास्फीति 70% पर पहुंच गई। पेट्रोल खरीदने में भी राशनिंग लागू है।
उनके उत्तराधिकारी रानिल विक्रमसिंघे ने मार्च में देश के ऋण के काले छेद को बंद करने के लिए आईएमएफ की कठोर शर्तों पर हस्ताक्षर किए और फिर श्रीलंका को 2.9 अरब डॉलर का आईएमएफ बेलआउट पैकेज हासिल हुआ।
फरवरी में राष्ट्र के नाम संबोधन में विक्रमसिंघे ने कहा था, कि "राष्ट्रपति पद संभालने के बाद से मुझे कई फैसले लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है, जो अलोकप्रिय रहे हैं।" उन्होंने कहा, कि "हालांकि, उन फैसलों के कारण, आज इस देश का कोई भी नागरिक तेल की कतारों में निर्जलीकरण से नहीं मरेगा। आप गैस या उर्वरक के बिना भूखे नहीं मरेंगे।"
बहरहाल, सरकारी खर्च और कल्याण कार्यक्रमों में भारी कटौती ने देश भर में कठिनाइयों को बढ़ा दिया है।
कोलंबो स्थित एडवोकाटा इंस्टीट्यूट थिंक टैंक के मुख्य कार्यकारी धननाथ फर्नांडो ने कहा, कि संकट शुरू होने के बाद से 40 लाख श्रीलंकन गरीबी रेखा से नीचे आ गए हैं।
उन्होंने कहा, कि "इसका मतलब है कि 2 करोड़ 20 लाख की आबादी वाले देश में लगभग 70 लाख लोग प्रति महीने सिर्फ 14,000 रुपये से कम कमा रहे हैं।"
संयुक्त राष्ट्र ने जून में कहा था, कि उनमें से लगभग 40 लाख श्रीलंकाई के पास खाना खाने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं।
फर्नांडो ने कहा, कि आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल देश भर में जीवन स्तर में भारी गिरावट आई है, जिसके जल्द ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने कहा कि जब तक मितव्ययिता उपायों का फल मिलना शुरू नहीं हुआ, द्वीप में पिछले साल भड़की निरंतर सामाजिक अशांति की वापसी का जोखिम है।
फर्नांडो ने कहा, "अगर हम वास्तव में भविष्य में श्रीलंका को विकास पथ पर ले जाने में नाकाम रहते हैं, तो मैं इसे पूरी तरह से खारिज नहीं कर रहा हूं।"
बीबीसी के मुताबिक, पूर्व राष्ट्रपति राजापक्षे फिर से मजबूत हो गये हैं और उनके मंत्रियों ने, जिन्होंने पिछले साल इस्तीफा दे दिया था, वो अब फिर से रानिल विक्रमसिंघे के कैबिनेट में शामिल हो गये हैं। लिहाजा, श्रीलंका एक साल बाद कहां खड़ा है, इसके बारे में कोई ठीक-ठीक नहीं कह सकता है, क्योंकि देश पर पुरानी स्थिति में लौटने का खतरा बना हुआ है। फिलहाल जनता, वक्त के ठीक होने का इंतजार कर रही है, लेकिन कब तक करेगी, कहा नहीं जा सकता है।
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