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घर के लिए दर-दर की ठोकर, क्या यूरोप क्या अमरीका

By संदीप सोनी
बाप-बेटी का शव
EPA
बाप-बेटी का शव

पिछले महीने आप्रवासी बाप-बेटी की विचलित करने वाली तस्वीर सामने आई, जो मैक्सिको से अमरीका में अवैध तरीके से दाख़िल होने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन नदी की तेज़ धार में बहकर काल के गाल में समा गए.

अयलान कुर्दी का शव गार्ड के हाथों में
AFP
अयलान कुर्दी का शव गार्ड के हाथों में

इस घटना की तुलना साल 2015 की उस तस्वीर से की गई जब तुर्की के तट पर सीरिया के तीन वर्षीय बालक अयलान कुर्दी का शव मिला था, जो अपने माता पिता के साथ यूरोप की तरफ जाने वाले प्रवासियों में शामिल था.

चार साल के अंतराल पर आईं दिल दहलाने वाली इन दो तस्वीरों ने कई सवालों को जन्म दिया है.

शरणार्थी
AFP
शरणार्थी

बेहतर ज़िंदगी की चाह में 'तीसरी दुनिया' के देशों से यूरोप-अमरीका पहुंचने की कोशिश कोई नई बात नहीं है और कई दशकों से यह सिलसिला जारी है.

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में यूरोपीय मामलों के जानकार प्रोफेसर गुलशन सचदेवा बताते हैं... ''असुरक्षा की दृष्टि से या किसी भी कारण से जो आदमी अपना घरबार छोड़कर निकलता है, वो चाहे अफ्रीका से या अफ़ग़ानिस्तान से जा रहे हों, उनका लक्ष्य होता है कहीं किसी तरह टिक जाएं.''

''यूरोप कई दशकों से ऐसी जगह रही है जहां लोगों को क़ायदे से रोज़गार और रहने के लिए जगह मिल जाती थी. यही वजह है कि आप्रवासी यूरोप के लिए चल पड़ते हैं. लेकिन सब यूरोप तक नहीं पहुंच पाते, पिछले वर्षों में हज़ारों लोग मारे गए हैं जो नाव की ज़रिए यूरोप पहुंचना चाहते थे. उन्हें लगता है कि यूरोप पहुंचकर उनकी ज़िंदगी संवर जाएगी.''

''लेकिन यूरोप में अब माहौल काफी बदल चुका है. सरकारों का रवैया सख़्त हो गया है. यूरोप अभी भी चाहता है कि बाहर के लोग आएं, लेकिन उसे पढ़े-लिखे, निपुण लोगों की ज़रूरत है. फिर भी एक सीमा से अधिक लोगों को यूरोप अपने यहां खपा नहीं सकता. यूरोप की अर्थव्यवस्था और राजनीति अभी इसके लिए राज़ी नहीं है.''

विस्थापित
AFP
विस्थापित

यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर रेफ्यूजीस (यूएनएचसीआर) के मुताबिक, दुनियाभर में सात करोड़ से अधिक लोग इस समय विस्थापित हैं.

इनमें से लगभग ढ़ाई करोड़ लोग शरणार्थी की शक्ल में हैं. इनमें सबसे अधिक संख्या सीरिया के लोगों की है. अफ़ग़ानिस्तान और दक्षिण सूडान इस मामले में क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं.

शरणार्थी
AFP
शरणार्थी

शरणार्थियों को पनाह देने के मामले में यूरोप में जर्मनी अव्वल है. अफ्रीका में सूडान और युगांडा ने भी बड़े पैमाने पर शरणार्थियों को छत दी है.

इसी तरह अफ़ग़ान शरणार्थियों ने पाकिस्तान का रूख़ किया है. लेकिन संख्या के हिसाब से देखें तो तुर्की ने सबसे अधिक लगभग 37 लाख शरणार्थियों को आश्रय दिया है.

ये वो लोग हैं जिन्हें अपने ही देश में नागरिकता देने से मना कर दिया गया, जहां उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और कहीं आने-जाने की आज़ादी से वंचित कर दिया गया.

यूरोप की ज़रूरत

लंदन के कुछ लोग
PA Media
लंदन के कुछ लोग

द इकोनॉमिस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोप को आप्रवासियों की ज़रूरत है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आप्रवासियों के बिना यूरोपीय देशों की आबादी सिकुड़ने लगेगी.

यूरोप के कई देशों में जनसंख्या वृद्धि दर बेहद धीमी है. कुछ देशों में यहां तक देखा गया है कि सालाना जितने लोग दम तोड़ते हैं, उतनी किलकारियां भी हर साल इन देशों में नहीं गूंजतीं.

जन्म और मृत्यु दर के इस फ़ासले से पैदा हुई समस्याओं के समाधान में आप्रवासियों की अहम भूमिका रही है.

प्रोफेसर गुलशन सचदेवा बताते हैं, ''यूरोप दुनिया के सामने एक मिसाल बनना चाहता था. यूरोप मानवाधिकार और शरणार्थियों के मामले में पूरी दुनिया को सीख देना चाहता था. ज़रूरतमंदों के लिए यूरोपीय संघ ने डब्लिन रेग्यूलेशन के तहत एक सिस्टम बनाया. अलग-अलग देशों के लिए शरणार्थियों की एक संख्या तय की गई.''

''लेकिन पूर्वी यूरोप के हंगरी-पोलैंड जैसे देशों को इस पर आपत्ति थी. उन्होंने ये कहते हुए बाहरी लोगों को बसाने से मना कर दिया कि हमें उनकी ज़रूरत नहीं है. इसी वजह से ये सिस्टम पूरी तरह से लागू नहीं हो पा रहा है. राजनीतिक दलों ने भी इसे जमकर भुनाया.''

''जर्मनी जैसे देश ने आगे बढ़कर शरणार्थियों को अपनाना चाहा तो चांसलर एंगेला मर्केल को ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा. आने वाले वर्षों में बाहर से यूरोप जाकर बसने के इच्छुक लोगों को दिक्क़तों को सामना करना ही पड़ेगा.''

विरोध प्रदर्शन
Getty Images
विरोध प्रदर्शन

आप्रवासन संबंधी क़ानूनों के लिए अमरीका भी ख़ासा चर्चित रहा है. मेक्सिको के रास्ते अमरीका में दाख़िल होने के कम से कम दो ऐसे मामले पिछले दिनों सामने आएं हैं जिन्होंने अमरीका से बाहर भी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है.

अल्बर्टो मार्टिनेज़ रामीरेज़ अपनी बेटी वलेरिया के साथ
Reuters
अल्बर्टो मार्टिनेज़ रामीरेज़ अपनी बेटी वलेरिया के साथ

पहला मामला एक पिता और उसकी 23 महीने की बेटी का है जिन्हें नदी पार करके अमरीका में दाख़िल होने की कोशिश के दौरान अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

आप्रवासी बाप-बेटी की ऐसी तस्वीर आपको हिलाकर रख देगी

रेगिस्तान, अमरीका-मेक्सिको
BBC
रेगिस्तान, अमरीका-मेक्सिको

दूसरा मामला छह साल की एक सिख बच्ची का है जिसने मेक्सिको की सीमा से अमरीका में दाख़िल होने की कोशिश के दौरान भीषण गर्मी की वजह से रेगिस्तान में दम तोड़ दिया.

ट्रंप
Reuters
ट्रंप

जानकारों का दावा है कि हर साल ऐसे कई मामले सामने आते हैं और अब ट्रंप प्रशासन की सख़्ती की वजह से जोखिम और बढ़ गया है.

अमरीका में इस तरह के कई मामलों को देख चुके वकील गुरपाल सिंह बताते हैं, ''ऐसे कम से कम 12 मामले मेरे पास हैं जिन्हें मैं देख रहा हूं. हर महीने दो-चार और आ जाते हैं. ये संख्या बढ़ती जा रही है. ट्रंप प्रशासन ने अटॉर्नी जर्नल के ज़रिए नया क़ानून बनाया है कि इमिग्रेशन जज बॉन्ड्स नहीं दे सकते हैं.''

''इसकी वजह से जेल के मामले बढ़ रहे हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने कई नए जजों की भर्तियां की हैं, उनमें से ज़्यादातर को इस तरह के मामलों की कोई जानकारी या अनुभव नहीं है. उन्हें संबंधित क़ानूनों की जानकारी नहीं है. ऐसा लगता है कि उन्हें आप्रवासियों को परेशान करने के लिए ही भर्ती किया गया है. बहुत ख़राब हालात हैं.''

शरणार्थी
Reuters
शरणार्थी

विस्थापित, शरणार्थी, और आप्रवासियों को आमतौर पर समस्या के तौर पर देखा जाता है. लेकिन कई जानकार इसे समस्या नहीं बल्कि समाधान के रूप में देखने का सुझाव देते हैं.

ये वही लोग हैं, जिन्होंने सारी दुनिया में परिश्रम का डंका बजाया, टैक्स चुकाकर अर्थव्यवस्था का पहिया घुमाया और सांस्कृतिक विविधता से समाज को परिष्कृत किया....

लेकिन धरती के कुछ हिस्सों में युद्ध और संघर्ष के सतत वातावरण ने उनकी मुश्किलें बढ़ाईं और चरमपंथ के प्रसार ने उन्हें संदिग्ध बना दिया.

क्या यूरोप और क्या अमरीका, चुनावी राजनीति से कोई बच ना पाया और इसकी गाज अक्सर उन पर गिरी जिनके सिर पर छत ना थी, जो आज भी छत की आस में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं.

BBC Hindi
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English summary
Problems for home, no matter it is Europe or America
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