India-Nepal Diplomacy: नेपाल में चायना मैन' प्रधानमंत्री: ओली की वापसी मतलब 'इंडिया Out', चीन In?
India-Nepal Diplomacy: नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली ने जुलाई 2021 में अपने विदाई भाषण में कहा था, "मेरे पास जनादेश था, लेकिन न्यायालय का आदेश देउबा के पक्ष में गया।"
लेकिन अब जुलाई 2024 में, नेपाली कांग्रेस (एनसी) के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी-एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी (सीपीएन-यूएमएल) के अध्यक्ष ओली के साथ आ गये हैं, जिससे उनका चौथी बार नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में लौटना तय हो गया है।

वर्तमान प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' ने शुक्रवार को संसद में विश्वास मत खो दिया, जिससे उनकी सरकार गिर गई है।
प्रधानमंत्री प्रचंड की विदाई के साथ ही आशंकाएं एक बार फिर से गहराने लगी हैं, कि क्या ओली का लौटना भारत और नेपाल के संबंधों के लिए क्या घातक होने वाला है? क्या ओली चीन के 'आदमी' हैं?
ओली का भारत को लेकर मौजूदा नजरिया क्या है?
नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी-एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी (CPN-UML) ने गुरुवार को कहा है, कि चारों ओर से घिरा यह हिमालयी देश भारत के साथ 'घनिष्ठ मैत्रीपूर्ण संबंध' बनाए रखकर ही आर्थिक समृद्धि प्राप्त कर सकता है। साथ ही, उनकी पार्टी ने जोर देकर कहा है, कि वह नेपाल की धरती से अपने दक्षिणी पड़ोसी देश के खिलाफ किसी भी तरह की गतिविधि की अनुमति नहीं देगी।
पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली की अगुवाई वाली पार्टी के एक वरिष्ठ नेता की यह टिप्पणी संसद में विश्वास मत की पूर्व संध्या पर आई थी, जिसके तहत ओली एक बार फिर राजनीतिक रूप से कमजोर हिमालयी देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं।
इसके अलावा, सीपीएन-यूएमएल के विदेश मामलों के विभाग के प्रमुख और स्थायी समिति के सदस्य डॉ. राजन भट्टाराई ने पीटीआई-भाषा को दिए इंटरव्यू में कहा, "सीपीएन-यूएमएल का मानना है, कि भारत विरोधी नीति अपनाकर नेपाल प्रगति नहीं कर सकता या नेपाली लोगों के हितों को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।"
उन्होंने कहा कि पार्टी अध्यक्ष ओली 21वीं सदी की मांग के मुताबिक नेपाल-भारत संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाना चाहते हैं।
यानि, ओली के प्रधानमंत्री शपथ ग्रहण से पहले उनकी पार्टी ने भारत को भरोसा देने की कोशिश की है, कि 'नेपाल, चीन के लिए भारत के हितों से समझौता नहीं करेगा।'
लेकिन क्या वाकई ऐसा होगा?
केपी शर्मा ओली अपने चीन समर्थक रुख के लिए जाने जाते हैं और इसीलिए अब देखना दिलचस्प हो जाता है, कि वे दोनों पड़ोसियों के साथ कैसे समान निकटता के संबंध बनाए रखते हैं।
डॉ. राजन भट्टाराई का कहना है, कि "हमारा मानना है, कि हम भारत के साथ घनिष्ठ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखकर ही ज्यादा विदेशी निवेश आकर्षित कर सकते हैं, व्यापार को बढ़ावा दे सकते हैं और आर्थिक समृद्धि हासिल कर सकते हैं।" उन्होंने कहा, कि "हम भारत को एक महत्वपूर्ण पड़ोसी मानते हैं, और हम अपनी धरती से भारत के खिलाफ किसी भी गतिविधि की अनुमति नहीं देंगे।"
लेकिन डॉ. राजन भट्टाराई भारत के साथ विवादों को भी उठाने से नहीं चूक रहे हैं। उन्होंने कहा, कि "हालांकि 1950 की संधि के कुछ प्रावधानों, सीमा विवाद, सीमावर्ती क्षेत्रों में भूमि के जलमग्न होने और बढ़ते व्यापार घाटे के कारण द्विपक्षीय संबंधों में कुछ समस्याएं हैं, लेकिन सीपीएन-यूएमएल उन्हें बातचीत के जरिए हल करना चाहती है।"
लेकिन, क्या केपी शर्मा ओली एक बार फिर से नक्शे को लेकर भारत के साथ विवाद को बढ़ाएंगे, जिसके तहत में तीन भारतीय क्षेत्रों, 'लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख' को नेपाल का हिस्सा बताते हैं। वो केपी शर्मा ओली ही थे, जिनके कार्यकाल में माना जाता है, कि चीन के इशारे पर भारत के साथ सीमा विवाद शुरू हुआ था।
माना जाता है, कि ओली ने उस वक्त बढ़ते घरेलू दबाव को रोकने और अपने नेतृत्व को चुनौती देने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल करने का प्रयास किया था।
ओली ने पहले भी नेपाल के आंतरिक मामलों में कथित रूप से हस्तक्षेप करने के लिए भारत की सार्वजनिक रूप से आलोचना की थी।
चारों ओर से घिरा नेपाल, माल और सेवाओं के परिवहन के लिए भारत पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है। नेपाल भारत के लिए इस क्षेत्र में अपने समग्र रणनीतिक हितों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है, और दोनों देशों के नेताओं ने अक्सर सदियों पुराने "रोटी बेटी" संबंधों का जिक्र किया है।
यहां जानना जरूरी है, कि नेपाल पांच भारतीय राज्यों - सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के साथ 1,850 किलोमीटर से ज्यादा सीमा साझा करता है।

क्या भारत-नेपाल में नहीं है विश्वास का रिश्ता?
जियो-पॉलिटिक्स के जानकार केवी राजन और अतुल के ठाकुर ने भारत-नेपाल संबंधों पर आधारित अपनी किताब 'काठमांडू क्रोनिकल' में लिखा है, कि "भारत और नेपाल, सदियों के संबंध होने के बाद भी आपसी विश्वास और समझ के रिश्ते बनाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं।"
उन्होंने लिखा है, कि "इसके लिए दोनों तरफ के लोग जिम्मेदार हैं। इसका एक मुख्य कारण यह है, कि इतिहास, भूगोल, धर्म और संस्कृति के संबंधों और लोगों के बीच आपसी संबंधों के जरिए उनके पास मौजूद अपार संपदा के बावजूद, आपसी सहानुभूति का अभाव है। भारत, नेपाल की समानता और संप्रभुता की चाहत को पूरी तरह से समझने में असमर्थ है, और नेपाल, बदले में, भारत की भू-राजनीतिक मजबूरियों को समझने में असमर्थ है।"
हालांकि, उन्होंने लिखा है, कि "भारत ने कूटनीतिक तौर पर हर संभव कोशिश की है, नेपाल के दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए और अपने हितों को बढ़ावा दिया जाए, वो भी अच्छे इरादों के साथ। हर भारतीय प्रधानमंत्री, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, चंद्रशेखर, पी.वी. नरसिंह राव, आई.के. गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह, और अब नरेंद्र मोदी तक की सरकारों ने, नेपाली जरूरतों और उसकी अपेक्षाओं पर खास ध्यान दिया है, ताकि संबंधों को मजबूत आधार पर स्थिर किया जा सके, लेकिन जैसा कि फ्रांस में एक कहावत है, कि 'प्लस का चेंज, प्लस सी'एस्ट ला मेम चॉस (जितना ज्यादा बदलाव होता है, वो चीन उतना ही पहले जैसा रहता है)' लिहाजा यह रिश्ता अनिश्चितता और कमियों से भरा हुआ है।"

ओली की वापसी से चीन खुश?
चीन ने हालिया इतिहास में नेपाल को काफी हद तक भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश की है और उसने डिप्लोमेटिक सीमाएं भी लांघी हैं। नेपाल में चीन की राजदूत चेंग सोंग ने पिछले साल सितंबर में कूटनीतिक मर्यादाओं का उल्लंघन करते हुए कहा था, कि "भारत जैसा पड़ोसी होना नेपाल के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।"
इसके अलावा, नेपाल के कई नेता सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं, कि नेपाल की अंदरूनी राजनीति में चीन बार बार हस्तक्षेप कर रहा है। इसके अलावा, नेपाल के गले में हड्डी की तरफ फंस गए पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को लेकर भी चीनी राजदूत ने नेपाल के पत्रकार को खुलेआम धमकाया था, जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया था, कि डॉक्यूमेंट्स पर इस एयरपोर्ट के निर्माण के लिए 2 प्रतिशत पर कर्ज दिखाया गया है, जबकि चीन ने नेपाल को 5 प्रतिशत पर कर्ज दिया है। इस खुलासे ने चीन को बौखला कर दिया है।
पिछली बार जब ओली प्रधानमंत्री बने थे, उस वक्त तत्कालीन राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ने चीन के इशारे पर नेपाल की दोनों वामपंथी पार्टियों को एक किया था। विद्यादेवी भंडारी लगातार चीन के संपर्क में रहने के लिए जानी जाती थीं।
वहीं, जुलाई 2020 में ओली ने भारत पर अपनी सरकार को गिराने की साजिश रचने का आरोप लगाया था।
इसके अलावा, 1950 में भारत और नेपाल के बीच हुए पीस एंड फ्रेंडशिप संधि के खिलाफ भी ओली लगातार बोलते रहे हैं और उनका आरोप है, कि ये संधि नेपाल के हितों के लिए सही नहीं है। वो चुनावी अभियान में इस संधि के खिलाफ जहर उगलते रहे हैं।
अक्टूबर 2019 में ओली ने चीन का दौरा किया था और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी।
ओली की डिप्लोमेसी पर नजर रखने वाले एक्सपर्ट्स का कहना रहा है, कि वो नेपाल को चीन के करीब ले जाना चाहते हैं और उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में चीन के साथ 'ट्रांजिट ट्रेड' समझौता किया था।
ओली चाहते रहे हैं, कि तिब्बत में चीन जो सड़कों का जाल बिछा रहा है, उससे नेपाल को जोड़ दे, ताकि नेपाल की निर्भरता भारत पर कम हो जाए।
वहीं, अविश्वास मत हारने से पहले मौजूदा प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड ने चीन के साथ रेल लाइन समझौता कर लिया है, और माना जा रहा है, कि ओली इसे आगे ले जाएंगे, जो भारत के लिए परेशानी पैदा करेगा।
इसके अलावा, चीन के जिस 'बेल्ट एंड रोड' प्रोजेक्ट का भारत ने सख्ती से विरोध किया है, ओली उस प्रोजेक्ट के समर्थक हैं और माना जाता है, कि वो इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए एक बार फिर से भारत की 'चिंताओं पर ध्यान' नहीं देंगे।
ऐसा माना जाता है, कि ओली 'नेपाल की संप्रभुता' और 'राष्ट्रवाद की भावना' के सहारे सरकार चलाते हैं और उनका ये कार्यकाल भी उसी रास्ते पर हो सकता है। लेकिन, भारत के लिए अच्छी बात ये है, कि ओली की सरकार पूर्ण बहुमत वाली नहीं है, और उन्हें नेपाली कांग्रेस का समर्थन हासिल है, जो भारत विरोधी नहीं है, लिहाजा ओली शायद खुलकर भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम नहीं दे पाएंगे।
लेकिन ओली के शासनकाल में भारत-नेपाल के संबंध कैसे होंगे, इसकी पहली परीक्षा ओली के पहले विदेशी दौरे से तय होगा। अगर ओली अपने पहले दौरे पर भारत आते हैं, तो संकेत यही होगा, कि ओली के इस कार्यकाल में भारत-नेपाल संबंध अगर मजबूत नहीं होंगे, तो शायद खराब भी नहीं होंगे, लेकिन अगर वो भारत नहीं आते हैं, तो फिर भारत-नेपाल के रिश्तों में कड़वाहट का नया सिलसिला शुरू हो सकता है।
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