Diplomacy: PM मोदी का रूस दौरा, जानिए कैसे 6 महीने बाद होने वाली जियो-पॉलिटिक्स के लिए तैयार हो रहा भारत?

PM Modi Russia Visit: कोविड-19, यूक्रेन युद्ध, आर्मीनिया-अजरबैजान युद्ध और इजराइल-हमास युद्ध, अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी.. इन वैश्विक घटनाओं ने लगातार भारत की डिप्लोमेसी की कड़ी परीक्षा ली है और इसमें कोई शक नहीं, कि मोदी सरकार ने कहीं पर आक्रामकता के साथ, तो कहीं नरम नीति के जरिए इन चुनौतियों का सामना किया है।

लेकिन, प्रधानमंत्री मोदी की रूस की यात्रा को जब बारीकी से देखते हैं, तो पता चलता है, कि मोदी सरकार अब आने वाले दिनों में वैश्विक घटनाओं को ध्यान में रखते हुए पहले से ही जियो-पॉलिटिकल टेंशन और चुनौतियों के खिलाफ खुद को तैयार करना शुरू कर दिया है।

PM Modi Russia Visit

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उस वक्त मॉस्को दौरे पर गये हैं, जब वॉशिंगटन में 32 देशों वाले NATO गठबंधन की भी बैठक हो रही है, जिसे रूस विरोधी माना जाता है। भारत और रूस के बीच का 22वां शिखर सम्मेलन हो रहा है और अभी तक देखा गया है, कि हर बार ये सम्मेलन साल के अंत में आयोजित किए गये हैं, लेकिन इस बार मोदी सरकार ने दौरे का समय साल के बीच में रखा है। हालांकि, भारतीय विदेश विभाग के सचिव विनय क्वात्रा ने पीएम मोदी की यात्रा को 'सिर्फ द्विपक्षीय' बैठक कहा है, लेकिन डिप्लोमेसी में संकेत ही असली शब्द होते हैं।

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6 महीने के बाद के हालात के लिए अभी से तैयारी?

यूक्रेन ढाई सालों के बाद भी रूस से युद्ध लड़ने के काबिल सिर्फ इसलिए है, क्योंकि अमेरिका उसे लगातार हथियारों की सप्लाई कर रहा है। अमेरिका लगातार यूक्रेन को ना सिर्फ सैन्य मदद दे रहा है, बल्कि आर्थिक मदद भी दे रहा है। पिछले महीने ही जब इटली में G7 शिखर सम्मेलन हुआ, तो उसमें यूक्रेन की मदद के लिए 50 अरब डॉलर का फंट जुटाने का लक्ष्य रखा गया है और इसके लिए रूसी संपत्ति से आने वाले ब्याज का इस्तेमाल किया जाएगा।

लेकिन, क्या अमेरिका आगे जाकर भी यूक्रेन की मदद कर पाएगा?

ये सवाल इसलिए लंबे अर्से से उठ रहे हैं, क्योंकि अमेरिका में 5 नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं और पूरी संभावना है, कि डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता में वापसी हो सकती है और अगर डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में लौटते हैं, तो जियो पॉलिटिक्स पूरी तरह से बदल सकती है।

सबसे पहला बदलाव तो ये आने वाला है, कि डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में वापसी करते हुए यूक्रेन को अमेरिकी मदद पर रोक लगा सकते हैं और डोनाल्ड ट्रंप के रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ अच्छे संबंध किसी से छिपे नहीं हैं। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से ही डोनाल्ड ट्रंप कई बार कह चुके हैं, कि अगर वो राष्ट्रपति होते, तो यूक्रेन युद्ध शुरू नहीं होने देते।

पिछले हफ्ते भी डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है, कि अगर वो फिर से राष्ट्रपति बनते हैं, तो एक दिन में यूक्रेन युद्ध बंद करवा देंगे।

ट्रंप ने इससे पहले कहा था, कि "यदि हमारे पास एक वास्तविक राष्ट्रपति होता, एक ऐसा राष्ट्रपति, जिसका पुतिन सम्मान करते हों, तो उन्होंने कभी यूक्रेन पर हमला नहीं किया होता।" इसके अलावा भी डोनाल्ड ट्रंप, यूक्रेन युद्ध शुरू होने के लिए बाइडेन को 'कमजोर राष्ट्रपति' ठहरा चुके हैं।

वहीं, राष्ट्रपति पुतिन ने भी कहा है, कि "अगर मिस्टर ट्रंप किसी प्लान के साथ आते हैं और युद्ध को रोकना चाहते हैं, तो हम इसे पूरी गंभीरता से लेते हैं।" पुतिन ने आगे कहा था, कि "डोनाल्ड ट्रंप ने जो कहा, उनका प्लान क्या है, ये हमें नहीं पता, लेकिन निश्चित तौर पर उनकी कोशिश ईमानदारी से है और हम इसका समर्थन करते हैं।"

डोनाल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच अच्छे संबंध रहे हैं और डोनाल्ड ट्रंप कई बार राष्ट्रपति पुतिन की तारीफ कर चुके हैं। और अगर डोनाल्ड ट्रंप फिर से राष्ट्रपति बनते हैं, तो उनकी पहली कोशिश फिर से रूस और अमेरिका के बीच के खराब हो चुके संबंध को सुधारने की होगी।

कई अमेरिकी एक्सपर्ट्स और रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता कह चुके हैं, कि 'रूस को प्रतिबंधों से जकड़ने का मतलब है, कि रूस को चीन के और करीब धकेलना।'

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वहीं, अब जबकि रूस के पास युद्ध में भारी बढ़त हासिल है, और इस साल के अंत में डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में फिर से आने की संभावना है, तो मोदी की यात्रा को दिल्ली की तरफ से छह महीने बाद होने वाली वैश्विक घटनाओं के लिए खुद को तैयार करने के रूप में देखा जा रहा है।

यूक्रेन युद्ध ने भारत को अपने पश्चिमी सहयोगियों के साथ एक नाजुक कूटनीतिक स्थिति में डाल रखा है। नई दिल्ली ने रूस के आक्रमण की अभी तक स्पष्ट रूप से निंदा नहीं की है, लेकिन युद्ध के शुरुआती हफ्तों में बुचा नरसंहार की अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की थी, और रूसी नेताओं की तरफ से दी गई परमाणु युद्ध की धमकियों पर चिंता जताई थी।

अगर डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बनते हैं, तो ना सिर्फ अमेरिका और रूस के बीच के संबंध बेहतर हो सकते हैं, बल्कि मिडिल ईस्ट में जो बाइडेन के कार्यकाल में अमेरिका जिस तरह से कमजोर हुआ है, वो उसे सुधारने की कोशिश कर सकते हैं और मौजूदा समय में भारत खुद को एक वैश्विक खिलाड़ी के तौर पर देखने लगा है। लिहाजा अगर रूस और अमेरिका के संबंध एक बार फिर से सुधरने की तरफ बढ़ते हैं, तो भारत के लिए इसके कई मायने निकलेंगे।

वहीं, मोदी और ट्रंप के बीच भी बॉन्ड काफी मजबूत रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप के लिए अहमदाबाद में प्रधानमंत्री मोदी रैली कर चुके हैं और ट्रंप प्रशासन ने कभी मानवाधिकार जैसे मुद्दों को लेकर मोदी सरकार को सवालों के घेरे में खड़ा नहीं किया, जिससे मोदी सरकार के लिए ट्रंप प्रशासन के साथ जुड़ना और सहज हो जाता है। और अगर डोनाल्ड ट्रंप फिर से सत्ता में वापसी करते हैं, तो मोदी सरकार के साथ उनके संबंध और मजबूत हो सकते हैं।

मौजूदा समय में ग्लोबल पॉलिटिक्स के बड़े खिलाड़ी काफी कमजोर हो चुके हैं। जिनमें अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, जर्मनी के चांसलर ओलाफ स्कोल्ज समते कई यूरोपीय नेता हैं। लिहाजा अमेरिका के लिए चीन और रूस के बीच के मजबूत संबंधों के बीच जियो-पॉलिटिक्स की दिशा तय करना आसान नहीं होगा और इस मामले में अमेरिका को भारत की जरूरत होगी और मोदी सरकार के लिए वो वक्त, अपनी ग्लोबल प्रजेंस को दिखाने की होगी।

और शायद यही वजह है, कि भारत और रूस, जिन्होंने पिछले 21 शिखर सम्मेलन साल के अंत में आयोजित किए हैं, वो साल के बीच में शिखर सम्मेलन आयोजित कर रहे हैं और मौजूदा बाइडेन प्रशासन को संकेत दे रहे हैं, कि भारत और रूस के बीच के संबंधों में उसे नहीं आना चाहिए। वहीं, शायद भारत अभी से 6 महीने बाद बदलने वाली दुनिया के लिए खुद को एक मजबूत पॉजीशन पर ला रहा है, ताकि आगे जाकर उसके हाथ में बारगेन करने की क्षमता हो।

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