Explainer: भारत का अपना 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' कैसा होगा, कब तक होगा तैयार, कितना खर्च आएगा.. जानें सबकुछ
India to Make own Space Station: भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 फरवरी को तिरुवनंतपुरम में गगनयान मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों के नामों की घोषणा करने के बाद बहुत बड़ा ऐलान करते हुए कहा, कि 2035 तक भारत के पास अपना अंतरिक्ष स्टेशन होगा।
पीएम मोदी का ऐलान इसलिए अहम है, क्योकि अभी तक दुनिया में सिर्फ दो ही स्पेस स्टेशन हैं, और अगर भारत वाकई अपना स्पेस स्टेशन बनाता है, तो ये ना सिर्फ एतिहासिक उपलब्धि होगी, बल्कि भारत दुनिया का तीसरा ऐसा देश बन जाएगा, जिसके पास अपना स्पेस स्टेशन होगा।

लिहाजा, जानना जरूरी हो जाता है, कि आखिर स्पेस स्टेशन क्या होता है, कैसे बनता है, कितना खर्च आता है। इस रिपोर्ट में हम स्पेस स्टेशन से संबंधित तमाम बातों को जानने की कोशिश करेंगे।
क्या होता है स्पेस स्टेशन?
भारत की नजर 2035 तक 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' (बीएएस) स्थापित करने और 2040 तक चंद्रमा पर पहले भारतीय को भेजने के लक्ष्य पर है। भारत के पास अपना खुद का अंतरिक्ष स्टेशन होने की संभावना है, जो अंतरिक्ष की कल्पनाओं में भारत के लिए नये द्वार खोलता है।
स्पेस स्टेशन असल में एक अंतरिक्ष यान है, जो काफी लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने में सक्षम होता है, लिहाजा इसे अंतरिक्ष का घर कहा जा सकता है। ये एक कृत्रिम उपग्रह होता है, जहां पर अंतरिक्ष यात्रियों के रुकने, स्पेसक्राफ्ट के ठहरने के लिए डॉकिंग पोर्ट होता है। अंतरिक्ष स्टेशन अक्सर वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए लॉन्च किए गए हैं, लेकिन यहां से सैन्य प्रक्षेपण भी हुए हैं, लिहाजा स्पेस स्टेशन का महत्व काफी ज्यादा है।
अभी तक दुनिया के पास एक ही इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन था, जिसे नासा ने कई देशों के साथ मिलकर तैयार किया था। लेकिन, अब चीन ने भी अपना स्पेस स्टेशन तैयार कर लिया है। इसलिए अब अंतरिक्ष में दो स्पेस स्टेशन हो गये हैं। अगर भारत अपना स्पेस स्टेशन बना लेता है, तो ऐसा करने वाला वो तीसरा देश होगा, जिसका नाम 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' (BSS) रखा गया है।

भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का डिजाइन क्या होगा?
भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने BSS के लिए आवश्यक मॉड्यूल और डॉकिंग पोर्ट के डिजाइन को लेकर काफी बारीकी से ध्यान दे रहा है और इसके आर्किटेक्चर की सावधानीपूर्वक जांच कर रहा है। रिपोर्टों से पता चलता है, कि इस अंतरिक्ष स्टेशन में क्रू कमांड मॉड्यूल, एक आवास मॉड्यूल, एक प्रपोल्सन मॉड्यूल और डॉकिंग पोर्ट जैसे मूलभूत घटक होंगे।
इसरो प्रमुख एस सोमनाथ ने पिछले साल कहा था, कि उनका लक्ष्य 2028 में पहले मॉड्यूल का प्रक्षेपण शुरू करना है। इसके बाद, सात साल के भीतर, 2035 तक, इसरो अंतरिक्ष स्टेशन के लिए पूर्ण ऑपरेशनल स्थिति प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त मॉड्यूल बनाने की योजना बना रहा है।
इतना समय लगने की सबसे बड़ी वजह ये है, कि इसरो के पास अभी जो रॉकेट एलवीएम-3 है, उसकी पेलोड क्षमता सिर्फ 10 टन है, इसलिए 2028 में लॉन्च होने वाले प्रारंभिक मॉड्यूल का वजन लगभग आठ टन होगा। इसका मतलब ये हुआ, कि एलवीएम-3 एक बार में सिर्फ 10 टन सामान ही अंतरिक्ष तक पहुंचा सकता है।
सोमनाथ ने कहा, कि भविष्य के मॉड्यूल और ज्यादा बड़ा होने की उम्मीद है, जो 20 से 25 टन तक होंगे। इसलिए, अभी भारत के पास जो रॉकेट है, उसके जरिए इस काम को पूरा नहीं किया जा सकता है, जिसकी वजह से इसरो इस वक्त एक नया और शक्तिशाली रॉकेट का निर्माण कर रहा है। इस काम में इसरो को करीब 7 सालों का वक्त लगेगा।
एक बार रॉकेट का काम पूरा हो जाने पर, इसरो भारी मॉड्यूल लॉन्च करने और अंतरिक्ष स्टेशन पर इंसानों की उपस्थिति को सुविधाजनक बनाने के लिए ऑपरेशनल क्षमताएं स्थापित करने में सक्षम हो जाएगा।
2028 में जो लॉन्चिंग होगी, उसमें एक रोबोटिक मॉड्यूल शामिल होगा, जो उपग्रह के रूप में काम करेगा, जो डॉकिंग, प्रयोग और स्पेस स्टेशन से वापसी को सक्षम करेगा। अंतरिक्ष स्टेशन के लिए मानव मिशन 2035 के बाद ही शुरू करने की कल्पना की गई है। सोमनाथ ने कहा, कि यह इसरो की योजना की रूपरेखा है।

इंटरेशनल स्पेस स्टेशन से आकार में होगा छोटा
भारत ने अपना स्पेस स्टेशन बनाने की रूपरेखा 2019 में तैयार किया था, जब इसरो ने मिशन गगनयान की घोषणा करते हुए कहा था, कि भारत अगले एक दशक में अपना खुद का अंतरिक्ष स्टेशन तैयार कर लेगा। लेकिन कोविड -19 की वजह से ज्यादातर काम ठप पड़े और जिस गगनयान को 2021 में लॉन्च होना था, वो अब 2024 में जाकर लॉन्च होने वाला है।
गगनयान मिशन के बाद भारत का अगला मिशन खुद के अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना करना और उसके बाद चंद्रमा पर इंसानों को भेजना है। यानिस भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का पूरा होने पर भारत की निर्भरता इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से पूरी तरह से खत्म हो जाएगी, जो स्पेस में भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम होगा।
कैसा होगा भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन?
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का वजन 20 टन होगा और यह पृथ्वी से लगभग 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर अंतरिक्ष में बनाया जाएगा, जहां अंतरिक्ष यात्री 15 से 20 दिनों तक रह सकते हैं। मूल रूप से इसे 2030 तक पूरा करने की योजना थी, बाद में गगनयान क्रू स्पेसफ्लाइट मिशन और कोविड-19 महामारी से संबंधित तकनीकी मुद्दों की वजह से इसे 2035 तक के लिए टाल दिया गया।

स्पेस स्टेशन बनाने और चलाने में कितना खर्च आता है?
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को चलाने में हर साल करीब 3 अरब डॉलर का खर्च आता है, जो एक विशाल आंकड़ा है। लेकिन, करीब 20 देश इसका खर्च उठाते हैं और जो देश स्पेस स्टेशन से काम लेते हैं, उन्हें किराए का भुगतान करना होता है। यानि, अगर भारत खुद का स्पेस स्टेशन बनाएगा, तो उसे ये खर्च खुद उठाना होगा।
मई 2022 तक 20 देशों के 258 व्यक्तियों ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर कदम रखा है।
अमेरिका के अलावा, स्पेस स्टेशन चलाने में रूस, कनाडा, जापान, ब्राजील और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी में शामिल ग्यारह अलग अलग देश योगदान देते हैं। इंटरनेशनल अंतरिक्ष स्टेशन की शुरुआत 1993 में की गई थी और इसके पिछले डिजाइन पर 10 अरब डॉलर खर्च किए गए थे।
अभी जो इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन है, उसका मालिक सिर्फ अमेरिका नहीं है, बल्कि रूस, कनाडा, जापान और उसके कनाडाई पार्टनर भी इसमें हिस्सा रखते हैं।
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का बजट कितना है?
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण के लिए सरकार ने 8290 करोड़ रुपये इसरो को दिए हैं। भारत के केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री, जितेंद्र सिंह ने फरवरी 2024 में कहा था, कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) वर्ष 2035 तक धीरे-धीरे भारत का पहला अंतरिक्ष स्टेशन बना रहा है, जिसका नाम भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (बीएएस) होगा।
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