आर्मी चीफ बनाम इमरान खान, क्या जनरल बाजवा के जाने से पाकिस्तान में खत्म होगी राजनीतिक लड़ाई?
ऐसा माना जाता है, कि अक्टूबर 2021 में पेशावर कोर में आईएसआई के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद को ट्रांसफर करने के बाजवा के फैसले पर आपत्ति जताकर इमरान खान ने लाल रेखा को पार कर लिया था।
Pakistan News: पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर बाजवा ने पुष्टि की है, कि 29 नवंबर को उनका दूसरा कार्यकाल खत्म होने के बाद वो अपने पद से रिटायर्ड हो जाएंगे। लिहाजा, बाजवा के इस बयान के बाद अब इन अटकलों पर विराम लग गया है, कि क्या उन्हें फिर से कार्यकाल मिलेगा और इसके साथ ही एक नया सवाल शुरू हो गया है, कि लोकप्रियता के घोड़े पर सवार इमरान खान के नये आर्मी चीफ के साथ कैसे संबंध होंगे, क्योंकि प्रधानमंत्री की कुर्सी से हटाए जाने के बाद अभी तक पाकिस्तान में जितने भी उपचुनाव हुए हैं, उनमें इमरान खान की पार्टी ने एकतरफा जीत हासिल की है और ऐसे में उम्मीद है, कि अगले साल संभावित संसदीय चुनाव में इमरान खान की आंधी में शहबाज शरीफ और उनका गठबंधन उड़ जाएगा, लेकिन, क्या उससे पाकिस्तान में राजनीतिक शांति स्थापित हो पाएगी?

सेना की गद्दी छोड़ रहे जनरल बाजवा
पाकिस्तान के इंटर सर्विसेज प्रेस रिलेशंस (आईएसपीआर) के महानिदेशक मेजर जनरल बाबर इफ्तिखार, जिन्हें हाल ही में थ्री-स्टार रैंक पर प्रमोशन दिया गया है, उन्होंने 14न अप्रैल को मीडिया से कहा था, कि 29 नवंबर को जनरल बाजवा रिटायर्ड हो जाएंगे और जाहिर तौर पर उन्होंने ये बयान जनरल बाजवा के कहने पर ही दिया होगा। उन्होंने तो यहां तक कहा, कि सेना प्रमुख न तो अपने कार्यकाल में और विस्तार की मांग कर रहे हैं और ना ही वह एक और कार्यकाल को स्वीकार करेंगे। यानि, पाकिस्तान में अगले महीने नये आर्मी चीफ की नियुक्ति की जाएगी और अभी तक तय नहीं है, कि अगला आर्मी चीफ कौन बनेगा। पाकिस्तान का इतिहास रहा है, कि जो आर्मी चीफ बनता है, वही पाकिस्तान की राजनीति को कंट्रोल करता है और फिलहाल सत्ता में शहबाज शरीफ हैं, लिहाजा पूरी उम्मीद है, कि अगला आर्मी चीफ उनके मनपसंद का होगा, तो फिर इमरान खान का क्या होगा, ये काफी दिलचस्प सवाल है, क्योंकि इमरान खान जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं, उन्हें रोकना अब पाकिस्तानी सेना के लिए भी आसान नहीं है, बशर्ते कि उन्हें पहले के कुछ प्रधानमंत्रियों की तरह शहीद ना कर दिया जाए।

ब्रोमांस... जो चल नहीं सका
अप्रैल महीने में आईएसपीआर की घोषणा के बाद बाजवा के भविष्य के बारे में किसी भी तरह की अनिश्चितता पर विराम लग जाना चाहिए था, लेकिन अप्रैल वह महीना था, जब इमरान खान गुस्से में थे, क्योंकि उन्हें अविश्वास प्रस्ताव के जरिए प्रधानमंत्री की कुर्सी से अपदस्त कर दिया गया था। जबकि बाजवा ने घोषणा की थी, कि सेना 'अराजनीतिक' है, यानि, बाजवा ने इमरान खान के सामने पूरी तरह से ये साफ कर दिया था, कि उनकी कुर्सी बचाने के लिए वो कुछ नहीं करेंगे और इस बात ने इमरान खान को और भी ज्यादा बौखला दिया था। यानि, पाकिस्तान में मामला जनरल बाजवा बनाम इमरान खान की हो गई और यह उस स्थिति के ठीक विपरीत था, जो 2018 में बनी थी, जब जनरल बाजवा और सेना ने उस वर्ष हुए चुनावों में इमरान खान के पक्ष में स्पष्ट झुकाव दिखाया था, जिसने पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के नेता इमरान खान को सत्ता में लाया जा सके। सेना के आशीर्वाद से ही इमरान खान प्रधानमंत्री बने थे और इसके बाद सेना और इमरान खान सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की, कि वे "एक ही पृष्ठ पर" थे। लेकिन, डेढ़ साल बाद ही ये संबंध खराब होने लगा। बाजवा और इमरान खान का ये ब्रोमांस टिक नहीं सका।

क्या इमरान ने पार की लाल रेखा?
ऐसा माना जाता है, कि अक्टूबर 2021 में पेशावर कोर में आईएसआई के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद को ट्रांसफर करने के बाजवा के फैसले पर आपत्ति जताकर इमरान खान ने लाल रेखा को पार कर लिया। तत्कालीन आईएसआई प्रमुख हमीद खान, इमरान खान के करीबी थे और उन्होंने राजनीतिक प्रबंधन में उनकी मदद की थी, इसलिए, इमरान खान चाहते थे, कि फैज हमीद आईएसआई प्रमुख बने रहें। लेकिन, जनरल बाजवा इस बात से नाखुश थे, कि इमरान खान उनके काम में हस्तक्षेप कर रहे हैं और आखिरकार इमरान खान को फैज हमीद के ट्रासफर के लिए तैयार होना पड़ा। लेकिन, जनरल बाजवा के मन से इमरान खान के लिए भरोसा टूट गया था, लिहाजा जनरल बाजवा ने तय कर लिया, कि उनका उत्तराधिकारी कौन होगा, ये तय करने के लिए अब इमरान खान अपने दफ्तर में नहीं होंगे और ऐसा ही हुआ।

कौन होगा बाजवा का उत्तराधिकारी?
सेना के शीर्ष नेतृत्व में बदलाव के लिए अब करीब 6 हफ्ते का वक्त बचा है और पाकिस्तान में इस बात की चर्चा काफी तेज है, कि प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ बाजवा के उत्तराधिकारी के रूप में किसे चुनेंगे। इसमें कोई शक नहीं, कि शाहबाज शरीफ, अपने बड़े भाई नवाज शरीफ से सलाह लेंगे और उन्हें अपने गठबंधन सहयोगियों से भी सलाह लेनी होगी, लेकिन अंतत: यह उनका फैसला होगा। शाहबाज शरीफ के हमेशा से जनरलों के साथ अच्छे संबंध रहे हैं और शहबाज शरीफ इस बात को बहुत अच्छे से जानते हैं, कि वो जिस जनरल को भी चुनेंगे, वो अंत में सेना का ही वफादार होगा और वो किसी राजनीतिक व्यक्ति का वफादार नहीं होगा। हालांकि, शहबाज शरीफ इस बात का ख्याल जरूर रखेंगे, कि नया सेना प्रमुख सरकार के कामों में दखलअंदाजी, जैसा विदेश मामलों में हस्तक्षएप ना करे, लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा, कहना मुश्किल है।

पाकिस्तान की नाजुक राजनीतिक
किसी भी स्थिति में नए सेना प्रमुख का प्राथमिक ध्यान पाकिस्तान की नाजुक राजनीतिक और आर्थिक स्थिति पर होना चाहिए। इसके साथ ही, नये आर्मी चीफ को उन्हें इमरान खान की लोकप्रियता को मजबूत नहीं करने पर जारी रखने पर भी बहुत ध्यान देना होगा। शहबाज शरीफ पहले से ही नये नये ऑडियो लीक के जरिए इमरान खान को कमजोर करने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन इस हफ्ते हुए चुनाव में जबरदस्त जीत हासिल कर इमरान खान ने साफ कर दिया है, कि आगामी चुनाव शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सेना के लिए आसान नहीं होगा। इमरान खान बहुत हद तक देश की जनता को यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं, कि उनकी सरकार के पतन के पीछे अमेरिका का हाथ है और उन्होंने पाकिस्तान की बाकी राजनीतिक पार्टियों को एक तरह से अमेरिका का पिट्ठू भी घोषित कर दिया है, लिहाजा अब शहबाज शरीफ, बिलावल भुट्टो या फिर मौलाना फजलुर रहमान के लिए चुनाव में जनता को रिझाना आसान नहीं होगा। उपचुनाव के बाद इमरान खान और भी आक्रामक हो गये हैं, लिहाजा सवाल यही है, कि क्या नये आर्मी प्रमुख के साथ इमरान खान के संबंध अच्छे होंगे और क्या पाकिस्तान की राजनीति में शांति आ पाएगी?












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