ऑक्सफोर्ड वैज्ञानिक का बड़ा दावा- नया नहीं है कोरोना वायरस वर्षों से शांत पड़ा था

नई दिल्ली- ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक वैज्ञानिक ने कोरोना वायरस को लेकर अबतक की सारी जानकारियों पर पानी फेर दिया है। इस वैज्ञानिक का दावा है कि हो सकता है कि यह वायरस वर्षों से घूम रहा हो और जब उसे अनुकूल माहौल मिला तब उसने इंसानों पर कहर बरपाना शुरू कर दिया। बता दें कि अबतक तो यही माना जा रहा था कि यह वायरस पहली बार चीन के वुहान शहर में सामने आया और वहां से फैलकर इसने पूरी दुनिया में तबाही मचानी शुरू की दी। ऑक्सफोर्ड के वैज्ञानिक ने चाहे जिन परिस्थितियों में ये दावे किए हों, लेकिन इतना तो तय है कि इससे चीन को अपना चेहरा बचाने के लिए एक बहुत बड़ा हथियार जरूर थमा दिया है।

'नया नहीं है कोरोना वायरस वर्षों से शांत पड़ा था'

'नया नहीं है कोरोना वायरस वर्षों से शांत पड़ा था'

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक वैज्ञानिक प्रोफेसर टॉम जेफरसन ने दावा किया है कि हो सकता है कि चीन के वुहान से पैदा होने की बजाय कोरोना वायरस वर्षों तक छिपा रहा हो और अनुकूल पर्यावरण पाते ही वह महामारी के रूप में प्रकट हो गया हो। जेफरसन सेंटर फॉर एवीडेंस-बेस्ड मेडिसीन में वैज्ञानिक हैं। उन्होंने अपने दावे की पुष्टि के लिए दुनिया में कई जगहों पर वुहान में दिसंबर में पाए जाने से पहले ही वायरस की मौजूदगी के दावों का हवाला दिया है। कहा जा रहा है कि स्पेन, इटली और ब्राजील में सीवेज से इस वायरस के जो सैंपल मिले हैं, वह वुहान से भी पुराने हैं।

स्पैनिश फ्लू का दिया हवाला

स्पैनिश फ्लू का दिया हवाला

डेली टेलीग्राफ से बात करते हुए जेफरसन ने कहा कि 'स्पैनिश फ्लू के साथ भी ऐसी अजीब चीजें हुई थीं।' उन्होंने कहा है, '1918 में पश्चिमी समोआ की 30 फीसदी आबादी स्पैनिश फ्लू से मर गई और दुनिया के किसी बाहरी देश के साथ उनका कोई संपर्क भी नहीं हुआ था।' उनके मुताबिक, 'इसका मतलब ये है कि ऐसे वायरस न कहीं से आते हों और न कहीं जाते हों।......वे हमेशा यहीं रहते हों और कुछ चीजें उन्हें सक्रिय कर देती हों, शायद इंसानों का घनत्व या पर्यावरण की परिस्थितियां और हमें भी इसी दिशा में सोचना चाहिए।' बता दें कि पश्चिमी समोआ प्रशांत महासागर में एक द्वीप है।

सीवेज-शौचालयों से फैला कोरोना!

सीवेज-शौचालयों से फैला कोरोना!

यही नहीं उन्होंने ये भी कहा है कि उन्हें लगता है कि नोवल कोरोना वायरस या तो सीवेज सिस्टम के जरिए फैला है या साझा शौचालयों की वजह से। बता दें कि अबतक वैज्ञानिक यह मानकर चल रहे हैं कि SARS-CoV-2 बातचीत के दौरान, खांसते वक्त या छींकते वक्त ड्रॉप्लेट्स के जरिए फैलता है। इससे पहले पिछले हफ्ते स्पेन में वायरोलॉजी के वैज्ञानिकों ने भी दावा किया था कि उन्हें 2019 के मार्च में ही रखे एक गंदे पानी के सैंपल में कोरोना वायरस मिला है। जबकि, उसके एक साल बाद इस बीमारी ने यूरोप में कहर मचाया। उन्होंने ये भी दावा किया कि उस समय फ्लू का सीजन था, इसलिए कोई उसके पीछे नहीं पड़ा होगा। इटली के हेल्थ चीफ को भी मिलान और तूरीन में दिसंबर में ही सीवेज में इस वायरस की मौजूदगी मिली थी। जबकि, ब्राजील के कुछ शोधकर्ताओं को गंदे पानी के सैंपल में जो कोरोना वायरस मिला वह पिछले साल नवंबर का ही था। यानि वुहान से भी एक महीने पहले।

'निश्चित तौर पर यह कोई नया वायरस नहीं है'

'निश्चित तौर पर यह कोई नया वायरस नहीं है'

यूके के ग्लोबल हेल्थ चैरिटी वेलकम के डायरेक्टर सर जर्मी फरार ने जनवरी में ही मेलऑनलाइन के सामने दावा किया था कि, 'निश्चित तौर पर यह कोई नया वायरस नहीं है।....यह चीन और संभत: एशिया के कुछ हिस्सों मे जानवरों में फैलता रहा होगा, दशकों से नहीं तो शायद वर्षों से तो जरूर।' तब उन्होंने ये भी कहा था कि हो सकता है कि इस वायरस ने पहले इंसानों को संक्रमित नहीं किया होगा या इतना हल्का इंफेक्शन रहा हो कि किसी को पता ही न चला हो। उनके मुताबिक हो सकता है कि कुछ बदलाव या म्युटेशन के कारण इस वायरस को अब इंसानों को चपेट में लेना शुरू किया है।

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