अशरफ़ ग़नी से भागने से हमारी पूरी योजना पर पानी फिर गया: ख़लीलज़ाद
अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के साथ राजनीतिक समाधान के लिए जिस वार्ता की शुरुआत की थी, उसमें ज़ल्मय ख़लीलज़ाद को विशेष प्रतिनिधि बनाया था.
अमेरिकी सैनिकों के अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के बाद ख़लीलज़ाद ने फ़ाइनैंशियल टाइम्स को पहला इंटरव्यू दिया है.
इस इंटरव्यू में ख़लीलज़ाद ने कहा है कि अगर राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी अचानक मुल्क छोड़कर ना भागे होते तो स्थिति कुछ और होती.
ख़लीलज़ाद ने कहा है कि तालिबान के साथ आख़िरी मिनट में जिस समझौते पर सहमति बननी थी, उस पर अशरफ़ ग़नी के भागने से पानी फिर गया. ख़लीलज़ाद ने कहा कि समझौते के तहत इस्लामिक अतिवादियों से काबुल को अलग रखना था और राजनीतिक हस्तांतरण पर बात हो रही थी.
ख़लीलज़ाद को 2018 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान के साथ वार्ता में विशेष प्रतिनिधि नियुक्त किया था. ख़लीलज़ाद के अनुसार योजना के तहत ग़नी को क़तर में किसी समझौते पर पहुँचने तक पद पर बने रहना था.
यहाँ तक कि तालिबान काबुल में दरवाज़े तक पहुँच जाता तब भी यही योजना थी. ख़लीलज़ाद ने कहा कि 15 अगस्त को ग़नी के भागने से सुरक्षा व्यवस्था में ख़ालीपन आया और इससे तालिबान को काबुल तक आने में कोई दिक़्क़त नहीं हुई.
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सब रणनीति धरी की धरी रह गई
इसका नतीज़ा यह हुआ कि अमेरिका को आनन-फ़ानन में लोगों को निकालना पड़ा और दोहा में शुरू हुई वार्ता का भी अंत हो गया.
ख़लीलज़ाद ने फ़ाइनैंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा, ''हमने तालिबान के साथ एक समझौता सुरक्षित रखा था कि वे काबुल में नहीं जाएंगे. मुझे तनिक भी इसका आभास नहीं था कि ग़नी अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने वाले हैं.''
ख़लीलज़ाद के इस बयान से साफ़ है कि काबुल में तालिबान के नियंत्रण के बाद कैसे अमेरिकी योजना चारों खाने चित हो गई. इसी हफ़्ते अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने अमेरिकी सीनेटरों से कहा था कि उन्हें राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने देश छोड़ने से पहले आश्वासन दिया था कि वे अमेरिका की योजना के हिसाब से ही काम करेंगे.
इससे पहले एंटनी ब्लिंकन ने टोलो न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें ग़नी के देश छोड़ने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. टोलो न्यूज़ के लोतफ़ुल्लाह नजफ़िज़ादा ने ब्लिंकन से पूछा था, ''क्या आपने राष्ट्रपति ग़नी को देश से भगाने में मदद की है?
इस पर ब्लिंकन ने कहा था, ''नहीं. सच तो यह है कि मैं उनसे फ़ोन पर बात कर रहा था. जिस दिन राष्ट्रपति ग़नी ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़ा, उससे एक दिन पहले उनसे फ़ोन पर बात हुई थी. हमारी बातचीत दोहा में जारी सत्ता हस्तांतरण पर हो रही वार्ता पर थी.''
''उन्होंने मुझसे कहा था कि अगर यह वार्ता सफल नहीं रही तो वे मरते दम तक लड़ेंगे. इसके बाद 24 घंटे के भीतर ही उन्होंने देश छोड़ दिया. मुझे उनकी योजना के बारे में बिल्कुल पता नहीं था और न ही हमने उनके भागने का इंतज़ाम किया था.''
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तालिबान के लिए मौक़ा
ख़लीलज़ाद ने कहा, ''अशरफ़ ग़नी के ग़ायब होने से काबुल में सुरक्षा बल बिखर चुके थे. ग़नी के जाने से क़ानून-व्यवस्था का सवाल गहरा गया था. तालिबान ने पूछा कि क्या हम काबुल की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने जा रहे हैं? हमने कहा कि नहीं काबुल की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी हम नहीं लेने जा रहे हैं.''
ख़लीलज़ाद ने कहा कि उन्होंने उस दिन अमेरिकी रीजनल सैन्य कमांडर जनरल फ़्रैंक मैकेंज़ी और तालिबान के एक सीनियर नेता के साथ दोहा में बैठक की थी.
ख़लीलज़ाद ने उन दावों को ख़ारिज कर दिया था कि अमेरिका ने रणनीति के तहत 15 अगस्त को काबुल के राष्ट्रपति भवन में तालिबान को आने दिया था. उन्होंने कहा, ''हमने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया था. हमने जो कहा है, अमेरिकी सेना का मिशन वही था.''
तालिबान के साथ अमेरिका की जो बातचीत चल रही थी, उसमें ग़नी अफ़ग़ानिस्तान में भविष्य में बनने वाली सरकार का हिस्सा नहीं थे. तालिबान के अमेरिका के सामने ग़नी के इस्तीफ़े की शर्त पहले ही रख दी थी.
ग़नी ने 18 अगस्त को फ़ेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट किया था. इस वीडियो में उन्होंने कहा था कि उनका जीवन ख़तरे में था, इसलिए उन्हें देश छोड़ना पड़ा. ग़नी ने कहा था कि वे नहीं चाहते थे कि काबुल में ख़ूनी हिंसा हो.
ख़लीलज़ाद की नाकामी?
70 साल के ख़लीलज़ाद रिपब्लिकन हैं. तालिबान के साथ वार्ता में जो उनकी भूमिका रही है, उसकी आलोचना होती है. आलोचकों का कहना है कि पिछले तीन सालों में ख़लीलज़ाद की रणनीति कहीं काम नहीं आई और तालिबान चुनी हुई सरकार को बेदख़ल कर ख़ुद ही सत्ता पर क़ाबिज़ हो गए.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने 2020 में तालिबान के साथ हुए समझौते की आलोचना की थी. ख़लीलज़ाद मूलतः अफ़ग़ान हैं. ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद उन्हें विशेष दूत के पद से हटा दिया जाएगा.
लेकिन बाइडन ने हटाया नहीं. ख़लीलज़ाद ने कहा है कि वो भी बाइडन के आने के बाद हटने की तैयारी में थे. फ़ाइनैंशियल टाइम्स के अनुसार, ख़लीलज़ाद से एक बार अशरफ़ ग़नी ने मिलने से इनकार कर दिया था.
ख़लीलज़ाद अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के राजदूत रहे हैं और उन्होंने इस इलाक़े में 20 सालों तक काम किया है. उन्होंने 2020 के समझौते के लिए अपने से पहले वालों पर आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि 2018 में उन्हें इसलिए नियुक्त किया गया था क्योंकि अमेरिका जो हासिल करना चाहता था, वो नहीं मिल पाया था.
ख़लीलज़ाद ने कहा, ''मुझसे ज़्यादा उम्मीद थी लेकिन मैं जो कर सकता था, उसे किया है. मैंने हालात के हिसाब से चीज़ों को सुलझाने की कोशिश की.''
राष्ट्रपति बाइडन का क्या कहना था?
अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का बचाव करते हुए राष्ट्रपति जो बाइडन ने इसी महीने कहा था कि फ़रवरी 2020 में ट्रंप प्रशासन ने तालिबान के साथ सैनिकों की वापसी को लेकर समझौता किया था.
इस समझौते के बाद उनके पास दो विकल्प थे- या तो इस समझौते को माना जाए या युद्ध जारी रखने के लिए और सैनिक भेजे जाएं.
बाइडन ने कहा था कि वो एक अंतहीन लड़ाई को जारी नहीं रखना चाहते थे और न ही वहाँ से निकलने की योजना को हमेशा आगे बढ़ाते रह सकते थे. बाइडन ने कहा था कि अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला इसलिए नहीं किया था कि वहाँ तालिबान का शासन था बल्कि इसलिए किया था कि 11 सितंबर का हमला अफ़ग़ानिस्तान से हुआ था.
जुलाई महीने की शुरुआत में बाइडन ने कहा था कि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्र निर्माण के लिए नहीं गया था. अमेरिका का प्रारंभिक उद्देश्य अल-क़ायदा को नष्ट करना और ओसामा बिन-लादेन को पकड़ना या मारना था. बाइडन का तर्क यह था कि तालिबान अमेरिका का मुख्य दुश्मन नहीं था और उसे हराना भी कोई प्राथमिकता नहीं थी.
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