OI Explained: Israel को Nuclear में छूट, तो फिर Iran के न्यूक्लियर की जांच क्यों? ये कैसे डबल स्टेंडर्ड?

OI Explained: अमेरिका और इजरायल बनाम ईरान के बीच भले ही 15 दिन का सीजफायर चल रहा हो लेकिन जंग शुरू होने की वजह आज भी तेल से ज्यादा न्यूक्लियर प्रोग्राम को माना और बताया जाता है। फिर ऐसे में ये सवाल लाजमी हो जाता है कि अगर इजरायल न्यूक्लियर बम रख सकता है, न्यूक्लियर प्रोग्राम पर काम कर सकता है तो फिर ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम क्यों गलत हैं। ऐसे स्थिति में इसका मतलब और पीछे की कहानी दोनों जरूरी होते हैं।

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पहले दोनों पर लगने वाले नियम समझें

दरअसल दो दशकों से भी अधिक समय से ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम इंटरनेशनल निगरानी, प्रतिबंधों और डिप्लोमेसी के दायरे में रहा है। इसके उलट, इज़रायल के पास न्यूक्लियर हथियार होने का अनुमान लंबे समय से लगाया जाता रहा है, लेकिन उसने कभी इसे साफ तौर पर न स्वीकार किया और न ही खारिज किया। फिर भी, उस पर पारदर्शिता को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव न के बराबर है। यहीं से दुनिया और अमेरिका के दोहरे पैमानों पर सवाल उठते हैं।

हालिया युद्ध और उसका असर

पिछले 10 महीनों में इज़रायल और अमेरिका ने ईरान पर दो बार सैन्य कार्रवाई की। उनका दावा था कि ईरान न्यूक्लियर हथियार बनाने के करीब है, हालांकि ठोस सबूत सामने नहीं आए। पिछले साल जून में 12 दिन तक चली जंग और हालिया टकराव में 3 हजार से ज्यादा ईरानी नागरिक मारे गए और इससे वैश्विक ऊर्जा संकट भी पैदा हुआ। इस स्थिति ने ईरान और दुनिया भर के एक्सपर्ट्स को यह कहने पर मजबूर किया कि इंटरनेशनल पर दोहरे मापदंड अपनाए जा रहे हैं। उनका मानना है कि यह फर्क सिर्फ कानूनों में नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और ताकत के संतुलन में भी दिखता है।

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इज़रायल की न्यूक्लियर सीक्रेसी

एक्सपर्ट्स और इंटरनेशनल मीडिया की मानें तो, यह एक ओपन सीक्रेट है कि इज़रायल के पास न्यूक्लियर हथियार हैं। लेकिन उसने 1970 की NPT (Non Proliferation Treaty) पर हस्ताक्षर नहीं किए, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय जांच से बाहर रहता है। NPT एक वैश्विक समझौता है, जिसका मकसद न्यूक्लियर हथियारों के प्रसार को रोकना और शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना है। 191 देश इसके सदस्य हैं, जिनमें ईरान भी शामिल है, लेकिन इज़रायल नहीं।

नेतन्याहू का जवाब

2018 में एक इंटरव्यू में इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से जब न्यूक्लियर हथियारों पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि "हमने कभी पहले इसका इस्तेमाल नहीं किया और न करेंगे", लेकिन सीधा जवाब देने से बच गए। एक्सपर्ट्स की मानें तो इज़रायल का न्यूक्लियर प्रोग्राम 1950 के दशक में शुरू हुआ था। फ्रांस की मदद से नेगेव रेगिस्तान में डिमोना न्यूक्लियर फेसिलिटी बनाई गई, जहां हथियारों के लिए प्लूटोनियम बनाने का शक है।

हथियार और लीक मामला

इज़रायल के पास 80 से 200 न्यूक्लियर हथियार होने का अनुमान है। 1986 में मोर्दकै वानुनू नाम के तकनीशियन ने इस कार्यक्रम की जानकारी लीक की, जिसके बाद उसे 18 साल जेल में रहना पड़ा। इज़रायल की यह नीति जानबूझकर अपनाई गई है, ताकि वह अपनी ताकत बनाए रखे लेकिन कानूनी और राजनीतिक दबाव से बच सके। साथ ही, कोई उसके हथियारों की जांच न कर सके।

ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम कैसे फंसा?

ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम 1950 के दशक में अमेरिकी समर्थन से शुरू हुआ, लेकिन 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद इसमें तेजी आई। ईरान का दावा है कि उसका प्रोग्राम सिर्फ ऊर्जा और मेडिकल उपयोग के लिए है। ईरान 1974 से अंतरराष्ट्रीय न्यूक्लियर ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में है। 2015 में उसने JCPOA समझौता किया, जिसमें उसने यूरेनियम संवर्धन (ऊर्जा और हथियार बनाने का प्रोसेस) सीमित करने और निरीक्षण स्वीकार करने की बात मानी।

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JCPOA की शर्तें क्या हैं?

इस समझौते के तहत ईरान को 15 साल तक 3.67% से ज्यादा यूरेनियम संवर्धन नहीं करना था और उसकी न्यूक्लियर गतिविधियों की सख्त निगरानी की जानी थी। 2018 में अमेरिका इस समझौते से बाहर हो गया, जबकि IAEA ने कहा था कि ईरान नियमों का पालन कर रहा था। इसके बाद ईरान ने फिर से संवर्धन बढ़ाया। अमेरिका का कहना है कि ईरान के पास 60% संवर्धित यूरेनियम है, जबकि हथियार बनाने के लिए 90% से ज्यादा की जरूरत होती है। यही मुद्दा बातचीत में सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है।

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खुफिया रिपोर्ट क्या कहती है

मार्च 2025 में अमेरिकी खुफिया प्रमुख तुलसी गबार्ड ने कहा कि अमेरिका को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि ईरान न्यूक्लियर हथियार बना रहा है। ईरान हमेशा से कहता आया है कि उसका न्यूक्लियर प्रोग्राम शांतिपूर्ण है और वह सिर्फ ऊर्जा के लिए है। 2003 में सर्वोच्च नेता अली खामेनेई ने न्यूक्लियर हथियारों को इस्लाम के खिलाफ बताया था। 28 फरवरी को हुए हमलों के बाद भी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने भी यही कहा कि ईरान ने अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम फिर से शुरू नहीं किया है।

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तो फिर क्यों रडार पर रहा ईरान?

इज़रायल को पश्चिमी समर्थन मिलने की वजह से उसे नियमों से छूट मिलती है, जबकि ईरान को दुश्मन मानकर ज्यादा दबाव डाला जाता है। ये बात आसानी से समझ आती है कि अंतरराष्ट्रीय नियमों को समान रूप से दोनों देशों पर लागू नहीं किया जाता। कुछ देशों पर सख्ती होती है, जबकि कुछ को नजरअंदाज किया जाता है और ईरान उनमें से जिन पर सख्ती लगाई गई है। भारत भी उनमें से था लेकिन अटलजी की सरकार में भारत ने इस काम को गोपनीय ढंग से पूरा कर लिया जो सभी नॉन न्यूक्लियर पावर के लिए आज तक उदाहरण है। इसके साथ ही, जब तक ग्लोबल पावर बने बैठे देशों की शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव नहीं होगा, तब तक यह दोहरे मापदंड जारी रहेंगे और इज़रायल की न्यूक्लियर नीति पर सवाल उठते रहेंगे।

इस एक्सप्लेनर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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