मालदीव में किसी पार्टी को नहीं मिला बहुमत, भारत की भरपूर मदद के बाद भी राष्ट्रपति सोलिह क्यों पिछड़े?
मालदीव के राष्ट्रपति चुनाव में 8 प्रतियोगियों में से किसी को भी पूर्ण बहुमत मिलता नहीं दिखाई दे रहा है ऐसे में चुनाव दूसरे दौर की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। मालदीव में राष्ट्रपति बनने के लिए कम से कम 50 फीसदी वोट हासिल करना जरूरी है।
भारत समर्थक राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह इस पद की रेस में हैं मगर उन्हें अधिक सफलता नहीं मिल पाई है। उन्हें 39 फीसदी वोट मिले हैं। वहीं, मुख्य विपक्षी उम्मीदवार मोहम्मद मुइज ने 46% से अधिक वोटों के साथ आश्चर्यजनक बढ़त हासिल की है। इन दोनों नेताओं के बीच दूसरे दौर का मतदान 30 सितंबर को होगा।

हिंद महासागर का ये छोटा सा द्वीप जो कि रणनीतिक दृष्टिकोण से बेहद अहम है, वहां होने वाले चुनाव पर भारत और चीन दोनों की निगाहें हैं, क्योंकि यह चुनाव तय करेगा कि मालदीव में किस क्षेत्रीय शक्ति का प्रभाव सबसे अधिक रहेगा?
2008 में मालदीव में संविधान बनने के बाद स्वतंत्र राष्ट्रपति को चुनने के लिए ये पांचवा चुनाव हो रहा है। भारत समर्थक माने जाने वाले सोलिह के साथ आठ उम्मीदवार इस पद के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, उनका मुकाबला अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी और चीनी समर्थक मुइज से है।
सोलिह की कोशिश दूसरा कार्यकाल हासिल करने की है वहीं, वे मुइज के उन आरोपों से जूझ रहे हैं कि उन्होंने भारत को मालदीव में अनियंत्रित उपस्थिति की अनुमति दी है।
चीनी समर्थक मुइज ने वादा किया है कि यदि वह राष्ट्रपति पद जीतते हैं, तो वह मालदीव में तैनात भारतीय सैनिकों को हटा देंगे। उनका कहना है कि वे मालदीव के व्यापार संबंधों को संतुलित करेंगे, जो कि काफी हद तक भारत के पक्ष में है।
पीपुल्स नेशनल कांग्रेस मुइज की पार्टी, को भारी चीन समर्थक के रूप में देखा जाता है। इसके नेता अब्दुल्ला यामीन, 2013-2018 तक राष्ट्रपति थे। इसी दौर में मालदीव चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का हिस्सा बना। अक्टूबर 2020 में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के नेतृत्व में भारत विरोधी अभियान 'इंडिया आउट' शुरू हुआ था। उन्होंने जनता के बीच भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने का काम किया।
सोलिह को राष्ट्रपति बनने के लिए आठ उम्मीदवारों में सबसे आगे माना जा रहा था क्योंकि उनके सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला यामीन को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव लड़ने से रोक दिया था क्योंकि वह भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में जेल में हैं।
सोलिह को देश में स्थिरता लाने और कोविड महामारी को कुशलता से संभालने का श्रेय दिया जाता है ऐसे में उन्हें इस बार राष्ट्रपति चुनाव में भारी समर्थन की उम्मीद थी। सोलिह पर अपने प्रतिद्वंदी उम्मीदवार मुइज के उलट भ्रष्टाचार का भी कोई आरोप नहीं था। मुईज, यामीन सरकार में आवास मंत्री रह चुके हैं। इस दौरान उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे।
बहुमत हासिल क्यों नहीं कर पाए सोलिह?
लेकिन चुनाव परिणामों से लग रहा है कि मुइज ने सोलिह की मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी में विभाजन का फायदा उठाया है। दरअसल पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद पार्टी से अलग हो गए जिसके बाद उन्होंने चुनाव में अपना उम्मीदवार खड़ा किया। नशीद के उम्मीदवार इलियास लबीब को 7 फीसदी वोट मिले हैं।
मालदीव में सुन्नी मुस्लिम धार्मिक कट्टरपंथियों का समर्थन मुईज को प्राप्त है। इनका प्रभाव देश में इतना अधिक है कि जब इस्लामिक स्टेट समूह अपने चरम पर था तब मालदीव ने प्रति व्यक्ति सबसे अधिक संख्या में लड़ाके भेजे थे। आईएस विचारधारा वाले एक स्थानीय समूह ने 2021 में नशीद को निशाना बनाकर बम विस्फोट किया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे।












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