निलाक्षी साहा सिन्हा बनी आर्मेनिया में नई राजदूत, जानिए मोदी सरकार ने 'खास' अधिकारी को क्यों चुना?
भारत और आर्मेनिया के संबंध काफी मजबूत हुए हैं और अगर आर्मेनिया में अजरबैजान के रास्ते पाकिस्तान को जाने से रोकना है, तो फिर भारत को आर्मेनिया के लिए काफी काम करने होंगे।

Nilakshi Saha Sinha: भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ साए की तरह रहने वाली विदेश विभाग की अहम महिला अधिकारी नीलाक्षी सिन्हा को अहम जिम्मेदारी दी गई है और उन्हें आर्मेनिया गणराज्य में भारत के अगले राजदूत के तौर पर नियुक्त किया गया है। विदेश मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान में कहा है, कि "सुश्री नीलाक्षी साहा सिन्हा, जो वर्तमान में विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव हैं, उन्हें आर्मेनिया गणराज्य में भारत के अगले राजदूत के रूप में नियुक्त किया गया है।" विदेश मंत्रालय ने कहा कि साहा के जल्द ही कार्यभार संभालने की उम्मीद है।

भारत-आर्मेनिया में काफी अहम संबंध
नीलाक्षी सिन्हा को आर्मेनिया में उस वक्त अहम जिम्मेदारी दी गई है, जब उसका अजरबैजान के साथ लगातार तनावपूर्ण संबंध चल रहा है। वहीं, आर्मेनिया और भारत के बीच सक्रिय डिप्लोमेटिक संबंध हैं और दोनों देशों के बीच काफी प्रभावी सहयोग रहे हैं। भारत और आर्मेनिया के बीच साल 1995 में मित्रता और सहयोग को लेकर एक अहम संधि पर हस्ताक्षर किया गया था। हालांकि, अभी भी दोनों देशों के बीच पर्याप्त व्यापारिक और आर्थिक भागीदारी नहीं बढ़ पाई है। वहीं,आर्मेनिया ने साल 2020 में हुए अजरबैजान युद्ध से पहले भारतीय रक्षा उपकरणों को लेकर दिलचस्पी दिखाई थी और साल 2020 में ही आर्मेनिया ने भारत से चार वेपन लोकेटिंग रडार (WLR), यानि स्वाति रडार की आपूर्ति के लिए 40 मिलियन अमेरिकी डॉलर की डील की थी। वहीं, आर्मेनिया ने साल 2022 में भारत से मिसाइल, रॉकेट और गोला बारूद को लेकर भी समझौता किया था।

नीलाक्षी सिन्हा को अहम जिम्मेदारी
नीलाक्षी सिन्हा को भारत सरकार की तरफ से आर्मेनिया में राजदूत बनाकर काफी अहम जिम्मेदारी दी गई है, क्योंकि अजरबैजान के साथ संघर्ष में अब भारत ने खुले तौर पर आर्मेनिया का पक्ष लिया है और भारत ने खुले तौर पर तुर्की की विस्तारवादी नीति का मुकाबला करने के लिए अजरबैजान, पाकिस्तान और तुर्की के सहयोगियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। लिहाजा, नार्गोर्नो-काराबाख संघर्ष में आर्मेनिया का पक्ष लेने के बाद अब उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी नीलाक्षी सिन्हा के कंधों पर होगी। वहीं, पाकस्तान, जो अजरबैजान का खुलेआम समर्थन करता है, उसे आर्मेनिया में घुसने से रोकने की जिम्मेदारी भारत की होगी। आर्मेनिया में अगर अजरबैजान दाखिल होता है, तो फिर पाकिस्तान वहां काफी सक्रिय हो जाएगा, जिसके भारत के लिए घातक परिणाम हो सकते हैं।

आर्मेनिया कमजोर तो कश्मीर पर असर
आर्मेनिया का भारत के लिए कितना महत्व है, इस बात को आप इससे समझ सकते हैं, कि आर्मेनियाई क्षेत्र पर जबरन अधिग्रहण करने की कोशिश में तुर्की लगा हुआ है और इसके लिए उसे पाकिस्तान का साथ मिल रहा है। दोनों मिलकर अजरबैजान को सीधी मदद पहुंचा रहे हैं। अगर ये देश ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं, तो फिर इनका रास्ता चीन से जुड़ जाएगा और ऐसी स्थिति में पाकिस्तान, कश्मीर के अंदर गोला-बारूद और आतंकियों तक मदद पहुंचाने के लिए इस रास्ते का इस्तेमाल कर सकता है। लिहाजा, भारत को अपनी सैन्य क्षमता का इस्तेमाल आर्मेनिया की सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए करना होगा। ताकि, अजरबैजान को मजबूत होने से रोका जा सके।
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