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कीटनाशक से लैस मच्छरदानी बचा रही मलेरिया से

Provided by Deutsche Welle

लंदन, 25 मार्च। हाल के दशकों में मलेरिया के खिलाफ दुनिया ने जो विशाल प्रगति की है, उसमें मच्छरदानी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसके कारण लाखों लोगों की जान बच पाई है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह प्रगति आंशिक रूप से रुक गई है, क्योंकि संक्रमण फैलाने वाले मच्छरों ने मौजूदा जालों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है.

2020 में मलेरिया से 6,27,000 लोग मारे गए, जिनमें मुख्य रूप से उप सहारा अफ्रीका के बच्चे थे.

अब लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन (एलएसएचटीएम), नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल रिसर्च एंड किलिमंजारो क्रिश्चियन मेडिकल यूनिवर्सिटी, तंजानिया और कनाडा में ओटावा विश्वविद्यालय ने बताया है कि एक नया कीटनाशक 40 वर्षों में पहली बार वास्तविक दुनिया में परीक्षण में सुरक्षित और प्रभावी पाया गया है.

क्लोरफेनेपायर के साथ-साथ पाइरेथ्रॉइड से लैस जाल सामान्य रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन ने मलेरिया के प्रसार को पहले वर्ष में 43 फीसदी और परीक्षण के दूसरे वर्ष में 37 फीसदी की तुलना में कम किया.

इस अध्ययन में 39,000 से अधिक परिवारों को शामिल किया गया और 6 महीने से 14 वर्ष की आयु के 4,500 से अधिक बच्चों का अध्ययन किया गया. इस मच्छरदानी को बीएसएएफ ने एलएसएचटीएम के साथ मिलकर जर्मनी में विकसित किया. मौजूदा मच्छरदानी की तुलना में नई मच्छरदानी मामूली रूप से अधिक महंगी हैं, लगभग 3 डॉलर प्रति जाल. लेकिन शोधकर्ताओं ने कहा कि मामलों को रोकने के लिहाज से यह ज्यादा नहीं है.

क्लोरफेनेपायर पाइरेथ्रॉइड से अलग तरीके से काम करता है, वह मलेरिया के मच्छरों के पंखों में ऐंठन पैदा करके उन्हें उड़ने में असमर्थ बनाता है, जिससे वह काट नहीं पाता है. रसायन को पहली बार 20 साल पहले मलेरिया के खिलाफ इस्तेमाल के लिए प्रस्तावित किया गया था और 1990 के दशक से कीट नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

दिसंबर 2021 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि 2020 में दुनिया भर में मलेरिया के 24.1 करोड़ मामले सामने आए, जो 2019 में सामने आए 21.9 करोड़ मामलों से ज्यादा हैं. 2020 में इस बीमारी ने 6.27 लाख लोगों की जान ले ली. इनमें से 96 प्रतिशत मौतें अफ्रीका में हुईं. मरने वालों में करीब 80 प्रतिशत पांच साल से कम उम्र के बच्चे थे.

इस बीच अफ्रीका में हुए परीक्षणों के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसी साल दुनिया की पहली मलेरिया वैक्सीन को मंजूरी दी थी. इस वैक्सीन से दसियों हजार जानें सालाना बचाए जाने की उम्मीद की जा रही है. इसे ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन नाम की कंपनी ने बनाया है.

एए/सीके (रॉयटर्स)

Source: DW

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