जब केपी ओली ने मोदी के सामने पूजा से किया था इनकार, अब ‘श्रीराम’ पर कर रहे राजनीति

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नेपाल के प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली यानी केपी ओली की कुर्सी डगमगायी हुई है। सत्ता बचाने के लिए वे तरह-तरह के हाथकंडे अपना रहे हैं। वह कभी भारत विरोध भावनाएं भड़का रहे हैं तो कभी साम्यवादी दल में अपनी कमजोर स्थिति को ठीक करने के लिए चीनी राजदूत का सहरा ले रहे हैं। जब इन सब से भी तसल्ली नहीं हुई तो अब भगवान श्रीराम की शरण में जा गिरे हैं। केपी ओली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूनिफाइड मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट) के अध्यक्ष रहे हैं। वे ब्रह्मण परिवार से आते हैं लेकिन कम्युनिस्ट होने के नाते धर्म को नहीं मानते। लेकिन जब 'राजगद्दी’ से गिरने का डर हुआ तो श्रीराम के नाम पर राजनीति करने लगे। चूंकि उनकी पढ़ाई दसवीं क्लास से आगे नहीं हो पायी इसलिए उनका अधकचरा ज्ञान उनके लिए मुसीबत बन गया। ओली ने बिना किसी ऐतिहासिक प्रमाण के श्रीराम को नेपाली बताया है। इतना ही नहीं ओली ने उत्तर प्रदेश स्थित अयोध्या को नकली बता कर भारत के धार्मिक विश्वास से खिलवाड़ करने की जुर्रत की। ओली के इस सांस्कृतिक हमले से भारत में बेहद गुस्सा है। नेपाल के बुद्धिजीवी भी अपने प्रधानमंत्री के मूर्खतापूर्ण बयान पर विरोध जता रहे हैं।

पूजा से इंकार करने वाले ओली श्रीराम पर क्यों बोले?
कम्युनिस्ट धर्म को पाखंड मानते हैं इसलिए उसका विरोध करते हैं। इसकी वजह से कॉमरेड के पी ओली भी धर्म में विश्वास नहीं रखते। दो साल पहले जब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जनकपुर (नेपाल) गये थे तब ओली ने अपना असली रूप दिखाया था। 11 मई 2018 को मोदी और ओली ने मिलकर जनकपुर-अयोध्या बस सर्विस का शुभारंभ किया था। इस कार्यक्रम के पहले नरेन्द्र मोदी जनकपुर में माता सीता की पूजा करने मंदिर गये। उन्होंने ओली को भी साथ चलने के लिए कहा। लेकिन केपी ओली ने मंदिर जा कर पूजा करने से इंकार कर दिया था। उसदिन नरेन्द्र मोदी ने जनकपुर के रंगभूमि मैदान में नेपाली जनता को संबोधित भी किया था। तब मोदी ने कहा था, राजा दशरथ और राजा जनक ने सिर्फ अयोध्या और जनकपुर को ही नहीं बल्कि भारत और नेपाल को रिश्तों की डोर में बांध दिया था।

मोदी के सामने क्यों नहीं बोले ओली?
उस दिन जनकपुर में नरेन्द्र मोदी के बाद ओली ने भी भाषण दिया था। उस वक्त ओली ने कहा था, "राजा जनक और जानकी की भूमि पर भारत के प्रधानमंत्री का स्वागत है। जनकपुर एक ऐसा स्थान है जिसने भगवान राम को आते हुए देखा है। अयोध्या से बारात आयी और जनकपुर से विदाई हुई।" उस दिन तो ओली ने यह नहीं कहा था कि प्रचीन अयोध्या नेपाल के वीरगंज के नजदीक स्थित है। उस दिन उन्होंने यह भी नहीं बताया कि श्रीराम भारत के नहीं नेपाल के रहने वाले हैं। जब कि उस दिन तो वे माता जानकी की भूमि पर खड़े थे। तब उनका दिव्य ज्ञान कहां गया था? जाहिर है केपी ओली अब जानबूझ कर यह वितंडा खड़ा कर रहे हैं ताकि वे नेपाली लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच सकें। नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार डीएच अधिकारी के मुताबिक, ओली ने नरेन्द्र मोदी के सामने पूजा करने से इंकार कर दिया था। जब उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तब भगवान का नाम लेने से मना कर दिया था। लेकिन अब ओली को राम और अय़ोध्या की चिंता क्यों होने लगी?

अगर अयोध्या नेपाल में तो सरयू नदी कहां?
जिस व्यक्ति का धर्म में विश्वास न हो, जो पूजा को ढकोसला मानता हो, वह श्रीराम के जन्म का ज्ञाता कैसे हो गया ? क्या ओली ने श्रीराम के नेपाली होने और अयोध्या के नेपाल में होने पर कोई शोध किया है ? मैट्रिक फेल ओली से ऐसी आशा की भी नहीं जा सकती। नेपाल के पढ़े-लिखे लोग ओली की इस धृष्टता पर नाराज हैं। उनका मानना है कि इससे भारत के साथ रिश्ता और खराब होगा। चंडीगढ़ से आर्किटेक्चर और जेएनयू से डॉक्टरेट करने वाले बाबूराम भट्टराई भी नेपाल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। वे तो माओवादियों के पीपुल्स वार संगठन के सदस्य रहे थे। धुरवामपंथी होने के बावजूद भट्टराई ने ओली के इस बयान की ओलोचना की है। उन्होंने कटाक्ष किया है, आदिकवि ओली द्वारा रचित कलयुग की नयी रामायण सुनिए और बैकुंठधाम की यात्रा कीजिए। नेपाल के पूर्व उप प्रधानमंत्री कमल थापा ने कहा है कि श्रीराम पर ओली का यह बयान अनुचित और गैरजरूरी है। इससे भारत के साथ रिश्ते और खराब होंगे। नेपाल के पूर्व विदेशमंत्री रमेश पांडेय ने कहा है, ओली के बयान से शर्मिंदगी महसूस हो रही है। उन्होंने प्रधानमंत्री ओली की अज्ञानता पर सवाल किया है, अगर अयोध्या नेपाल में है तो सरयू नदी कहां है ? भारत -नेपाल तनाव के बीच ओली को इस तरह का बयान बिल्कुल नहीं देना चाहिए था।
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