Nepal Protest News: आखिर क्यों लटक रहा महज 16 साल पुराने नेपाली संविधान पर खतरा?
Nepal Protest News: शुक्रवार, 28 मार्च को भारत का एक पड़ोसी देश एक बार फिर हिंसा की आग में झुलस गया। यहां पर हिंदु राष्ट्र और राजशाही व्यवस्था को बहाल करने की मांग को लेकर लोग सड़कों पर निकल आए। ये प्रदर्शन राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के नेतृत्व में हो रहा था जिसे नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह का समर्थन हासिल है।
हिंसक झड़प के बाद नेपाल की ओली सरकार ने पूर्व राजा ज्ञानेंद्र की सुरक्षा को बदलते हुए सिक्योरिटी की संख्या कम कर दी है।

भारत के पड़ोसी देश नेपाल में 16 साल बाद फिर से राजशाही की मांग शुरू हो गई है। राजशाही समर्थकों ने पीएम ओली की क्मयुनिस्ट सरकार के खिलाफ बड़ा मोर्चा खोलते हुए 3 अप्रैल तक अल्टीमेटम दे दिया है। इस हिंसा ने एक बार फिर से नेपाल में गणतंत्र बनाम राजशाही की लड़ाई छेड़ दी है।
आखिर फिर क्यों हो रही है राजशाही की वापसी की मांग? विरोध कर रहे लोगों को संविधान से किस बात का डर है? आईए विस्तार से जानते हैं....
Nepal Protest News: 16 साल पहले बना लोकतांत्रिक देश
नेपाल में संविधान को खत्म करने की मांग कोई नई बात नहीं है। पिछले कई सालों से राजशाही और लोकतांत्रिक समर्थकों के बीच ये खूनी हिंसा जारी है। एक गुट नेपाल के सदियों पुराने राजतंत्र की बहाली की मांग कर रहा है वहीं दूसरे गुट संविधान का समर्थन कर रहा है। इन सबके बीच नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार इस राजनीतिक अस्थिरता के लिए पूर्व राजा ज्ञानेंद्र सिंह को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहरा रही है।
ये बात बहुत पुरानी भी नहीं है जब ऐसे ही एक जन आंदोलन के बाद नेपाल में 240 सालों से चले आ रहे राजतंत्र को समाप्त कर दिया गया और वहां धर्मनिरपेक्ष वाले संविधान को अपनाया गया था। साल 2007 में लोकतंत्र को अपनाने की पहल शुरु हुई थी जिसे पूरा होने में करीब 8 साल का लंबा समय लगा।
वहां लोकतंत्र को अपनाना इतना आसान काम नहीं था। इस दौरान संविधान के कई प्रस्तावों के खिलाफ हिसंक विरोध प्रदर्शन हुए थे जिसमें 40 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। अंतत: 20 सितंबर 2015 को नेपाल में संविधान लागू हुआ और ये एक गणतांत्रिक देश बन गया।
धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने के बाद भी नेपाल में हिंदू राष्ट्र और राजशाही की बहाली के लिए अभियान चला रहे हैं। इसी तरह पिछले साल भी हिंदू राष्ट्र को लेकर आंदोलन हुए थे। वहां की सरकार इन विरोध प्रदर्शनों के पीछे पूर्व राजा ज्ञानेंद्र सिंह और भारत के समर्थन का आरोप लगा रही है।
Nepal Protest News: लोकतंत्र का विरोध क्यों?
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हिंदू जनसंख्या पर मंडराता खतरा
नेपाल की आधिकारिक जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2021 में हिंदू धर्म को मानने वाले लोग 81.19 प्रतिशत हैं। इसके बाद बौद्ध धर्म, इस्लाम और ईसाई धर्म के मानने वाले हैं। वहीं अगर पिछले 10 सालों में देखा जाए तो हिंदू और बौद्ध धर्म मानने वालों की संख्या में काफी गिरावट भी आई है।
प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि जब से संविधान लागू हुआ है हिंदूओं की संख्या घट रही है और ईसाई जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है, बौद्ध धर्म के अनुयायी बड़ी संख्या में अपना धर्म परिवर्तन करके क्रिश्चियनिटी को अपना रहे हैं। राजशाही समर्थक इसे अपनी पहचान खोने का डर बता रहे हैं। उनका मानना है कि पारंपरिक राजतंत्र की बहाली से नेपाल की खोई हुई हिंदू राष्ट्र की पहचान वापस मिल जाएगी।
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आर्थिक-राजनीतिक कारण
आर्थिक असंतोष भी लोकतंत्र के विरोध का एक मुख्य कारण है। नेपाल एक बहुत छोटा सा देश है जिसका आधा हिस्सा पहाड़ों से घिरा है। यहां रोजगार के साधन कम है इसलिए यहां के युवाओं को रोजगार और उच्च शिक्षा के लिए दूसरे देशों में जाना पड़ता है। पिछले कुछ सालों यहां के युवाओं का विदेश पलायन बढ़ गया है।
संविधान को खत्म करने के लिए प्रदर्शन कर रहे लोगों को सरकार से काफी उम्मीदें थी लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी हैं। उनका कहना है कि देश की आर्थिक स्थिति बदहाल है और सरकार इस पर मौन साधे बैठी है। यहां के लोगों में राजनीतिक दलों के प्रति काफी असंतोष व्याप्त है। देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और वहां की खराब स्थिति पर सरकार के ढीले रवैये को लेकर भी लोग में काफी नाराजगी है। इतना ही नहीं वहां की जनता में देश की विदेश नीति से भी काफी असंतोष है।
Nepal Protest News Update: आंदोलन के लिए कौन जिम्मेदार?
पिछले साल राजशाही समर्थकों ने ज्ञानेंद्र शाह के स्वागत में एक जुलूस निकाला। इस स्वागत समारोह में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक पोस्टर ने सबका ध्यान खिंचा था। नेपाल की ओली सरकार ने राजनीतिक अस्थिरता के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया था।
पीएम केपी शर्मा ने आदित्यनाथ के पोस्टर दिखने की आलोचना की थी और कहा था कि आंतरिक मामलों में विदेशी नेताओं के समर्थन की जरूरत नहीं है। केपी शर्मा ओली ने कहा था, "ज्ञानेंद्र के गलत कदमों की वजह से ही राजशाही खत्म हुई और नेपाल लोकतांत्रिक देश बना। उन्होंने सत्ता हड़प ली थी और लोगों को प्रताड़ित किया था। इसलिए लोगों ने उनका विरोध किया।"
Nepal Protest News: राजशाही VS लोकतंत्र पर राजनीतिक पार्टियां आमने-सामने
नेपाल में चल रही राजनीतिक अस्थिरता पर वहां की राजनीतिक पार्टियां एक-दुसरे के खिलाफ दिख रही हैं। शुक्रवार को हुई हिंसा पर पूर्व पीएम पुष्प कमल दाहाल प्रचंड ने लोकतंत्र पर सवाल उठाय। प्रचंड ने कहा कि "ऐसे लोगों को इतिहास के कूड़ेदान में इसलिए धकेल दिया गया क्योंकि डेमोक्रेटिक व्यवस्था से लोगों को जो उम्मीद थी वो पूरी नहीं हुईं। अब राजशाही समर्थकों ने अपना सिर उठा लिया है।"
पिछले दिनों उन्होंने वर्तमान सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा था कि लोगों का ओली की सीपीएन और नेपाली कांग्रेस की संयुक्त सरकार से मोहभंग हो रहा है।
वहीं नेपाली कांग्रेस अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा ने राजशाही के पतन के लिए पूर्व राजा को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि नेपाल में लोकतंत्र आया तो इसके लिए ज्ञानेंद्र शाह ही पूरी तरह जिम्मेदार हैं। ज्ञानेंद्र के गलत कदमों की वजह से ही राजशाही का पतन हुआ और नेपाल लोकतांत्रिक देश बना।
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