भारत के पड़ोसी देश में मचा हाहाकार, 50% हिस्से पर विद्रोहियों का कब्जा, सेना ने कहा- टूट सकता है देश
Myanmar News: म्यांमार की सेना, जिसे तातमाडॉ के नाम से जाना जाता है, उसने ढाई साल पहले देश की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया था, लेकिन अब वो अपने अस्तित्व को लेकर सबसे बड़े खतरे का सामना कर रही है। म्यांमार में हाहाकार मच गया है और देश ना सिर्फ गृहयुद्ध में फंस गया है, बल्कि अब सेना ने भी कह दिया है, कि स्थिति उसके कंट्रोल से बाहर जा चुकी है और देश टूटने के कगार पर पहुंच चुका है।
एक फरवरी 2021 को सेना ने चुनी हुई सरकार का तख्तापलट कर दिया था और सत्ता पक्ष के साथ साथ तमाम विपक्षी नेताओं को भी गिरफ्तार कर देश में सैन्य शासन का ऐलान कर दिया था। म्यांमार की सबसे बड़ी नेता आंग सान सू की समेत देश के राष्ट्रपति भी पिछले ढाई साल से ज्यादा वक्त से जेल में बंद हैं, जबकि दूसरी तरफ, लोकतंत्र समर्थकों ने भी हाथ में हथियार उठा लिए।

स्थिति ये है, कि अब म्यांमार में दर्जनों विद्रोही ग्रुप बन गये हैं, जिनकी सेना के साथ भीषण लड़ाई चल रही है। म्यांमार की सेना अभी तक कई गांवों पर बमबारी कर चुकी है और अनुमान लगाया गया है, कि हजारों लोग अभी तक मारे जा चुके हैं।
ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, ये विद्रोही गुट सेना के नियंत्रण से देश को आजाद करवाने के लिए लड़ रहे हैं और उनकी मांग देश में फिर से लोकतंत्र को बहाल करने की है। लेकिन, इस कवायद में भारी हिंसा हो रही है, जिससे भारी संख्या में लोग भागकर पड़ोसी देशों में शरण लेने पहुंच रहे हैं। खासकर भारत में म्यांमार के शरणार्थियों की संख्या में बाढ़ आ गई है।
म्यांमार की स्थिति को समझिए
सैन्य तख्तापलट के बाद से म्यांमार के अलग अलग क्षेत्रों में जातीय विद्रोही समूहों ने सेना के खिलाफ सशस्त्र विरोध शुरू कर दिया है। विद्रोहियों ने देश के उत्तर में लगभग सौ चौकियों पर कब्ज़ा कर लिया है, जिनमें कई महत्वपूर्ण शहर और महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग शामिल हैं।
सेना के खिलाफ विद्रोहियों का यह आक्रमण पिछले महीने शान राज्य में शुरू हुआ। इसके पीछे तीन जातीय सेनाओं का गठबंधन है। उनका लक्ष्य सैन्य शासन को उखाड़ फेंकना और लोकतांत्रिक शासन बहाल करना है। शान राज्य में सेना को मिली कामयाबी ने देश को दूसरे हिस्सों में जंग लड़ने वाले विद्रोहियों को उत्साहित किया है और उन्होंने भी तेजी के साथ सेना के खिलाफ प्रतिरोध शुरू कर दिया है।
वहीं, सेना द्वारा बनाए गये राष्ट्रपति म्यिंट स्वे ने चेतावनी दी है, कि म्यांमार पर टूटने का खतरा मंडरा रहा है और उन्होंने कहा, कि अगर सरकार "सीमा क्षेत्र में होने वाली घटनाओं को प्रभावी ढंग से प्रबंधित नहीं करती है तो म्यांमार" विभिन्न भागों में टूट जाएगा।

देश के आधे हिस्से पर विद्रोहियों का कब्जा
विद्रोहियों ने देश के लगभग आधे हिस्से यानी 8,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया है। ये प्रगति अब तक चार आक्रामकों के सेट पर की गई थी।
पहला ऑपरेशन 27 अक्टूबर को ऑपरेशन 1027 के दौरान हुआ था, जिसे "थ्री ब्रदरहुड अलायंस" द्वारा चलाया गया था, जिसमें तीन जातीय समूह शामिल थे, जिनके नाम म्यांमार नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस आर्मी (MNDAA), ता'आंग नेशनल लिबरेशन आर्मी (TNLA), और अराकान आर्मी (AA) ) हैं और इन्होंने देश को उत्तरी शान राज्य में सेना के खिलाफ अपना ऑरपरेशन चलाया था।
इसके अलावा, ब्रदरहुड गठबंधनों में देश के दक्षिण-पश्चिम में स्थित राखीन राज्य के लड़ाके भी शामिल हैं।
इसके बाद 7 नवंबर को दूसरा आक्रमण, 'ऑपरेशन 1107' किया गया, जिसमें करेनी प्रतिरोध बलों ने दक्षिणपूर्वी काया राज्य में कम से कम दो सैन्य ठिकानों पर कब्जा कर लिया। ऑपरेशन 1107 काया राज्य को मुक्त कराने और जुंटा के नेपीताव किले के पास प्यिनमाना में प्रतिरोध की प्रगति का समर्थन करने के लिए शुरू किया गया था।
पिछले सोमवार को रखाइन राज्य में अराकान फोर्स विद्रोहियों ने सबसे ताज़ा हमला किया और देश के कई हिस्सों पर कब्जा कर लिया।

क्या विद्रोही कर पाएंगे सैन्य शासन का अंत?
संकेत यह हैं, कि एक ऐसी स्थिति बन रही है, जहां देश के तमाम सीमावर्ती अब विद्रोही बलों के नियंत्रण में चला गया है और ऐसा लगता है, कि सेना ने सीमावर्ती क्षेत्रों में नियंत्रण खो दिया है।
मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है, कि पिछले कुछ हफ्तों में लगभग 447 जुंटा कर्मियों ने उत्तरी शान राज्य, काया, चिन, राखीन और मोन राज्यों और सागांग और मागवे क्षेत्रों में हथियार छोड़ दिए हैं और आत्मसमर्पण कर दिया है।
वहीं, महत्वपूर्ण चरण तब शुरू होगा, जब जातीय प्रतिरोध ताकतें म्यांमार के गढ़, विशेषकर मांडले के उत्तर में चुनौती देंगी। सवाल यह है, कि क्या ये सफलताएं म्यांमार के विपक्ष को विद्रोही ताकतों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करेंगी, जिससे सैन्य सरकार के लिए जटिल स्थिति पैदा हो जाएगी।
सिविलियन नेशनल यूनिटी सरकार के रक्षा मंत्री यू यी मोन ने यह कहकर इस संभावना का संकेत दिया है, कि देश भर में प्रतिरोध अभियानों को अब एक ही राष्ट्रव्यापी रणनीति के तहत कॉर्डिनेट किया जा रहा है।
जैसे-जैसे लड़ाई फैलती जा रही है, स्थानीय आबादी की मानवीय स्थिति बिगड़ती जा रही है। इस मौजूदा हमले से पहले ही, कई मिलियन लोग विस्थापित हो चुके थे। म्यांमार की सेना को चीन और रूस से हेलीकॉप्टर्स मिले हैं, जिससे वो विद्रोहियों पर हवाई हमले करते हैं।
रिपोर्टों से संकेत मिलता है, कि सैन्य सरकार हमले वाले क्षेत्रों में या तो पीछे हटने या पहले से ही विद्रोहियों से लड़ रहे बलों की सहायता के मामले में अतिरिक्त सेना नहीं भेज सकती है।
जैसे-जैसे लोकतंत्र समर्थक जातीय विद्रोह फैलता जा रहा है, उम्मीद लगाई जा रही है, कि सेना नियंत्रण हासिल करने के लिए और बर्बर कार्रवाई करेगी। सैन्य सरकार ने लगभग 20,000 लोगों को गिरफ्तार किया है, यह आंकड़ा लगभग प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।

चीन को डबल गेम
म्यांमार में चीन के रणनीतिक हित हैं। उनके पास मांडले के माध्यम से एक रेलवे लाइन परियोजना और बंगाल की खाड़ी तक जाने वाली पाइपलाइनें हैं। लिहाजा, चीन म्यांमार की सेना का समर्थन करता है। ऐसी रिपोर्टें आई हैं कि मौजूदा जातीय हमले बीजिंग के समर्थन के बिना आगे नहीं बढ़ सकते हैं।
सबसे शक्तिशाली जातीय सशस्त्र संगठन, जो म्यांमार के उत्तरपूर्वी शान राज्य के भीतर एक स्वायत्त क्षेत्र को नियंत्रित करता है, जिसका नाम यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी (यूडब्ल्यूएसए) है, उसे भी बीजिंग से महत्वपूर्ण सामग्री और राजनीतिक समर्थन मिल रहा है।
हालांकि वा सेना ने कहा है, कि वह म्यांमार शासन और एक जातीय गठबंधन के बीच चल रही लड़ाई में किसी का पक्ष नहीं लेगी, लेकिन वह जातीय सशस्त्र बलों के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार आपूर्तिकर्ता बनी हुई है। इसलिए मूल रूप से, भले ही बीजिंग आधिकारिक तौर पर जुंटा का समर्थन कर रहा है, वह जातीय विद्रोहियों को हथियारों की आपूर्ति भी कर रहा है।
वहीं, चीन के आंग सान सू की की राजनीतिक पार्टी, नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के साथ भी अच्छे कामकाजी संबंध हैं, जो 2015 से 2020 तक सत्ता में थी। उसकी रुचि म्यांमार में स्थिरता की वापसी में है, ताकि उसने जिन ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश किया है, उन्हें पूरा किया जा सके।
भारत में शरण ले रहे म्यांमार शरणार्थी
इस बीच, पिछले हफ्ते से विद्रोहियों और म्यांमार सेना के बीच चल रही भीषण लड़ाई से बचने के लिए हजारों म्यांमार नागरिक भारत में शरण लेने पहुंच रहे हैं।
इसमें लगभग 47 म्यांमार सेना के अधिकारी भी शामिल थे, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार की और भारतीय सीमावर्ती राज्य मिजोरम में राज्य पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, जो म्यांमार के चिन राज्य के साथ 510 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है।
हालांकि, बाद में इन सैन्यकर्मियों को मणिपुर के सीमावर्ती शहर मोरेह ले जाया गया, जहां उन्हें म्यांमार के सैन्य अधिकारियों को सौंप दिया गया।












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