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मुरियल गार्डनरः रईसज़ादी जिसने अनगिनत लोगों को मौत से बचाया

1918 में वेल्सली कॉलेज में ली गई मुरियल की तस्वीर
Connie Harvey/Freud Museum London
1918 में वेल्सली कॉलेज में ली गई मुरियल की तस्वीर

मुरियल गार्डनर की महान मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रॉयड के काम में ऐसी दिलचस्पी थी कि वो 1920 के दशक में मेडिसिन की पढ़ाई करने ऑस्ट्रिया चलीं गईं.

यहां अमेरिका के रईस परिवार की ये वारिस फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ चल रही भूमिगत लड़ाई का हिस्सा बन गईं और लाखों लोगों की जान बचाने में उन्होंने भूमिका निभाई.

उनकी बहादुरी के कारनामों पर फ़िल्म बनीं जिसके लिए अभिनेत्री वेनेसा रेडग्रेव ने ऑस्कर जीता.

ऐसी क्या घटनाएं थी जिन्होंने उनके विलक्षण जीवन को रचा?

नाज़ियों ने ऑस्ट्रिया पर क़ब्ज़ा कर लिया था. वो नवंबर की एक सुबह थी जब मुरियल गार्डनर के होटल के कमरे के दरवाज़ों को किसी ने खटखटाया.

दरवाज़े पर गेस्टापो का एक अधिकारी खड़ा था जो ये जानना चाहता था कि वो यहां क्या कर रही हैं.

उनका दिल ज़ोर से धड़क रहा था. मेडिकल की इस छात्रा ने अपने आप को संभालते हुए कहा कि वो एक पर्यटक हैं और लिंज़ शहर घूमने आई हैं. कई और सवाल पूछने के बाद आख़िरकार गेस्टापो अधिकारी चला गया.

अगर वो और अधिक जांच पड़ताल करता तो उसे पता चल जाता कि गार्डनर वो नहीं हैं जो वो दावा कर रही थीं.

ऑस्ट्रिया जाने से पहले गार्डिनर ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़तीं थीं
Connie Harvey/Freud Museum London
ऑस्ट्रिया जाने से पहले गार्डिनर ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़तीं थीं

टाइटैनिक के डूबने का प्रभाव

गार्डनर का जन्म शिकागो में 1901 में मॉरिस परिवार में हुआ था जिसने मांस के कारोबार से बेतहाशा दौलत कमाई थी.

लंदन के फ्रॉयड म्यूज़ियम की स्थापना गार्डनर ने ही की थी और अब यहां उन पर एक प्रदर्शनी चल रही है.

फ्रॉयड म्यूज़ियम लंदन की डायरेक्टर कैरोल सीगेल कहती हैं, "वो बहुत कम उम्र से ही ये महसूस करती थीं कि उनके पास इतनी ज़्यादा दौलत है और बहुत से लोगों के पास कुछ भी नहीं है. वो इस गलत मानती थीं.

"वो राजनीति में रूचि लेने लगीं थीं. जब वो बहुत कम उम्र की थीं उन्होंने महिलाओं के मताधिकार के लिए रैली निकाली थी."

गार्डनर के विचारों पर बीसवीं सदी की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक- 1912 में टाइटैनिक जहाज़ के डूबने का ग़हरा असर हुआ था.

बाद में अपने जीवनकाल में उन्होंने अपने पोते हाल हॉर्वी से एक बार कहा था कि मीडिया की कवरेज में हादसे में मारे गए बड़े-बड़े लोगों के नाम तो लिए गए, लेकिन आम लोगों को किसी ने नहीं पूछा था. रिपोर्टों में उन्हें 'स्टीरेज' कहा गया था जिसका अर्थ होता है जहाज़ में सस्ते किराये पर यात्रा करने वाले लोग.

"वो अपनी मां के पास गईं और पूछा कि स्टीरेज का मतलब क्या होता है और उन्होंने बस इतना ही कहा कि सामान्य लोग. ये सुनते ही उनके दिमाग़ में विचार कौंधने लगे. 11 साल की उम्र में वो अपने परिवार की उदारवादी महिला बन गईं थीं."

प्रतिष्ठित वेल्सली कॉलेज में पढ़ने के बाद उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से शिक्षा ली और फिर वो 1926 में वियना चलीं आईं. इंग्लैंड में हुई उनकी शादी से बेटी भी पैदा हुई थी जिसे वो साथ लेकर गईं. हालांकि ये शादी बहुत चल नहीं पाई थी.

फ्रॉयड में दिलचस्पी

ऑस्ट्रिया जाने के पीछे उन्हें विश्वास था कि मशहूर मनौचिकित्सक सिगमंड फ्रॉयड उन्हें देखेंगे.

लेकिन फ्रॉयड के पास पहले से ही बहुत से मरीज़ पंजीकृत थे, ऐसे में उन्हें मेडिकल कॉलेज रेफ़र कर दिया गया.

हालांकि इससे ना ही साइको एनालिसिस में उनकी रूचि कम हुई और ना ही उस शहर के प्रति उनका प्यार कम हुआ जिसकी बागडोर समाजवादी लोकतंत्रवादियों के हाथ में थी.

सीगल कहती हैं, "वो जब वियना पहुंची तो ये शहर लाल रंग में रंगा था और यहां कई तरह के समाज सुधार हो रहे थे. मुरियल को इस शहर में रहना अच्छा लगा, उनका साइको परीक्षण अच्छे से हुआ और उन्होंने तय किया कि वो भी एक साइकोएनालिस्ट (मनौचिकित्सक) बनेंगी."

उन्होंने मेडिसिन की पढ़ाई करने के लिए वियना की यूनिवर्सिटी में दाख़िला ले लिया, लेकिन जल्द ही समाजवादियों को नाज़ियों ने हटा दिया और वो उनकी धरपकड़ करने लगे.

नाज़ुक स्थिति में उस देश को छोड़ने के बजाए गार्डनर ने अपनी शिक्षा के साथ एक नया मकसद जोड़ लिया. वो भूमिगत चल रहे विरोध आंदोलन का हिस्सा बन गईं.

विएना में हिटलर
Getty Images
विएना में हिटलर

हार्वी बताते हैं, "उनके लिए ये फ़ैसला लेना मुश्किल नहीं था वो जानती थीं कि सही क्या है और उन्हें क्या करना है."

दोहरी ज़िंदगी

गार्डनर क्रांतिकारियों के बीच मैरी नाम से चर्चित थीं. उनके तीन निवास स्थान थे जिनमें से एक वियना वुड्स में था. ये एक छोटी सी कॉटेज थी. यहां वो बैठकें करतीं थीं और आंदोलनकारियों को छुपने की जगह देती थीं.

क्रांतिकारी समाजवादी नेता जोसेफ़ बटिंगर को भी उन्होंने यहीं रहने की जगह दी. 1930 के दशक में मुरियल गार्डनर ने बटिंगर से शादी कर ली थी.

सीगल बताती हैं, "वो एक साथ दोहरी ज़िंदगी जी रहीं थीं, वो एक देखभाल करने वाली मां और मेडिकल छात्रा थीं जिनके विएना में बहुत से दोस्त थे और वो क्रांतिकारियों की मददगार भी थीं जो विरोध आंदोलन का हिस्सा थीं."

गार्डनर ने फ़र्ज़ी पासपोर्ट ऑस्ट्रिया पहुंचाए जिनके ज़रिए क्रांतिकारियों को देश छोड़कर जाने में मदद मिली.

वो अपनी दौलत और प्रभाव के ज़रिए क़ानूनी तौर पर भी लोगों को देश छोड़ने में मदद करती थीं. उन्होंने ब्रिटेन में लोगों को नौकरियां दिलवाईं जो देश छोड़ने का आधार बनीं.

एक बार कॉमरेड एक दूरस्थ स्थान पर छुपे हुए थे. उन तक पहुंचने के लिए गार्डनर ने रेल से यात्रा की, फिर तीन घंटों तक पहाड़ पर चढ़ाई की और फिर पासपोर्ट पहुंचाए. ये सब उन्होंने एक सर्द रात में किया.

सीगल कहती हैं, "उनके सामने वास्तविक ख़तरे थे. वो लगातार ऐसी गतिविधियां कर रहीं थीं कि अगर वो पकड़ ली जातीं तो या तो उन्हें देश से बाहर भेज दिया जाता या बहुत संभावना है कि जेल में ही डाल दिया जाता."

वियना में उनका सामाजिक जीवन ऐसा था कि वो हर तरह के लोगों के संपर्क में आईं.

1934 में अंग्रेज़ कवि स्टीफ़न स्पेंडर के साथ उनका अफ़ेयर शुरू हुआ. उस समय भविष्य में लेबर चांसलर बनने वाले हग गेट्सकल भी वियना में ही रह रहे थे.

सीगल बताती हैं कि वो ब्रिटेन के सबसे कुख्यात गद्दारों में से एक से भी वियना में मिली थीं.

ऑस्ट्रिया के यहूदी लोगों की तस्वीर. उनसे ज़बरदस्ती विएना की सड़कें साफ़ करवाई जा रही हैं.
Getty Images
ऑस्ट्रिया के यहूदी लोगों की तस्वीर. उनसे ज़बरदस्ती विएना की सड़कें साफ़ करवाई जा रही हैं.

"एक युवा उनसे मिलने आया था और उन्हें उस पर संदेह था. इस व्यक्ति ने उन्हें वामपंथी साहित्य बांटने के लिए कहा था. ऐसी उम्मीद उन्होंने उससे नहीं की थी."

"बाद में जब युद्ध समाप्त हो गया, उन्होंने इस व्यक्ति की तस्वीरें अख़बारें में देखीं. ये ब्रितानी डबल एजेंट किम फिलबी थे."

1938 में नाज़ी जर्मनी ने ऑस्ट्रिया पर क़ब्ज़ा कर लिया. गार्डनर के पति और बेटी ने देश छोड़ दिया. हालांकि वो अपना काम जारी रखने और मेडिकल डिग्री पूरी करने के लिए वियना में ही रुक गईं. हालांकि बाद में तीनों ही यूरोप छोड़कर अमेरिका चले गए थे.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान गार्डनर और उनके पति ने यहूदी लोगों को वीज़ा दिलाने का अभियान चलाया. जो शरणार्थी अमेरिका पहुंच रहे थे उन्होंने उन्हें नौकरियां और रहने की जगह दिलाई.

अनगिनत लोगों को बचाया

ये कहना मुश्किल है कि कितनी जानें उन्होंने बचाई या कितनी ज़िंदगियों को उन्होंने प्रभावित किया.

हार्वी कहते हैं कि उन्होंने सुना है कि गार्डिनर ने कई सौ लोगों की जान बचाई. वो कहते हैं, "लेकिन मुझे नहीं लगता कि उन्हें कभी वास्तविक संख्या पता होगी."

गार्डनर की मौत के दो साल बाद साल 1987 में बनी एक डॉक्यूमेंट्री में कई लोगों ने कहा था कि अगर वो नहीं होतीं तो शायद वो ज़िंदा ही ना होते.

युद्ध के कई साल बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी में पढ़ाया, कई किताबें लिखीं जिनमें उन्होंने अपनी भूमिगत गतिविधियों के बारे में लिखा जो तब तक सिर्फ़ उनके नज़दीक रहने वालों को ही पतां थीं. उन्होंने मनोचिकित्सक के रूप में लंबी प्रैक्टिस भी की.

हार्वी उन्हें एक बेहद सादी महिला के तौर पर याद करते हैं. वो कहते हैं, "क्या हुआ था इस बारे में वो कभी बात नहीं करती थीं. बहुत कुरेदने पर ही वो कुछ बोलतीं थीं."

सिगमंड फ्रायड
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सिगमंड फ्रायड

लेकिन 1973 में एक किताब प्रकाशित हुई जिसका नाम था पेंटीमेंटो. इसे अमेरिकी लेखिका लिलियन हैलमैन ने लिखा था. किताब में लिलियन की जूली नाम की एक महिला से दोस्ती पर एक चैप्टर था जो नाज़ी दौर से पहले वियना में रहती थी.

इसी दशक में बाद में वेनेसा रेडग्रेव और जेन फोंडा की एक फ़िल्म आई जिसके लिए रेडग्रेव को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का ऑस्कर मिला.

किताब और विवाद

सीगल कहती हैं, "जब ये किताब प्रकाशित हुई तो बहुत से लोगों ने मुरियल को फ़ोन किया और पूछा कि क्या उन्होंने लिलियन हैलमेन की कहानी पर आधारित किताब पढ़ी है? निश्चित तौर पर तुम ही जूलिया हो? जो कहानी उन्होंने बताई है वो तुम्हारी ही कहानी है."

"मुरियल गार्डिनर कोई ऐसी महिला नहीं थी जो इस बात पर झगड़ा करतीं लेकिन उन्होंने लिलियन हैलमैन को पत्र लिखा और पूछा कि ये ज़रा हैरान करने वाला है, तुम जानती हो, क्या ये बातें तुम्हें मुझसे पता चलीं थीं. और लिलियन ने कोई जवाब नहीं दिया."

बाद में दोनों के बीच संपर्क का पता चल गया. दोनों का वकील एक ही था- ये थे वुल्फ़ श्वाबाचर. चूँकि किताब प्रकाशित होने से पहले ही वो मर चुके थे, ऐसे में वो ये नहीं बता सकते थे कि उन्होंने ही लिलियन को जूलिया की कहानी बताई थी या नहीं.

हालांकि ऑस्ट्रिया के समाजवादी आंदोलन के पूर्व सदस्यों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि उनके साथ ऑस्ट्रिया में 1930 के दशक में सिर्फ़ एक ही अमेरिकी महिला रहा करती थी. और वो लोग उस महिला को मैरी के नाम से जानते थे.

इस विवाद का एक नतीजा ये हुआ कि अंततः मैरी ने अपने जीवन पर आधारित एक किताब लिखी जिसका नाम था कोड नेम मैरी. ये किताब दशकों पहले ही प्रकाशन से बाहर हो गई है. अब फ्रॉयड म्यूज़ियम की प्रदर्शनी के लिए इसे दोबारा छापा गया है.

फ्रॉयड म्यूज़ियम लंदन के हैम्प्स्टेड में उसी घर में है जहां सिगमंड फ्रॉयड ने वियना छोड़ने के बाद फ्रायड ने अपने अंतिम दिन बिताए थे. इसे गार्डनर ने ही उन्हें ख़रीद कर दिया था और उनकी मौत के बाद इसे उनकी याद में म्यूज़ियम बना दिया गया.

सीगल ने इसी वजह से ये प्रदर्शनी भी आयोजित की है.

फ़िल्म का दृश्य
Getty Images
फ़िल्म का दृश्य

"हम मुरियल गार्डिनर के आभारी हैं क्योंकि वो और एना फ्रायड ही इस संस्थान की संस्थापक हैं और इसी वजह से इसका वजूद है."

"उनकी संस्था ने लंबे समय से इस संस्थान की मदद की है. ये प्रदर्शनी उन्हें शुक्रिया कहने का एक तरीका है."

इस प्रदर्शनी में वेनेसा रेडग्रेव भी शामिल हैं. उन्होंने एक नाटक भी लिखा था जो अमेरिकी मनोवैज्ञानिक मुरियल गार्डनर पर ही आधारित था.

वहीं हार्वी कहते हैं कि उनकी दादी सुर्खियों से दूर रहीं. अब फिर से लोगों की उनमें रूचि जाग रही है, ये सुनना संतोषजनक है.

रेडग्रेव ने जूलिया के किरदार के लिए ऑस्कर जीता था
Getty Images
रेडग्रेव ने जूलिया के किरदार के लिए ऑस्कर जीता था

"वो अपनी दौलत का 99 फ़ीसदी दान करना चाहती थीं और उन्होंने ऐसा ही किया. वो कोई मदर टेरेसा नहीं थीं, वो अच्छा ख़ाना पसंद करती थीं और दिन के अंत में वोदका पीती थीं."

"लेकिन भाग्य से उनके पास पैसा था और साथ में उनके भीतर डर को जीतने की क्षमता और मूल्य भी थे. इन सबने मिलकर ऐसी महिला को गढ़ा जिसकी समाज को बहुत ज़रूरत थी."

लंदन में फ्रॉयड म्यूज़ियम हैंप्सटेड के उसी घर में स्थित हैं जहां वो रहा करते थे
BBC
लंदन में फ्रॉयड म्यूज़ियम हैंप्सटेड के उसी घर में स्थित हैं जहां वो रहा करते थे

ये प्रदर्शनी 18 से 22 सितंबर के बीच फ्रॉयड म्यूज़ियम में चल रही है.

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