Mikhail Gorbachev: अंतिम सोवियत नेता के उत्थान और पतन की कहानी, जिनके दिल में भारत धड़कता था
पश्चिमी देशों में गहराई से सम्मानित, जहां उन्हें "गोर्बी" उपनाम दिया गया था...और अमेरिकी राष्ट्रपति रीगन ने कहा था, कि अब उन्होंने यूएसएसआर को "दुष्ट साम्राज्य" के रूप में देखना बंद कर दिया है।
मॉस्को, अगस्त 31: पूर्व सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव शायद पहले और आखिरी रूसी नेता होंगे, जिन्हें पश्चिम में पसंद किया जाता था और घर में जिन्हें कोसा जाता था, उनका निधन हो गया है। वो तत्कालीन सोवियत संघ के आखिरी नेता थे, जिनके शासनसाल में सोवियत संघ कई हिस्सों में टूट गया। 91 साल की उम्र में मिखाइल गोर्बाचेव ने अपनी जिंदगी की आखिरी सांस ली और उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी, परमाणु हथियारों की रेस को खत्म करना और शीत युद्ध की समाप्ति। इसके अलावा मिखाइल गोर्बाचेव के दिल में भारत धड़कता था। आईये जानते हैं, मिखाइल गोर्बाचेव के उत्थान और पतन की कहानी।

पश्चिम करता था प्यार, रूस में आलोचना
पश्चिमी देशों में गहराई से सम्मानित, जहां उन्हें "गोर्बी" उपनाम दिया गया था... गोर्बाचेव कई मायनों में सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन की ही विचारधारा पर आगे बढ़ रहे थे, जिन्होंने आयरन कर्टन का निर्माण किया और पूर्वी यूरोप के अधिकांश हिस्से को मास्को के उपग्रहों के एक समूह में बदल दिया और वाशिंगटन के राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती दी। हालांकि, उन्हीं के कार्यकाल में पूरी दुनिया विनाशकारी परमाणु टकराव की दहलीज पर आकर खड़ी हो गई थी। लेकिन, उन्हें बदलाव के लिए भी जाना जाता रहा है, क्योंकि उन्होंने सबसे पहले स्टालिन और उनके उत्तराधिकारियों द्वारा स्थापित कई गलत कदमों और कुछ आदर्शवादी कदमों की एक लंबी श्रृंखला में निर्धारित पाठ्यक्रम को उलट दिया, जिसे उन्होंने "पेरेस्त्रोइका" और "ग्लासनोस्ट" कहा, यानि पुनर्निर्माण और खुलापन।

व्लादिमीर लेनिन के सिद्धांतों पर चले
हालांकि, उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा के कई सिद्धांतों को बदल दिया, लेकिन उन्होंने अपने लिए जो रास्ता बना रखा था, वो सोवियत संस्थापक व्लादिमीर लेनिन के सिद्धांतों की वापसी थी, जिसमें फेल हो चुके कमांड अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण और कठोर कम्युनिस्ट सिद्धांत को मानवीय बनाने का प्रयास था। साल 2011 में उन्होंने एक टेलीविजन इंटरव्यू में कहा था, कि 'एक शब्द में कहें तो, सही मायनों में यूएसएसआर की स्वतंत्रता रूस के तौर पर आई।' उन्होंने कहा था कि ये "सिद्धांत रूप में और व्यवहार में, हमने लेनिन की विरासत को वापस पाने की कोशिश की"। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में मिखाइल गोर्बाचेव एक राजनीतिक बादशाह के रूप में खड़े हुए, लेकिन उनके पैर भी मिट्टी के बने हुए थे। कम्यनिस्ट विचारधार में रिफॉर्म, जिसे पेरेस्त्रोइका कहा जाता है, उसमें उन्होंने काफी ज्यादा योगदान दिया था और इस विचारधारा को मानवीय बनाया था।

गोर्बाचेव की घरेलू राजनीति
साल 1991 में सोवियत संघ का पतन हो गया और उसके पीछे की अन्य वजहों में एक वजह तेल की कीमत में रिकॉर्ड कमी थी, जो सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था को संभाल पाने में नाकाम साबित हुई। गोर्बाचेव की घरेलू नीतियों के लिए और भी घातक, उनके और उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी, बोरिस येल्तसिन के बीच एक पॉवर गेम था, जिन्होंने रूस के बाकी यूएसएसआर से स्वतंत्रता की घोषणा की, हालांकि रूस सहित नौ सोवियत गणराज्यों ने 1991 के जनमत संग्रह में एक साथ रहने के लिए मतदान किया था। हालांकि, कहा जाता था, कि गोर्बाचेव के इरादे अच्छे थे, लेकिन उनके अच्छे इरादों की वजह से ही पूर्व सोवियक संघ अंतरजायीस संघर्षों में फंस गया और फिर रूस और 14 नये स्वतंत्र सोवियत गणराज्यों को एक दशक के दर्दनाक आर्थिक संकट और राजनीतिक उथल-पुथल में डुबो दिया।

रूस में उद्योगपतियों का उदय
ल्तसिन शासन के लगभग 10 वर्षों के बाद, रूस में उद्योगपतियों का उदय होना शुरू हुआ और कुलीन रूसी उद्योगपतियों ने रूस की अधिकांश अर्थव्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले लिया। हालांकि, इन उद्योगपतियों के खिलाफ रूस के कुछ राज्यों में आवाजें उठीं थीं, लेकिन लोकतंत्र के लिए ये उठी ये आवाजें सिर्फ अराजकता लेकर आईं। और ये यही समय था, जब रूस की राजनीति में कभी ना बुझने वाले नाम, व्लादिमीर पुतिन का उदय हुआ। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के कार्यकाल में कई पुराने सोवियत राज्य धीरे धीरे नव-रूढ़िवादी राष्ट्रवाद की तरफ बढ़ने लगे, जबकि किर्गिस्तान, जॉर्जिया और यूक्रेन जैसे देश पश्चिमी देशों के रंग में रंगने लगे, जिनपर बाद में रूस ने आक्रमण भी किए। इसके लिए गोर्बाचेव को ही जिम्मेदार ठहराया गया और उनका नुकसान पश्चिमी देशों के लिए बहुत बड़ा लाभ बन गया।

गोर्बाचेव से लोगों में निराशा
राजनीतिक विश्लेषक फ्योडोर लुक्यानोव ने 2014 में Gazeta.ru दैनिक में प्रकाशित एक लेख में कहा था, कि "मध्य और पूर्वी यूरोप अपने अतीत में वर्तमान के विकल्प को नहीं देखता है।" "पूर्व यूएसएसआर में ऐसी कोई भावना नहीं है। कुछ जगहों पर स्थिति इतनी विकट है कि सोवियत अतीत एक स्वर्ण युग की तरह लगता है, और उनके मन में भविष्य को लेकर कोई संभावना नजर नहीं आती है।'' गोर्बाचेव के शासन से ज्यादातर रूसी काफी निराश होने लगे थे, क्योंकि उनके शासनकाल में ही देश से महाशक्ति का दर्जा छिन गया और जब गोर्बाचेव ने राजनीति में वापस आने की भी कोशिश की, तो एक वक्त उनके उत्साही समर्थकों ने भी उनका साथ छोड़ दिया और उन्हें समर्थन नहीं मिला। दूसरी तरफ राष्ट्रपति बन चुके पुतिन ने देश के लोगों को एक बार फिर से शक्ति का अहसास कराना शुरू किया, जिसने तेल की कीमत को फिर से बढ़ा दिया था और जो यूरोप को धमकाकर रखता था। गोर्बाचेव की उपलब्धियों में मुख्य कब्र पुतिन के उदय ने ही खोदा।

गोर्बाचेव की शुरूआती राजनीति
साल 1931 में सोवियत संघ में भीषण अकाल आया था, जिसने दक्षिणी रूसी गांव प्रिवोलनॉय को पूरी तरह से नष्ट कर दिया और उसी समय में 2 मार्च 1931 गोर्बाचेव का जन्म हुआ था। 1930 में ग्रेट पर्ज की लड़ाई के दौरान उनके दादा और उनके नाना, दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें जेल भेज दिया गया था और इस घटना ने आगे चलकर गोर्बाचेव के जीवन पर काफी असर डाला और इसीलिए गोर्बाचेव ने कम्यूनिस्ट पार्टी के अंदर कई तरह के बदलाव करने शुरू किए और उसकी विचारधारा को मानवीय बनाना शुरू कर दिया। गोर्बाचेव ने महज 15 साल की उम्र में एक कंबाइन हार्वेस्टर का संचालन शुरू किया, और उनके अथक परिश्रम ने उन्हें एक सरकारी पुरस्कार दिलाया, जिसकी वजह से वो मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी में कानून की पढ़ाई करने चले गये और फिर वहीं से उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी ज्वाइन कर ली। 1960 के दशक में गोर्बाचेव जल्दी से अपने मूल स्टावरोपोल क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ने लगे और देश की राजनीति के शिखर पर पहुंचने लगे, जो उस वक्त दुनिया की एक महाशक्ति था। इस दौरान सोवियत संघ ने पहली बार अंतरिक्ष में रॉकेट भेजा और क्यूबा मिसाइल परीक्षण के दौरान परमाणु युद्ध की नौबत तक आ गई और फिर दुनियाभर के यूरोपीय उपनिवेशों में मॉस्को समर्थिक कम्युनिस्ट सरकारों का उदय होने लगा।

सत्ता में गोर्बाचेव का उदय
साल 1971 में गोर्बाचेव कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के सबसे कम उम्र के सदस्य बने और 1978 में वह अपनी पत्नी रायसा और बेटी इरीना के साथ मास्को चले आए। उनकी नई स्थिति ने उन्हें कई पश्चिमी यूरोपीय देशों का दौरा करने की अनुमति दी। लेकिन, यूरोपीय देशों का दौरा करने के बाद वहां की स्थिति ने उन्हें काफी चौंका दिया, क्योकि सोवियत संघ के प्रोपेगेंडा में यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था को "सड़ती पूंजीवादी व्यवस्था" कहा जाता है, लेकिन यूरोपीय देशों की समृद्धि ने उन्हें चौंका दिया। ये वो वक्त था, जब शीत युद्ध की वजह से सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था का विकास रूक गया था और शीत युद्ध का वो चरम साल था। 1980 की संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, उस साल वाशिंगटन और मॉस्को ने विशाल सैन्य अभ्यास किया और दोनों देशों का लगभग 40,000 परमाणु हथियारों का एक शस्त्रागार बन गया था और दुनिया तबाही के कगार पर खड़ी हो गई थी। लेकिन, परमाणु हथियारों की अंधे दौड़ ने सोवियत की अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान पहुंचाया था और सोवियत संघ की सरकार ने देश के अंदर ही कई तरह के प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए थे।

पश्चिम को पसंद थे गोर्बाचेव
1985 में सत्ता में आने के बाद गोर्बाचेव ने कम्युनिस्ट-ब्लॉक देशों के नेताओं के एक समूह से कहा था, कि वे अपने तरीके से आगे बढ़ सकते हैं। हालांकि, उनके इस फैसले को बाद में क्रोनर के गीत "माई वे" के बाद मजाक में "सिनात्रा सिद्धांत" करार दिया गया। अपने शासनकाल के दौरान ही उन्होंने कम्युनिस्ट ब्लॉक देशों से सोवियत संघ की सेना को वापस बुलाने का फैसला किया और उन्हीं के शासनकाल में काबुल से लेकर बुखारेस्ट तक तैनात सोवियत संघ की सेना लौट गई और फिर मॉस्क समर्थक शासनों का पतन होने लगा। हालांकि, सेना बुलाने के फैसले का पश्चिमी देशों ने स्वागत किया था। उन्होंने और अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने परमाणु हथियारों और मिसाइलों की संख्या में कटौती करने के लिए महत्वपूर्ण सौदे किए। और 1988 रेड स्क्वायर भाषण में अमेरिकी राष्ट्रपति रीगन ने कहा था, कि अब उन्होंने यूएसएसआर को "दुष्ट साम्राज्य" के रूप में देखना बंद कर दिया है।












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